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July 2021

विश्व पर्यावरण संरक्षण दिवस विशेष

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“खुशी की पहली शर्तों में से एक यह है कि मनुष्य और प्रकृति के बीच की कड़ी को नहीं तोड़ा जाना चाहिए।”

प्रसिद्ध रूसी लेखक लियो टॉलस्टॉय

एक निश्चित समय पर, भोर में, वो पाखी बोल पड़ता था। न जाने कौन सी कलघड़ी उसकी आत्मा में थी। उसका कंठ कोमल था, आवाज में व्यग्रता नहीं थी, संध्या को वापस लौटने की उत्कंठा भी नहीं। उसमें किसी शुभारंभ सी एक तन्मय अन्विति थी, मीठा कलरव भी। रोज सुबह के ४ बजे, जब अँधेरे में कुछ भी नहीं दिखता था, पाखी अपनी उपस्थिति दर्ज करा देता था। अँधेरे में न वो दीखता, न पेड़, लेकिन उसके स्वर का आलोक एकांत में कांपता रहता।

एक अनुशासित नियम, भोर होते ही, जैसे सबको अपने होने के भाव से परिचित कराकर जाने कहाँ चला जाता। दिन में नहीं मिलता था, न जाने दिखता कैसा था, किंतु रोज सुबह उसके नियमित गायन के श्रवण के कारण उसकी स्वरसाधना से परिचय हो ही गया। एकांतिकता का एक विशेष सम्मोहन होता है, एकांत अपनी एकरसता से एक परिचित से उद्वेग का सुख रचता है। तभी वो पाखी बोल देता – मित्र! तुम भले अकेले हो किंतु एकांत एकाकी नहीं, वो दुकेला ही है, उसकी संगति का एक साथी भी है।

अब उस पाखी की आवाज नहीं आती। भोर में आवाज देता पाखी अब नहीं बतियाता। शायद पर्यावरण दिवस की किसी महत्वपूर्ण बैठक में सम्मिलित होने जाते किसी अतिविशिष्ट अतिथि के वाहन के प्रदूषित अवशेषों ने उसके जीवन को हर लिया हो अथवा फेफड़ों में सीसा भर गया हो, जिससे उस जैसे अनेकों खगकुल ने समयपूर्व वानप्रस्थ की दीक्षा ले ली हो।

आज विश्व पर्यावरण संरक्षण दिवस है। संरक्षण एक शब्द मात्र नहीं अपितु एक जिम्मेदारी और उस जिम्मेदारी को समझने की महती आवश्यकता का नाम है। संरक्षण उस परि आवरण का, जो रक्षक है हमारे शरीर का, स्वास्थ्य का, संसाधनों का एवं जीवित रहने की जिजीविषा का। पर्यावरण वैश्विक महत्व के सर्वोच्च सोपान पर आसीन है, इसके संरक्षण का विवेचन अनेकों देश प्रत्येक वर्ष संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों पर करते हैं।

पर्यावरण क्षरण एक समस्या मात्र नहीं है, एक अस्तित्वगत संकट है जिससे उबरना अत्यंत आवश्यक हो चला है। पर्यावरण संरक्षण विषयों पर प्रांतीय, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बैठकों एवं वार्ताओं क श्रृंखला चल निकली है, पाठ्यक्रमों ने इस विषय का चुनाव पठन पाठन हेतु किया है, इससे इस विषय की सर्वस्वीकार्यता का अनुमान लगाया जा सकता है। समुद्र के स्तर का निरंतर बढ़ना, वृक्षों का कटान, मृदा अपरदन, बढ़ता कार्बन उत्सर्जन पर्यावरण को निरंतर प्रभावित करता जा रहा है।

भारतवर्ष जैसे देशों में निरंतर प्राकृतिक आपदाएं आती ही रहती हैं। इन आपदाओं में भूस्खलन, बाढ़, सूखा जैसी समस्याएं जनसामान्य को अधिक प्रभावित करती हैं। वर्षाकाल में प्रतिवर्ष होती कोसी एवं ब्रह्मपुत्र नदियों का तटीय क्षेत्रों में बाढ़ के कारण नुकसान दृष्टिगोचर होता ही है। पर्वतीय क्षेत्रों में निरंतर होते भूस्खलन के कारण मार्गों का बंद होना भी नियमित ही लगता है।

