संविद गुरुकुलम में मनाया गया गणेशोत्सव

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पर्व और उत्सव हमारे महान देश की अनूठी प्रस्थापना हैं। उत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठानों और रीति-रिवाजों के प्रदर्शन तक ही सीमित नहीं होते हैं। उत्सव लोगों को अपने रिश्तों को नए आयामों में जोड़ने, संवाद करने और समन्वय करने में मदद करते हैं, नीरस दिनचर्या को तोड़ते हैं, जीवन में प्रसन्नता भरते हैं और हमारे जीवन में जीवंत रंग और खुशियाँ लाते हैं।

इन सभी पर्व-उत्सवों में से, गणेश चतुर्थी सबसे मनाया जाने वाला महापर्व है। इस दिन भगवान गणेश का जन्मदिन होता है। इस त्योहार को विनायक चतुर्थी या गणेशोत्सव के नाम से भी जाना जाता है।

इस महापर्व के उपलक्ष्य में, समविद गुरुकुलम के विद्यार्थियों ने भी इस पर्व को बड़ी धूमधाम से मनाया। कार्यक्रम की शुरुआत स्कूल परिसर में गणेश प्रतिमा की स्थापना के साथ हुई। छात्रों और शिक्षकों द्वारा गणेश का स्वागत किया गया, उसके बाद आरती के साथ रंगारंग कार्यक्रमों के माध्यम से छात्रों ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।

गणेश को बुद्धि का देवता माना जाता है। वह हमें एकाग्र रहने और नियमित अध्ययन पर बेहतर ध्यान केंद्रित करने का आशीर्वाद देते हैं। सुख देने वाले और दुखों को हरने वाले देव हैं गणेश। अपने साथ रिद्धि और सिद्धि का आशीर्वाद देते हैं। प्रथम पूज्य गणेश जगतपालक हैं तो वही सम्पूर्ण जगत भी हैं। माता पिता के आशीष में, जगत में पूज्यनीय बना देने की क्षमता है। गणेशजी इस तथ्य को चरितार्थ करते हैं। सामाजिक दृष्टिकोण में माता पिता की अनिवार्यता के साथ, उनकी संतुष्टि की अनिवार्यता को बल देने वाले देव हैं गणेश। जिनकी उपस्थिति मात्र किसी भी कार्य के निर्विघ्न संपन्न होने की निश्चितता कर दे, वो देव हैं गणेश। संकट हरते, सुख करते, दर्शन मात्र से मनकामना की पूर्ति करते हैं गणेश।

सांस्कृतिक कार्यक्रम

सनातनी राष्ट्रवाद का परम एवं चरम बिंदु है गणेशोत्सव। भारतीय सनातनी समाज को विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा देने के विचार के साथ बालगंगाधर तिलक ने इसकी शुरुआत की थी, देखते ही देखते ये सम्पूर्ण महाराष्ट्र और भारत में मनाया जाने लगा।

पूजन

संविद गुरुकुलम के छात्र हमेशा ऐसे आयोजनों में बहुत रुचि लेते हैं। इस तरह के आयोजनों का मकसद अपनी महान संस्कृति से जुड़े रहना और इस दुनिया को रहने के लिए एक बेहतर जगह बनाना है। छात्रों में इस प्रकार के आयोजन उनकी संस्कृति से जुड़ाव के लिए बहुत आवश्यक हैं।

गीत गायन

कार्यक्रम में बच्चों ने गणेश वंदन के साथ उनके गीतों पर सांस्कृतिक प्रस्तुतिकरण के साथ अपने विचार भी व्यक्त किये। साथ में प्राचार्या श्रीमती आस्था जी ने भी अपने विचारों से छात्रों को अवगत कराया।

आप सभी को गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएं!!

संस्कारम – आज की अनिवार्यता, कल का आनंद

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एक देश के रूप में भारत एक विश्व शक्ति बन चुका है और आर्थिक पैमाने पर बढ़ता सकल घरेलु उत्पाद भी इस बात की ओर इंगित करता है कि आने वाली सदी, एक देश के रूप में, भारत की ही होगी। आर्थिक एवं व्यावसायिक स्तर पर देश की प्रगति, खुशहाल समाज की ओर हमारे कदमों को मजबूत करती है लेकिन एक समाज के रूप में भी, क्या हम उतने ही सुदृढ़ हो पा रहे हैं?

कोरोना काल में लोगों का अपने माँ बाप को अकेले छोड़ देना, हुतात्माओं को अंतिम संस्कार के लिए प्रियजनों का न होना, लगातार बढ़ते आपराधिक प्रसंग, सामाजिक असुरक्षा के शिकार बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे, हमारे संवेदनहीन समाज का कुरूप चेहरा दिखाते हैं। हमें ये बताते हैं कि आर्थिक सफलता, यशस्विता और प्रसिद्धि ही सब कुछ नहीं है। संस्कारों की पौध का अगली पीढ़ी में रोपण भी उतना ही अनिवार्य है जितना आर्थिक एवं व्यावसायिक उन्नत होना।

पिछले दिनों एक पुत्र ने अपनी माँ का अंतिम संस्कार ये कहकर नहीं क्या कि उसने(पुत्र ने) धर्म परिवर्तन कर लिया है और माँ को धर्मान्तरित व्यक्ति के धर्मानुरूप अंत्येष्टि क्रिया में सम्मिलित किया जाये। विवाद बढ़ने की स्थिति में महिला की पौत्री हजार किलोमीटर का सफर तय कर आई और अंत्येष्टि की गई। एक अन्य प्रसंग में एक महिला की कुछ महीने पुरानी लाश का संस्कार पड़ोसियों ने किया क्यूंकि पुत्र अमरीका में नौकरी करता था। महिला अकेले रहती थी।

ये एक नई समस्या है जो हमारे समाज के सम्मुख मुँह बाए कड़ी है। इन समस्याओं का यदि कोई शाश्वत समाधान है तो वो है बच्चों को संस्कारों के उचित मार्ग पर लाना, उन्हें संवेदनशील बनाना अपने रिश्तों के प्रति, अपने मित्रों के प्रति, अपनी जलवायु, प्रकृति, पशुपक्षियों के प्रति, उन्हें उन्नत किया जाये संस्कारों की निधि से, उनके हाथ चलें तो संवेदनाओं की महक उठे, उनका हर क्रियाकलाप ये देख कर हो कि उसका निकटवर्ती ही नहीं दूरगामी भी, परिणाम कहीं हमें या अन्य किसी को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित तो नहीं करेगा।

वृन्दावन नगर के वात्सल्यग्राम में परमपूज्या साध्वी दीदी माँ ऋतंभरा जी का प्रवास है जहाँ उनकी प्रज्ञा और मेधा का लाभ, संविद गुरुकुलम में अध्ययनरत बालक बालिकाओं को समय समय पर मिलता है। इन विशेष उद्देश्य से प्रायोजित कक्षाओं को संस्कारम के नाम से जाना जाता है और इन कक्षाओं का एकमात्र उद्देश्य इन भविष्य के उन्नत नागरिकों के मन में राष्ट्रप्रेम, अपनत्व, सहयोग एवं संवेदनशीलता का बीज रोपित करना है जिसके ब्रह्मांड बन जाने पर समस्त जगत उन शिक्षादीक्षाओं से गौरवान्वित हो सके।

संस्कारम की कक्षाओं में कोई कोर्स से संबंधित पाठ नहीं होता, वो तो बच्चे अपने विद्यालय में पढ़ ही लेते हैं लेकिन यहाँ उन्हें कहीं से भी प्राप्त न हो सकने वाला ज्ञान मिलता है जो उनके बालमन को अच्छी शिक्षाओं के माध्यम से प्रसन्न रहना सिखाता है, उन्हें बुजुर्गों के सम्मान और छोटों से प्रेम का जीवन में महत्व बताता है, उन्हें आने वाली चुनौतियों से अवगत कराता है, उनसे निपटने के उपाय बताता है। संस्कारम की कक्षाओं का महत्व, समाज की आधारभूत संरचना का संवर्धन करना है ताकि ये सभी बच्चे जब अपने अपने समाज में एक समझदार नागरिक बनकर रहें तो उन्हें सही और गलत की तार्किक समझ हो, वो एक नागरिक होने के अधिकारों से अधिक कर्तव्यों की चर्चा करें। एक सामाजिक इकाई के रूप में मुफ्त सुविधाओं का लाभ लेने की जगह लोगों को सहयोग करें।

संस्कारम एक प्रयोग है, जो अपने असर निश्चित रूप से आने वाले भविष्य में दिखाएगा किन्तु इसके प्रसार प्रचार के माध्यम से ऐसी अनेकों कक्षाओं की महती आवश्यकता हम सभी को है, ताकि एक सामाजिक सुरक्षा सभी को उपलब्ध हो, वृद्धाश्रमों में पलते बुजुर्गों की संख्या कम हो और सामाजिक स्तर पर हम विश्व की सबसे उन्नत श्रेणी में स्थान पा सकें।

असुविधाजनक सत्य के साहित्यकार दुष्यंत कुमार: वात्सल्यपूर्ण नमन

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हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गांव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

ये अश’आर हिंदी के सबसे बड़े गजल बुनकर, दुष्यंत कुमार के हैं। दुष्यंत कुमार होना एक परिकल्पना के यथार्थवादी अस्तित्व को पा लेना है। दुष्यंत कुमार की प्रासंगिकता अपने समय से अधिक आज है। उनकी गजलें, उनके गीत नौजवानों को प्रश्न पूछने और जागरूक बनने के हिमायती रहे। दुष्यंत का पहला कविता संग्रह जिस दौर में आया, उस दौर में शब्दों बाजीगरी के बड़े नाम मौजूद थे। हिंदी में अज्ञेय मुक्तिबोध की कविताओं के सूर्य थे तो धूमिल और बाबा नागार्जुन जैसे बड़े नाम समाज को जागरूक करते थे। भोपाली शायरों की गजलें अपने शिखर पर थीं।

दुष्यंत ने उस समय में अपनी एक नई साहित्यिक विधा उत्पन्न की, जिसने गजल कहने के अंदाज़ बदलकर रख दिए। दुष्यंत कुमार त्यागी अब सीधी, स्पष्ट और दो टूक कविताओं के लिए जाने लगे थे। अज्ञेय जैसे विद्वान को समझना मुश्किल था, कविताओं और गजलों को समझ आने लायक बनाने का शौर्य दुष्यंत कुमार के नाम पर है।

निदा फाज़ली (Nida Fazli), दुष्यंत कुमार के बारे में लिखते हैं, “दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है. यह ग़ुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के ख़िलाफ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है।”

दुष्यंत कुमार को उनकी ऊंचाई के स्तर से देखें तो वो गजल या कविता मात्र कहने वाले शायर या कवी नहीं हैं, वो आम आदमी के गुस्से का इजहार हैं, संवेदनहीन सत्ताओं से टकराने का हौसला हैं, जुनून का इंसानी रूप हैं, वो दुष्यंत कुमार हैं। इसकी बानगी यहाँ देखिये –

“मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूं,हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है”

दुष्यंत कुमार समाज के प्रतिनिधि के तौर पर एक आम आदमी को देखते हैं। वस्तुतः कोई राजनेता या अधिकारी इस लायक कभी हुआ ही न हो –

“वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है”

सरकारी नौकरी करते हुए सरकारी तंत्र की आलोचना, वो भी इतनी कठोर? सरकारें ये कहाँ बर्दाश्त कर पाती हैं? उनके ऊपर होनी थी सो कार्यवाही हुई, लेकिन उनकी कलम की स्याही न सूखी। शासन की ढुलमुल रवैये पर उन्होंने लिखा था –

“कहां तो तय था चिराग हरेक घर के लिए,

कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।

यहां दरख्तों के साये में धूप लगती है,

चलो यहां से और उम्र भर के लिए।

वे मुतमइन है कि पत्थर पिघल नहीं सकता,

मैं बेकरार हूं आवाज के असर के लिए।”

सत्य कहने की असुविधा से उत्पन्न होने वाले खतरे सभी को झूट बोलने को प्रेरित करते हैं। अनेकों संकटों से भी विचलित न होने वाले इस महाकवि ने कुछ यूँ खुद को बयां किया – “इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियाँ”ओजस्विता और जनमानस के कवि दुष्यंत कुमार जी की आज पुण्यतिथि है, आपको वात्सल्यपूर्ण नमन।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की वात्सल्यमय शुभकामनाएं

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भारतीय जीवन दर्शन का परम एवं चरम सुख है, कृष्णमय होने का प्रयास करना। भारतीय आध्यात्म में जहाँ राम मर्यादाओं की अनगिनत डोर थाम बंध जाने का पर्याय हैं, कृष्ण बंधन तोड़ने की अप्रतिम शांति हैं। कृष्ण आये ही थे सबके बंधन तोड़ने। बंधन छद्म स्वार्थ का, संसार के मोह का, सुखों की अतृप्त तृष्णा का। कृष्ण जहाँ गए, बंधन तोड़ जीने की ध्यातव्य शिक्षा देते रहे। अपने विचारों, क्रियाओं और मानकों के उच्चस्थ प्रतिमानों को उन्होंने उन्मुक्त होकर गढ़ा।