आज विश्व पर्यावरण संरक्षण दिवस के अवसर पर हमें ये प्रण लेना होगा कि अपनी संततियों को ऋतुओं के व्यावहारिक ज्ञान के लिए, तापमान के संतुलित परिवर्तन के लिए एवं सुरक्षित पर्वतीय एवं तटीय जीवन के लिए पर्यावरण संरक्षण का महत्व समझें। अधिक से अधिक सौर ऊर्जा के वैकल्पिक माध्यमों का निर्माण एवं वितरण प्रारंभ हो, जीवाश्म संचालित ईधनों पर निर्भरता कम की जाये, कार्बन उत्सर्जन को कम से कम किया जाये, सामाजिक स्तर पर वृक्षारोपण के कार्यक्रमों की संख्या में बढ़ोत्तरी जाये, वृक्षों का कटाव, मृदा अपरदन, धूम्रपान जैसे अवगुणों को कम करते हुए समाप्त किया जा सके।

वो पाखी आज भी भोर में गीत सुनाना चाहता है किन्तु हमारी पर्यावरण क्षरण की हठधर्मिता उसे हमारी संततियों से दूर किया है। आइये, मिलकर पर्यावरण के क्षरण को रोक कर संरक्षण को बढ़ावा दें, ताकि उस मधुरकंठीय पाखी को पुनः सुन सकें।

कारगिल विजय – गर्व है

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भारतवर्ष – एक देश से ज्यादा एक संबल है – मानवता के लिए, धर्म के लिए, प्रगतिशील दृष्टिकोण की सार्वभौमिक संभावनाओं के सतत विकास के लिए, सांप्रदायिक गतिरोध को समाप्त कर सहअस्तित्व की विचारधाराओं के प्रखर सम्प्रेषण की मान्यताओं को आगे बढ़ने वाली सोच है भारत।। ये देश विविधताओं का, वांगमय का, संस्कृति का, कला का, और सबसे बढ़कर वीरता का वैश्विक स्तर पर एक प्रतीक है। वैश्विक शांति का प्रश्न हो अथवा विज्ञान से आध्यात्म का, प्रथम संदेश सदासर्वदा भारतवर्ष से ही प्रेषित हुआ है जिसने विश्व कल्याण की अवधारणाओं को जीवंत रूप दिया है।

भारतवर्ष की उन्नत प्रतिभाओं द्वारा अर्जित की गई ख्याति जब सुदूर विश्व में फैलने लगी तो कुछ लुटेरों के झुंड इस सोने की चिड़िया को लूटने को प्रेरित हुए। एक धर्मांध आक्रांता ने जब नालंदा विश्वविद्यालय को जलाया तो उस विश्वविद्यालय के पुस्तकालय को ही जलने में छह मास से अधिक समय लग गया जिसमें 90 लाख अधिक पुस्तकें जला दी गईं। उस स्तर की बौद्धिकता का देश है भारतवर्ष जिसपर कुदृष्टियों की होड़ लग गई। हजार वर्षों तक सतत प्रयास हुए, हमारी सांस्कृतिक गौरवशाली पहचान को मिटाने के, मंदिर तोड़े गए, धर्म आधारित कर व्यवस्था लागु की गई, महिलाओं को वस्तु समझ अपमानित किया गया किन्तु कुछ तो विशेषताओं का परिचायक सनातन समाज है कि हम आज भी विश्व को दैदीप्यमान कर रहे हैं।

ऐसी ही एक कुटिल कुदृष्टि हमारे पड़ोस में वर्ष १९४७ से सतत प्रयासरत है, हमें तोड़ने के लिए, हमारी जमीन छीनने के लिए, हमें अपमानित करने के लिए किन्तु भारतवर्ष सदैव खड़ा है, अपनी हिमालयी अटल पहचान लिए।

अपने एक ऐसे ही धूर्तता पूर्ण प्रयास में कुटिल धर्मांध पडोसी ने वर्ष १९९९ को कारगिल की कुछ चोटियों पर अनैतिक कब्ज़ा कर लिया था। ये वर्ष का वो समय था जब दोनों ओर की सेनाएं अपनी चोटियों से नीचे आ जाती हैं। भारतीय सेना के अपनी वास्तविक चोटियों से नीचे आने पर शत्रु सेना के सैनिक, इन चोटियों पर चढ़ गए। इनकी संख्या कुछ हजार में थी। शत्रु लाभदायक स्थिति में था, हमारी प्रत्येक हलचल को देख रहा था। लड़ाई बिना चोटी पर पहुंचे नहीं जीती जा सकती थी। किसी भी सेना के लिए ये युद्ध जीतना लगभग असंभव था, किन्तु भारतीय समाज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ना और जीतना सदियों से जानता है, यहाँ भी वही परिस्थिति सेनाओं के बाहुबल को ललकार रही थी।