अवतरित होते ही माँ देवकी और पिता वासुदेव जी के बंधन काट दिए। प्रेम के मानकों को देहविहीन बनाने हेतु मोरपंख को अपने शिरोधार्य किये। प्रेम अपनी श्रेष्ठतम अवस्था में मोर-मोरनी को प्राप्त करता है। लोक किंवदंतियों के अनुसार, बारिश में मोर के मुंह से गिरा हुआ पदार्थ खाकर मोरनी गर्भ धारण कर लेती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण चाहे कुछ भी रहे, लोक कथा के अनुसार, यही सत्य है, और भाव के आँगन में विज्ञान कहाँ ठहरता है? आध्यात्म अपने आप में सम्पूर्ण विज्ञान है और प्रेम की इसी परंपरा को आदर्श बनाने हेतु कृष्ण मोरपंख धारण किये हुए हैं।

कृष्ण का अवतार कारावास में इसी ध्येय से हुआ होगा। संसार को दासता के बंधनों से मुक्त करने को मामा कंस को गोलोकधाम पहुंचा दिया। उस प्रयास में कितने ही योद्धाओं को उस बांसुरी वाले ग्वाले ने धूल में मिला धूल कर दिया, वो भी अकेले। न कोई सेना, न कोई राजसी सहायता। ये कृष्ण होने की सामर्थ्य का संदेश था। कल का नटखट कान्हा, आज महावीर कंसजीत हो चुका था।

राधा को अपने गोकुलवासी साधारण कान्हा के साथ से आनंदित किया तो रुक्मणी को अपने महाराज द्वारिकाधीश रूप से। रुक्मणी को ग्वाला कान्हा की हंसी ठिठोली और माखन को मचलते रूप के दर्शन सदा दुर्लभ ही रहे तो राधा को ब्रह्माण्डनायक, महाराज द्वारिकाधीश से दूर रखा।

दैत्य नरकासुर की कैद से सोलह हजार बलत्कृत एवं परित्यक्त महिलाओं को सम्मान सहित अपनी रानी बनने का गौरव मेरे कान्हा के सिवा और कौन दे सकता था? उस नारकीय जीवन से इस सम्मान से सुसज्जित होने की अनंत आनंदकारी यात्रा का नाम ही है कृष्ण। ऐसा महानारिवादी विश्व में कोई और कहाँ हो सका? आत्मग्लानि के बंधन काटता है वो है कृष्ण।

जनमानस को प्रकृति से प्रेम करना भी तो कान्हा ने ही सिखाया। इंद्रदेव को रुष्ट कर, गोवर्धन पर्वत को जो पूजित करा दे वो कृष्ण, जिसने पर्यावरण सुरक्षा की महत्ता को भी दृष्टिगोचर किया होगा।

दुर्योधन की मेवाओं के अनुपम स्वाद को छोड़ विदुरानी के हाथ केले के छिलके खाने वाला कान्हा अपने संबंधियों के विरुद्ध धर्मयुद्ध को अपने मित्र अर्जुन को शिक्षोपदेश गीता जैसा महाकाव्य रच देता है। साधारण वार्तालाप का ऐसा काव्यात्मक वर्णन कि आने वाले हजारों वर्षों तक गीता मानव को मार्गदर्शित करती रहे। विदुराणी को कान्हा के आने का संदेह था लेकिन मन के कोने में एक आस भी थी कि कान्हा हस्तिनापुर आया है तो किंचित मिलने ही आ जाये। कान्हा अब राजनयिक के रूप में हैं, उनसे मिलने अनगिनत लोगों की भीड़ आई होगी, वो मुझसे मिलने क्यूँ आएगा।

इन्हीं वैचारिक उधेडबुनों में विदुराणी को मौसी की आवाज लगाता कान्हा पुकारता है। अपने श्रवण पर संदेह कर जाती हैं विदुराणी। भला जिसके दर्शनों को सारा हस्तिनापुर आ गया हो, वो मेरे लिए समय कहाँ निकाल सकेगा? अरे !! विदुराणी आश्चर्य एवं प्रसन्नता का कोई ओर छोर न था, मौसी कुछ खिला दे, सुबह से भूख लग रही है।

ये है मेरा कान्हा! इतना प्रेम, इतना विश्वास, इतनी श्रद्धा कि सम्पूर्ण संसार के छप्पन भोग को त्याग वो साधारण सा साग विदुर जी के घर खाता है।

कान्हा के लिए कौरवों से राजपाट ले पांडवों को सौंप देना कौन सा बड़ा कार्य था? वो चाहते तो क्षणभर में उस कुल का नाश कर देते जिसमें उनकी सखी, भक्त द्रौपदी का अपमान हुआ? लेकिन कान्हा को जनमानस को संदेश देना था। संदेश नारी के सम्मान की महत्ता का, संदेश नारी को भोग्य पदार्थ समझ लेने की धृष्टता का। पांडवों को द्रौपदी को दांव पर लगाने का दंड मिलना ही था, इसीलिए अर्जुन से धर्मराज तक को उस कसौटी पर कसा गया। धर्मयुद्ध करना पड़ा, अपनों के विरुद्ध, उस कुकृत्य के प्रायश्चित का ये कैसा उपाय था कान्हा? पूछा होगा अर्जुन ने भी। कान्हा ने हंस कर कहा,

“नारी के अपमान का हश्र यही होता है पार्थ! संपूर्ण कुल का विनाश ! यही सनातन की विशिष्टता है, नारी हमारे जीवन के केंद्र में है, सम्मान की सर्वोच्च उपमा, नारी होना है। वो मातृशक्ति है, प्रकृति है, जगतकल्याण की भावना वही है। नारी, इसीलिए जहाँ उसका सम्मान होगा, वहां देवताओं के निवास का विधान है पार्थ!”

कान्हा – विश्व का सर्वश्रेष्ठ नीतिनिर्धारक, मित्र, सारथी, महामानव, जो मित्रता करे तो ऊंच नीच के भाव त्याग दे। बड़े-छोटे के बंधन वो सुदामा से मित्रता कर तोड़ता है तो उसके उच्चतम आदर्श की प्रतिष्ठापना उन्हें अपने राजमहल में सम्मान देकर, उनके पैरों को अपने आंसुओं से धोकर करते हैं। उनके तीन मुट्ठी चावल के बदले उन्हें अनुपम प्रासाद, मणि माणिक्य, स्वर्णादि मुद्रा भंडार की भेंट देता है। सृजन और विनाश को अपने दोनों भुजाओं में लेकर चलने वाला कान्हा जब सृजित करे तो द्वारिका सी महानगरी स्थापित करे, विनाश पर आये तो अपने ही कुल का संहार कर दे।

कान्हा जी के जन्माष्टमी महापर्व की अशेष शुभ मङ्गलकामनाएं !!

वन्दे कृष्णं जगद्गुरुम!!

राजनीति के बाबूजी: आदरणीय श्री कल्याण सिंह जी को श्रद्धांजलि

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भारत की राजनीति का केंद्रबिंदु, पिछले तीन दशक से अयोध्या रही है। कभी इक्ष्वाकु वंश की राजधानी कालांतर में इतनी महत्वपूर्ण होगी, सतयुगीय भगवान श्रीराम चंद्रजी जी ने भी सोचा होगा? अयोध्या को उसका वास्तविक स्वरुप मिलने को है, राममंदिर अपनी दिव्य भव्यता के लिए अगले कुछ वर्षों में पहचाना जाएगा। विश्व पर्यटन के मानचित्र पर अयोध्या एक नवांकुर है जो पुष्पित, पल्लवित होकर राजकोष को राजस्व की सुगंध से महका देगा, जिसके कारण विकासकार्य निर्बाध रूप से आगे बढ़ेंगे। अयोध्या का अर्थ विकास और प्रगति होगा।

लेकिन अयोध्या के इस स्वप्नरूप के मूर्तरूप में परिवर्तित होने का सबसे बड़ा श्रेय जिन आदरणीय कल्याण सिंह जी को जाता है, उनका कल यानी 22 अगस्त को निधन हो गया। भारतीय राजनीति के बाबूजी चले गए। वे 89 वर्ष के थे। लखनऊ के संजय गाँधी पीजीआई में भर्ती थे। उन्हें संक्रमण एवं सांस लेने में तकलीफ की शिकायत थी।

श्री कल्याण सिंह जी

विभिन्न राजनितिक हस्तियों, जिनमें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री आदि ने शोकसंवेदनाएँ प्रकट कर उनके जाने को दुखद बताया। उत्तर प्रदेश में तीन दिवसीय राजकीय शोक की घोषणा की गई है।

बेहद सुलझे हुए एवं शिक्षा में शुचिता के विचारक श्री कल्याण सिंह जी ने नकलविहीन परीक्षा की संकल्पना की और परीक्षाओं में नक़ल रोकने को सारा प्रशासनिक अमला लगा दिया। ये सम्मान था, मेहनत का, शिक्षा को विद्या समझने का, ईमानदारी और स्वाभिमान के भावों को इससे बेहतर कोई कैसे सम्मानित कर सकता था।

आदरणीय कल्याण सिंह जी की एक और पहचान थी, जिसके लिए वो सदैव गौरवान्वित रहते थे। राम कारज हेतु उन्होंने अपनी सरकार का त्यागपत्र तक सौंप दिया लेकिन रामभक्तों पर गोलीबारी नहीं होने दी। इस आदेश के कारण उन्होंने ढांचा गिरने की जिम्मेदारी भी खुद ओढ़ ली। अपनी जिम्मेदारी मानते हुए, जेल भी गए लेकिन राममंदिर निर्माण का ध्येय जीवनभर ह्रदय में धारण किये रहे। कल्याण सिंह का जन्म 5 जनवरी 1932 को उत्तरप्रदेश के अतरौली में हुआ था. उनके पिता का नाम तेजपाल सिंह लोधी और मां का नाम सीता देवी था।

वृन्दावन के वात्सल्यग्राम की स्थापना में श्री कल्याण सिंह जी का अहम योगदान रहा। समाज की सेवा के इस अग्रणी प्रकल्प के संकल्पों को देखते हुए आदरणीय श्री कल्याण सिंह जी ने कानूनी जटिलताओं के समाधान में अग्रणी भूमिला निभाई।

श्री कल्याण सिंह जी

एक अग्रणी जननायक, नक़ल जैसी छोटी किन्तु चिंचित करती सामाजिक बुराइयों को दूर करते जननायक, अतुलित रामभक्त, पूर्व मुख्यमंत्री श्री कल्याण सिंह जी को वात्सल्य परिवार की ओर से अश्रुपूरित श्रद्धांजलि।

विश्व संस्कृत दिवस की शुभकामनाएं

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संस्कृत भारतीय संस्कृति की परिचायक भाषा है। संस्कृत एक परिष्कृत, वैज्ञानिक एवं संस्कारित भाषा है। आदिसंस्कृति की परिचायक संस्कृत विश्व की प्राचीनतम भाषाओँ में से एक है। इसका अपना स्वविकसित शब्दकोष है जिसमें १०० अरब से अधिक शब्द हैं। भारत की प्राचीनतम भाषा संस्कृत में भारत का सर्वस्व संन्निहित है। देश के गौरवमय अतीत को हम संस्कृत के द्वारा ही जान सकते हैं। संस्कृत भाषा का शब्द भण्डार विपुल है। यह भारत ही नहीं अपितु विश्व की समृद्ध एवं सम्पन्न भाषा है। भारत का समूचा इतिहास संस्कृत वाड्मय से भरा पड़ा है। आज प्रत्येक भारतवासी के लिए विशेषकर भावी पीढ़ी के लिए संस्कृत का ज्ञान बहुत ही आवश्यक है।

संस्कृत भाषा का अपना एक वैज्ञानिक महत्व है। नासा के वैज्ञानिकों के अनुसार संस्कृत एक सम्पूर्ण वैज्ञानिक भाषा है। प्राचीन भारत में बोल-चाल की भाषा में संस्कृत का ही उपयोग किया जाता था। इससे नागरिक अधिक और मानसिक रूप से अधिक संतुलित रहा करते थे। संस्कृत के मंत्रों का उच्चारण करते समय मानव स्वास्थ्य पर विशेष प्रभाव पड़ता है। मंत्रोच्चार के समय वाइब्रेशन से शरीर के चक्र जागृत होते हैं और मानव का स्वास्थ्य बेहतर रहता है। बहुत सी विदेशी भाषाएं भी संस्कृत से जन्मी हैं। फ्रेंच, अंग्रेजी के मूल में संस्कृत निहित है। संस्कृत में सबसे महत्वपूर्ण शब्द ‘ऊँ’ अस्तित्व की आवाज और आंतरिक चेतना एवं ब्रम्हाण्ड का स्वर है। प्राचीन धरोहर की खोज करने का मुख्य मापदण्ड संस्कृत है। संस्कृत की महत्ता को देखते हुए जर्मनी में 14 से अधिक विश्व विद्यालयों में संस्कृत का अध्ययन कराया जाता है।