भारतीय सेना ने अपनी चोटियां वापस लेने के जिस प्रयास को मई १९९९ में प्रारम्भ किया, उसके लिए अदम्य साहस, अचूक रणनीति, शारीरिक सामर्थ्य की महती आवश्यकता होती है। उदाहरणार्थ, जिस चोटी को परमवीर कप्तान विक्रम बत्रा ने वापस प्राप्त किया था, उसकी वो १७००० फ़ीट की ऊंचाई पर थी। इस स्तर पर जीवित रहना ही संघर्ष है जिसमें कप्तान बत्रा ने सीधी चढ़ाई के बाद बंकर उड़ाए, अपने साथियों की प्राणत्याग रक्षा की, ५ शत्रुओं को निहत्थे रहते मार दिया था। अपनी वीरता के ऐसे ही अदम्य साहस के लिए कप्तान मनोज पांडे, अनुज नायर जैसे ५२७ वीर शहीद हुए थे, किन्तु उनकी शूरवीरता उन्हें अमर कर गई।

ये युद्ध किसी भी सेना के लिए लड़ पाना लगभग असंभव था, जीतना तो बहुत दूर की बात है। वो व्यक्तित्व जो लड़ते हुए शहीद हुए, आम जनमानस में नहीं मिलते जिसमें एक २४ वर्षीय युवा हर बुधवार को रात ८ बजे नियत समय पर चंडीगढ़ फोन करता था, जिसने कहा था, या तो जीतकर आऊंगा या तिरंगे में लिपटकर, लेकिन आऊंगा जरूर। अपने वचन के अनुसार वो वीर, जिसके खौफ में शत्रु ने उसका नाम शेरशाह रख दिया था, वापस आया लेकिन तिरंगे में लिपटकर।

आज कारगिल विजय दिवस है। पाकिस्तानी भेड़ियों की मांद में जाकर उनके दांत खट्टे करने वाले योद्धाओं की वीरता का अभिनंदन करने का, उन्हें सम्मान प्रदर्शित करने का, उनके प्रति अपनी भावनाओं प्रदर्शित करने का दिन। उन कहानियों को कहने का, सुनने का, समझने का दिन, जिस दिन ‘वीर भोग्या वसुंधरा’ को पुनः चरितार्थ किया गया।

कारगिल दिवस की समस्त देशवासियों को वात्सल्यपूर्ण शुभकामनाएं।

विश्व के प्रथम गुरु – शिव

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कृतज्ञता एवं विनीत होने का महापर्व, गुरुपूर्णिमा, भारतीय सामाजिक अस्मिता के शीर्षबिंदुओं में से एक है। ये पर्व अपने आप में सांस्कृतिक समृद्धि का, वैचारिक नम्रता और सामाजिक उन्नति का महापर्व है।

यूँ तो किसी के सम्मुख झुकना एक दीन भाव है, लेकिन जो इस दीन भाव को भी महान बना दे, वही सांस्कृतिक विरासत है भारतवर्ष की। ये पर्व हमें विनम्र होना सिखाता है। गुरु के प्रति, गुरु स्वरुप माँ प्रकृति के प्रति, माता पिता के प्रति, समाज और देश के प्रति, हमारी सफलता के प्रत्येक मील के पत्थर के प्रति अपने सहज एवं सरल रूप में कृतज्ञता प्रकट करने का महापर्व है गुरुपूर्णिमा।

गुरु – जिसका महत्व ईश्वर से ज्यादा भारतीय वांग्मय में बताया गया है। गुरु – जिसकी कृपा सफलताओं के गिरि पर्वत चढ़ने के लिए आवश्यक है। गुरु – जिसके अनुभव से हमें सही और गलत का अंतर समझ आता है। गुरु – जिसकी शिक्षा हमें पशुता से मनुष्यत्व की यात्रा पर आगे बढाती है। गुरु – जिसकी परीक्षाओं की कठिनाई हमें चुनौतियों के समक्ष कठोर और अजिंक्य बनती हैं। गुरु – जिनकी कसौटी हमें तौलती है, सफलताओं के अहंकार से बचने के लिए।