संस्कृत विश्व की सबसे वैज्ञानिक भाषा है।नासा के वैज्ञानिकों के अनुसार संस्कृत आर्टिफिशयल इंटेलीजेस को नया आयाम देगी। विश्व संस्कृत दिवस पर आत्मीय बधाई।

इतिहास के माथे पर वीरता का तिलक: काकोरी कांड

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९ अगस्त १९२५ सिर्फ एक तारीख नहीं, इतिहास के सबसे रौशन दस्तावेजों पर वीरता का हस्ताक्षर है। उस रात आसमान में तारे कुछ ज्यादा टिमटिमा रहे थे। रात कुछ उजली सी थी, तारे मानो इंतजार में पलकें बिछाये थे, उस घटना के, जिसने अंग्रेजों की चूलें हिला कर रख दी थीं। ये घटना काकोरी कांस्पीरेसी के नाम से लिखी, पढ़ी गई लेकिन ये घटना राष्ट्र चेतना को जगाने वाली साबित हुई।


असहयोग आंदोलन की वापसी के बाद कांग्रेस दो गुटों में बंट गई थी। इसमें से कुछ युवाओं ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की नींव रखी जिसमें रामप्रसाद बिस्मिल और सचिंद्र नाथ सान्याल प्रमुख थे। यह दल अंग्रेजी हुकूमत को भारत छोड़ने पर विवश करना चाहता था। पंडित रामप्रसाद ‘बिस्मिल’, अशफ़ाक़ उल्लाह खान, सच्चिन्द्रनाथ सान्याल, चंद्रशेखर आज़ाद, राजेन्द्रनाथ लाहिरी इनमें प्रमुख सदस्य थे।


इस दल की विचारधारा स्पष्ट थी। हिंसा को रोकने का उपाय, प्रत्युत्तर में की गई अधिक हिंसा ही है। अंग्रेजों से डरे हुए हिन्दुस्तानियों का डर, अंग्रेजों के मन में भर, उन्हें भगाना इनका मकसद था। १९२५ तक अनेकों क्रियाकलापों के माध्यम से इस दल ने अंग्रेजों को समझाने का प्रयास किया कि भारत का युवा अब उठ खड़ा हुआ है। वो ‘टिट फॉर टैट’ की नीति में विश्वास रखता है।

विश्व का प्रत्येक युद्ध और उसका नीति निर्धारण ‘अर्थ’ तय करता है। हथियारों की व्यवस्था से रसद के सामान तक, प्रशिक्षण से आधुनिकीकरण तक, ‘अर्थ’ सबसे प्रमुख भूमिका निभाता है। भारत के भाग्य का निर्धारण करने वाला पानीपत का अंतिम युद्ध इसका सबसे बड़ा प्रमाण है जहाँ मराठों ने अब्दाली से भूखे पेट लड़ाई लड़ी थी। दूसरी ओर अब्दाली को इस संकट का सामना नहीं करना पड़ा, जिससे इस युद्ध का परिणाम निश्चित हो गया था।


हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन को हथियारों के लिए धन की कमी पड़ने लगी तो बैठक बुलाई गई, विचार विमर्श हुआ, तय किया गया कि हिंदुस्तानी पैसे का इस्तेमाल हिंदुस्तान की आज़ादी में होगा। उन नरसिंहों ने अंग्रेजों के कब्जे में भारतीय खजाने को छीन लेने की योजना बनाई। इसी घटना को काकोरी कांड के नाम से जाना जाता है।

काकोरी: गर्व है


सहारनपुर से लखनऊ जाने वाली ट्रेन में जाने वाले खजाने को छीन लेने की योजना पर काम शुरू हुआ। राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी, चंद्रशेखर आजाद, सचिंद्र बख्शी, केशव चक्रवर्ती, मनमथनाथ गुप्ता, मुरारी लाल गुप्ता (मुरारी लाल खन्ना), मुकुंदी लाल (मुकुंदी लाल गुप्ता) और बनवारी लाल काकोरी कांड में शामिल प्रमुख क्रांतिकारी थे।


काकोरी काण्ड के उद्देश्य

काकोरी कांड का उद्देश्य एक क्रांति के माध्यम से भारत को ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से मुक्त करना था जिसमें सशस्त्र विद्रोह शामिल था। बल के माध्यम से ब्रिटिश प्रशासन से धन लेकर एचआरए के लिए धन प्राप्त करना, भारतीयों के बीच हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की सकारात्मक छवि बनाना और न्यूनतम क्षति के साथ एक ब्रिटिश सरकार पर हमला करना इस दल के प्रमुख उद्देश्य थे।


काकोरी कांड घटनाक्रम


लूट की योजना राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्लाह खान ने बनाई थी। इसे बिस्मिल, खान, चंद्रशेखर आजाद, राजेंद्र लाहिड़ी, शचींद्र बख्शी, केशव चक्रवर्ती, मुरारी लाल खन्ना (गुप्ता), बनवारी लाल, मुकुंदी लाल गुप्ता और मनमथनाथ गुप्ता ने अंजाम दिया था। निशाने पर गार्ड केबिन था, जो लखनऊ में जमा किए जाने वाले विभिन्न रेलवे स्टेशनों से एकत्र किए गए धन को ले जा रहा था। हालांकि क्रांतिकारियों द्वारा किसी भी यात्री को निशाना नहीं बनाया गया था, लेकिन गार्ड और क्रांतिकारियों के बीच गोलीबारी में अहमद अली नाम का एक यात्री मारा गया था। इससे यह हत्या का मामला बन गया।


८ अगस्त १९२५: हथियार खरीदने के लिए सरकारी खजाने को लूटने का फैसला बैठक में लिया गया।
९ अगस्त १९२५: क्रांतिकारियों ने सहारनपुर से लखनऊ के लिए काकोरी के पास नंबर 8 डाउन ट्रेन को रोका और गार्ड केबिन से 8000 रुपये लूट लिए। ब्रिटिश प्रशासन ने क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करने के लिए एक अभियान शुरू किया।
२६ सितंबर १९२५: राम प्रसाद बिस्मिल को औपनिवेशिक अधिकारियों ने गिरफ्तार किया। मुकदमा २१ मई १९२६ को ए.हैमिल्टन के सत्र न्यायालय में आगे बढ़ता है।
१९२६: अशफाकउल्ला खान और शचींद्र बख्शी को मुकदमे की समाप्ति के बाद गिरफ्तार किया गया।


घटना के बाद कई क्रांतिकारी लखनऊ भाग गए। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, मुकदमे के दौरान ४० लोगों को गिरफ्तार किया गया था। चंद्रशेखर आजाद, जिन्हें पकड़ा नहीं जा सका, ने एचआरए को पुनर्गठित किया और १९३१ तक संगठन चलाया। २७ फरवरी को पुलिस के साथ गोलीबारी में उन्होंने गंभीर रूप से घायल होने के बाद खुद को गोली मार ली।


काकोरी कांड ब्रिटिश औपनिवेशवाद के चेहरे पर पड़ा एक करारा थप्पड़ था, जिसने उनकी ‘अहम ब्रह्मास्मि’ वाली मानसिकता को चोट पहुंचाई। इस घटना ने अनेकों युवाओं को क्रांतिकारी विचारों के साथ जोड़ा।


काकोरी कांड का अंतिम फैसला जुलाई १९२७ में सुनाया गया था। अदालत ने सबूतों के अभाव में लगभग १५ लोगों को छोड़ दिया था। राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्लाह खान, ठाकुर रोशन सिंह, राजेंद्र लाहिड़ी को मौत की सजा दी गई। जबकि सचिंद्र बख्शी और सचिन्द्र नाथ सान्याल को पोर्ट ब्लेयर, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में सेलुलर जेल में निर्वासन की सजा सुनाई गई थी।


काकोरी कांड एक ऐतिहासिक हस्ताक्षर है अन्याय के विरोध में डटकर खड़े होने की। हिंसा के प्रत्युत्तर में इक्वल एंड अपोजिट रिएक्शन की। स्वाभिमान से चलने और सबका सम्मान करने का सबक याद कराने की।

आज काकोरी कांड की ९६वीं वर्षगाँठ पूरे देश में मनाई गई। इन क्रांतिवीरों को श्रद्धासुमन अर्पित किये गए। इन वीर नरसिंहों को वात्सल्य परिवार का शत शत नमन।

संघर्ष से गौरव की यात्रा है ये स्वर्ण

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स्वर्ण – मानव समाज की सर्वप्रिय धातु। स्वर्ण मात्र एक धातु ही नहीं है, मानव समाज के गौरव का प्रतीक भी रहा है। परिवर्तनशील इस विश्व में, इस धातु के प्रति आसक्ति ही है जो आदि काल से परिवर्तित न हो सकी। आभूषणों से महिलाओं के सौंदर्य में अगणित वृद्धि मानी जाती है तो यहाँ भी स्वर्ण का प्रयोग ही सर्वाधिक होता है।

सोने की लंका से सोने के तमगे तक का सफर, मानव समाज के तमाम आयामों को खुद में समेटे हुए है। इस कालखंड में मानव समाज प्रगतिपथ पर बढ़ा या निम्नता के नित नए कीर्तिमान गढ़ता रहा, ये विमर्श का विषय है।

इसी बीच, खेलों के महाकुंभ, ओलंपिक में, भालाफेंक प्रतियोगिता में एक युवा अपने देश के लिए स्वर्णपदक लाता है। हो सकता है कि हमें लगे कि इसमें नया क्या है। अनेकों प्रतिभागियों को स्वर्ण मिला है, चीन से अमरीका तक की झोलियाँ भर गईं हैं तो इस एक पदक का इतना महिमामंडन क्यूँ?

जी, इस विजय में भी कुछ अनूठा नहीं है। किसी न किसी को तो जीतना ही था। तो नीरज चोपड़ा ने विजयश्री का वरण किया। निश्चित रूप से यहाँ तक आने के क्रम में हमारे विचारों से बहुत उच्च स्तर की मेहनत रही है, किस्मत भी, लेकिन यकीन जानिए, ये विजय बहुत ख़ास है। आइये, जानते हैं कारणों को जिन्होंने इस युवक को सवा सौ करोड़ लोगों को उत्सव का एक पर्व दे दिया। मनाइये, क्यूंकि इस विजयश्री का वरण अन्य तमाम विजेताओं जैसा नहीं है। कुछ अलग, कुछ खास है।

१. एथलेटिक स्पर्धा में प्रथम पदक – वो भी स्वर्ण
भारत के ओलंपिक खेलों में प्रतिभागिता के इन तमाम वर्षों में एथलेटिक स्पर्धा में ये पहला पदक है ,पहला ही स्वर्ण है। देर हुई है लेकिन शुरुआत बहुत शानदार हुई है।

२. प्राकृतिक रूप से कठिन था जीतना
भालाफेंक एक ऐसी प्रतियोगिता है जिसमें कई तथ्य देखने होते हैं। भालाफेंक में खिलाडी की ऊंचाई और वजन का बहुत महत्व होता है। भाले का रिलीज़ पॉइंट, रिलीज़ एंगल भी अहम भूमिका निभाता है। हवा के विपरीत दिशा में रिलीज़ एंगल ३४ डिग्री से कम रखना होता है। नीरज ने अपनी दौड़ तेज की, एंगल बदला और उनके भाले की दूरी बढ़ गई।
यहाँ ये भी दृष्टिगोचर है कि ९७ मीटर का रिकॉर्डधारी खिलाडी वेटल भी इन्हीं तथ्यों के कारण ८२ मीटर तक जा सका और हार गया।

३. मेहनत, समर्पण और जूनून
अपनी सफलता में व्यवधान उत्पन्न न होने के लिए, नीरज ने अपना संपर्क लोगों से लगभग ख़त्म कर लिया था। सारा ध्येय, उद्देश्य से सफलता की यात्रा पर रहा और सफलता का वरण कर लिया।

४. खेल मतलब क्रिकेट
भारतीय उपमहाद्वीप में खेलों का अर्थ, क्रिकेट तक ही सीमित है। ऐसे में भालाफेंक जैसी मेहनतकश प्रतियोगिता में भाग लेना बहुत बड़ी बात है। इस स्वर्णपदक से निश्चित तौर पर लोगों का ध्यान भालाफेंक और गोलाफेंक जैसी प्रतियोगिताओं पर केंद्रित होगा, कुछ अच्छे एथलीट आगे आएँगे और देश के मैडल बढ़ेंगे।

५. उम्र
जिस उम्र में लोग प्रेम प्रसंगों से लेकर कविताओं के खुमार में होते हैं, नीरज ओलंपिक चैंपियन बन चुके हैं। ये सफलता उन लोगों के लिए एक प्रेरणा है जो अपनी कम उम्र का बहाना बनाकर गलत राह चुन लेते हैं। ये प्रेरणा उन लोगों के लिए भी है जिसमें लोग कहते हैं कि भारतीय समाज में ३० वर्ष की आयु तक ‘करना क्या है’ इसकी भी जानकारी लोगों को नहीं हो पाती।
इस उम्र में बहकने का, फिसलने का और कहीं और निकल जाने की तमाम शंकाओं को निराधार किया है इस नवप्रदीप्त सूर्य नीरज ने।

ओलिंपिक मात्र एक स्पोर्टिंग इवेंट नहीं है, ये अपने सामर्थ्य और शक्ति से जगत को अवगत कराने का महापर्व है। इसमें निरंतरता, कड़ी मेहनत और हार न मानने वाले तेवर के जीतने का उत्सव है। यहाँ खेल ही नहीं होते, राष्ट्र चरित्रों का परीक्षण होता है, जिसमें एक युवा भारतीय ने समूचे विश्व को ‘उन ५२ सेकंड’ जन गण मन की धुन पर झूमने का अवसर दे दिया।

वात्सल्य परिवार की ओर से अनंतकोटि शुभकामनाएं!!

जय हो, विजय हो!!
वीरभोग्या वसुंधरा!!

विश्व पर्यावरण संरक्षण दिवस विशेष

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“खुशी की पहली शर्तों में से एक यह है कि मनुष्य और प्रकृति के बीच की कड़ी को नहीं तोड़ा जाना चाहिए।”

प्रसिद्ध रूसी लेखक लियो टॉलस्टॉय

एक निश्चित समय पर, भोर में, वो पाखी बोल पड़ता था। न जाने कौन सी कलघड़ी उसकी आत्मा में थी। उसका कंठ कोमल था, आवाज में व्यग्रता नहीं थी, संध्या को वापस लौटने की उत्कंठा भी नहीं। उसमें किसी शुभारंभ सी एक तन्मय अन्विति थी, मीठा कलरव भी। रोज सुबह के ४ बजे, जब अँधेरे में कुछ भी नहीं दिखता था, पाखी अपनी उपस्थिति दर्ज करा देता था। अँधेरे में न वो दीखता, न पेड़, लेकिन उसके स्वर का आलोक एकांत में कांपता रहता।

एक अनुशासित नियम, भोर होते ही, जैसे सबको अपने होने के भाव से परिचित कराकर जाने कहाँ चला जाता। दिन में नहीं मिलता था, न जाने दिखता कैसा था, किंतु रोज सुबह उसके नियमित गायन के श्रवण के कारण उसकी स्वरसाधना से परिचय हो ही गया। एकांतिकता का एक विशेष सम्मोहन होता है, एकांत अपनी एकरसता से एक परिचित से उद्वेग का सुख रचता है। तभी वो पाखी बोल देता – मित्र! तुम भले अकेले हो किंतु एकांत एकाकी नहीं, वो दुकेला ही है, उसकी संगति का एक साथी भी है।

अब उस पाखी की आवाज नहीं आती। भोर में आवाज देता पाखी अब नहीं बतियाता। शायद पर्यावरण दिवस की किसी महत्वपूर्ण बैठक में सम्मिलित होने जाते किसी अतिविशिष्ट अतिथि के वाहन के प्रदूषित अवशेषों ने उसके जीवन को हर लिया हो अथवा फेफड़ों में सीसा भर गया हो, जिससे उस जैसे अनेकों खगकुल ने समयपूर्व वानप्रस्थ की दीक्षा ले ली हो।

आज विश्व पर्यावरण संरक्षण दिवस है। संरक्षण एक शब्द मात्र नहीं अपितु एक जिम्मेदारी और उस जिम्मेदारी को समझने की महती आवश्यकता का नाम है। संरक्षण उस परि आवरण का, जो रक्षक है हमारे शरीर का, स्वास्थ्य का, संसाधनों का एवं जीवित रहने की जिजीविषा का। पर्यावरण वैश्विक महत्व के सर्वोच्च सोपान पर आसीन है, इसके संरक्षण का विवेचन अनेकों देश प्रत्येक वर्ष संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर करते हैं।

पर्यावरण क्षरण एक समस्या मात्र नहीं है, एक अस्तित्वगत संकट है जिससे उबरना अत्यंत आवश्यक हो चला है। पर्यावरण संरक्षण विषयों पर प्रांतीय, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बैठकों एवं वार्ताओं क श्रृंखला चल निकली है, पाठ्यक्रमों ने इस विषय का चुनाव पठन पाठन हेतु किया है, इससे इस विषय की सर्वस्वीकार्यता का अनुमान लगाया जा सकता है। समुद्र के स्तर का निरंतर बढ़ना, वृक्षों का कटान, मृदा अपरदन, बढ़ता कार्बन उत्सर्जन पर्यावरण को निरंतर प्रभावित करता जा रहा है।

भारतवर्ष जैसे देशों में निरंतर प्राकृतिक आपदाएं आती ही रहती हैं। इन आपदाओं में भूस्खलन, बाढ़, सूखा जैसी समस्याएं जनसामान्य को अधिक प्रभावित करती हैं। वर्षाकाल में प्रतिवर्ष होती कोसी एवं ब्रह्मपुत्र नदियों का तटीय क्षेत्रों में बाढ़ के कारण नुकसान दृष्टिगोचर होता ही है। पर्वतीय क्षेत्रों में निरंतर होते भूस्खलन के कारण मार्गों का बंद होना भी नियमित ही लगता है।

आज विश्व पर्यावरण संरक्षण दिवस के अवसर पर हमें ये प्रण लेना होगा कि अपनी संततियों को ऋतुओं के व्यावहारिक ज्ञान के लिए, तापमान के संतुलित परिवर्तन के लिए एवं सुरक्षित पर्वतीय एवं तटीय जीवन के लिए पर्यावरण संरक्षण का महत्व समझें। अधिक से अधिक सौर ऊर्जा के वैकल्पिक माध्यमों का निर्माण एवं वितरण प्रारंभ हो, जीवाश्म संचालित ईधनों पर निर्भरता कम की जाये, कार्बन उत्सर्जन को कम से कम किया जाये, सामाजिक स्तर पर वृक्षारोपण के कार्यक्रमों की संख्या में बढ़ोत्तरी जाये, वृक्षों का कटाव, मृदा अपरदन, धूम्रपान जैसे अवगुणों को कम करते हुए समाप्त किया जा सके।

वो पाखी आज भी भोर में गीत सुनाना चाहता है किन्तु हमारी पर्यावरण क्षरण की हठधर्मिता उसे हमारी संततियों से दूर किया है। आइये, मिलकर पर्यावरण के क्षरण को रोक कर संरक्षण को बढ़ावा दें, ताकि उस मधुरकंठीय पाखी को पुनः सुन सकें।

कारगिल विजय – गर्व है

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भारतवर्ष – एक देश से ज्यादा एक संबल है – मानवता के लिए, धर्म के लिए, प्रगतिशील दृष्टिकोण की सार्वभौमिक संभावनाओं के सतत विकास के लिए, सांप्रदायिक गतिरोध को समाप्त कर सहअस्तित्व की विचारधाराओं के प्रखर सम्प्रेषण की मान्यताओं को आगे बढ़ने वाली सोच है भारत।। ये देश विविधताओं का, वांगमय का, संस्कृति का, कला का, और सबसे बढ़कर वीरता का वैश्विक स्तर पर एक प्रतीक है। वैश्विक शांति का प्रश्न हो अथवा विज्ञान से आध्यात्म का, प्रथम संदेश सदासर्वदा भारतवर्ष से ही प्रेषित हुआ है जिसने विश्व कल्याण की अवधारणाओं को जीवंत रूप दिया है।

भारतवर्ष की उन्नत प्रतिभाओं द्वारा अर्जित की गई ख्याति जब सुदूर विश्व में फैलने लगी तो कुछ लुटेरों के झुंड इस सोने की चिड़िया को लूटने को प्रेरित हुए। एक धर्मांध आक्रांता ने जब नालंदा विश्वविद्यालय को जलाया तो उस विश्वविद्यालय के पुस्तकालय को ही जलने में छह मास से अधिक समय लग गया जिसमें 90 लाख अधिक पुस्तकें जला दी गईं। उस स्तर की बौद्धिकता का देश है भारतवर्ष जिसपर कुदृष्टियों की होड़ लग गई। हजार वर्षों तक सतत प्रयास हुए, हमारी सांस्कृतिक गौरवशाली पहचान को मिटाने के, मंदिर तोड़े गए, धर्म आधारित कर व्यवस्था लागु की गई, महिलाओं को वस्तु समझ अपमानित किया गया किन्तु कुछ तो विशेषताओं का परिचायक सनातन समाज है कि हम आज भी विश्व को दैदीप्यमान कर रहे हैं।

ऐसी ही एक कुटिल कुदृष्टि हमारे पड़ोस में वर्ष १९४७ से सतत प्रयासरत है, हमें तोड़ने के लिए, हमारी जमीन छीनने के लिए, हमें अपमानित करने के लिए किन्तु भारतवर्ष सदैव खड़ा है, अपनी हिमालयी अटल पहचान लिए।

अपने एक ऐसे ही धूर्तता पूर्ण प्रयास में कुटिल धर्मांध पडोसी ने वर्ष १९९९ को कारगिल की कुछ चोटियों पर अनैतिक कब्ज़ा कर लिया था। ये वर्ष का वो समय था जब दोनों ओर की सेनाएं अपनी चोटियों से नीचे आ जाती हैं। भारतीय सेना के अपनी वास्तविक चोटियों से नीचे आने पर शत्रु सेना के सैनिक, इन चोटियों पर चढ़ गए। इनकी संख्या कुछ हजार में थी। शत्रु लाभदायक स्थिति में था, हमारी प्रत्येक हलचल को देख रहा था। लड़ाई बिना चोटी पर पहुंचे नहीं जीती जा सकती थी। किसी भी सेना के लिए ये युद्ध जीतना लगभग असंभव था, किन्तु भारतीय समाज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ना और जीतना सदियों से जानता है, यहाँ भी वही परिस्थिति सेनाओं के बाहुबल को ललकार रही थी।

भारतीय सेना ने अपनी चोटियां वापस लेने के जिस प्रयास को मई १९९९ में प्रारम्भ किया, उसके लिए अदम्य साहस, अचूक रणनीति, शारीरिक सामर्थ्य की महती आवश्यकता होती है। उदाहरणार्थ, जिस चोटी को परमवीर कप्तान विक्रम बत्रा ने वापस प्राप्त किया था, उसकी वो १७००० फ़ीट की ऊंचाई पर थी। इस स्तर पर जीवित रहना ही संघर्ष है जिसमें कप्तान बत्रा ने सीधी चढ़ाई के बाद बंकर उड़ाए, अपने साथियों की प्राणत्याग रक्षा की, ५ शत्रुओं को निहत्थे रहते मार दिया था। अपनी वीरता के ऐसे ही अदम्य साहस के लिए कप्तान मनोज पांडे, अनुज नायर जैसे ५२७ वीर शहीद हुए थे, किन्तु उनकी शूरवीरता उन्हें अमर कर गई।

ये युद्ध किसी भी सेना के लिए लड़ पाना लगभग असंभव था, जीतना तो बहुत दूर की बात है। वो व्यक्तित्व जो लड़ते हुए शहीद हुए, आम जनमानस में नहीं मिलते जिसमें एक २४ वर्षीय युवा हर बुधवार को रात ८ बजे नियत समय पर चंडीगढ़ फोन करता था, जिसने कहा था, या तो जीतकर आऊंगा या तिरंगे में लिपटकर, लेकिन आऊंगा जरूर। अपने वचन के अनुसार वो वीर, जिसके खौफ में शत्रु ने उसका नाम शेरशाह रख दिया था, वापस आया लेकिन तिरंगे में लिपटकर।

आज कारगिल विजय दिवस है। पाकिस्तानी भेड़ियों की मांद में जाकर उनके दांत खट्टे करने वाले योद्धाओं की वीरता का अभिनंदन करने का, उन्हें सम्मान प्रदर्शित करने का, उनके प्रति अपनी भावनाओं प्रदर्शित करने का दिन। उन कहानियों को कहने का, सुनने का, समझने का दिन, जिस दिन ‘वीर भोग्या वसुंधरा’ को पुनः चरितार्थ किया गया।

कारगिल दिवस की समस्त देशवासियों को वात्सल्यपूर्ण शुभकामनाएं।