गुरुपूर्णिमा, उस गुरु को श्रद्धासुमन अर्पित करता महापर्व है, जो हमें, हमारी अनेकों क्षमताओं, सफलताओं और सामर्थ्यों के बोझ को उतार कर फिर से हममें सहजता, सरलता एवं विनम्रता के नवांकुर स्फुटित करता है। गुरुपूर्णिमा महापर्व है आनंद का, उल्लास का, अपने योग्य होती प्रक्रियाओं के प्रति कृतज्ञता प्रदर्शित करने का।

शिव
शिव परिवार

विश्व के प्रथम गुरु माने जाते हैं महादेव शिव शम्भू। भोले बाबा, जो गुरु है, देवताओं के गुरु बृहस्पति और असुरों के गुरु शुक्र के। जो पहले अघोर हैं, अघोर अर्थात, जो भेदभाव से बहुत ऊपर हैं। जिनके लिए अच्छे और बुरे का कोई भेद नहीं, कोई भाव नहीं। जो अपनी बारात में देवों के साथ दानवों के नृत्य का आनंद लेते हैं। जो सज्जनों को दर्शन देते हैं तो दुर्जनों के मन की इच्छा भी पूर्ण करते हैं।

शिव सम है, सरल हैं, साधन और साध्य भी हैं। शिव को साधने के लिए न कोई साधन चाहिए न कोई साधना। शिव सरलता से सधते हैं। सध जाएं तो अशेष आशीषों की वर्षा कर दें, कुपित हो जाएं, तो तृतीय नेत्र खोल विध्वंस कर दें। शिव जो सिखाते हैं जीवन में संतुलन का महत्व। जो सिखाते हैं नारी सम्मान का महत्व, जो योग्यता से नहीं भाव से प्राप्य हैं, जिनके लिए सृजन और विध्वंस उनकी दो भुजाएं हैं। महादेव जिनकी स्तुति होने को एक लोटे जल से भी संभव है, तो क्या कुछ नहीं चढ़वा लें जब रुद्राभिषेक कराएं। शिव, जिनके बिन संसार शव है। शिव जो हलाहल को भी कंठ में धर लें। शिव जो आदियोगी हैं, सत्य का सुंदरतम स्वरुप हैं, जो सरलतम प्रयास से भी सध जाएं, नहीं तो जन्मजन्मांतरों के तप अनर्थ।

सावन के इस शुभारंभ के अवसर पर आइये विश्व के सर्वप्रथम गुरु को नमन करें। आप सभी को गुरुपूर्णिमा की अशेष शुभकामनाएं।

देवशयनी एकादशी का महत्व

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आज देवशयनी एकादशी है। इस पौराणिक महत्व के दिन की मान्यता है कि श्रीहरि विष्णु भगवान आज चतुर्मासिक शयन के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। प्रत्येक शुभ कार्य हेतु श्रीहरि की उपस्तिथि अनिवार्य कही गई है अतः आज से चार मास के कालखंड के लिए पृथ्वी पर कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। इस चार मास की योगनिद्रा के बाद श्रीहरि विष्णु देवोत्थान एकादशी के दिन वापस आते हैं, जिसके बाद सभी शुभ कार्य आरंभ हो जाते हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार इस दिन के महत्व एवं व्रत पूजन के बारे में श्रीकृष्ण भगवान से पूछा था। इसी महत्वपूर्ण दिन के बारे में देवर्षि नारद ने भी ब्रह्मदेव से पूछा जिसके प्रत्युत्तर में ब्रह्मदेव ने देवर्षि को एक कथाप्रसंग सुनाया जिसके अनुसार उन्होंने महान राजा मान्धाता के बारे में बताया।

महाराज मान्धाता एक पराक्रमी, सज्जन एवं धर्म के अनुरूप आचरण करने वाले सूर्यवंशी राजा थे। उनके राज्य में किसी प्रकार का कष्ट अथवा असुविधा किसी को नहीं थी। राजा स्वयं प्रजा को अपनी संततियों समान प्रेम करते थे एवं उनकी समस्याओं का अविलंब समाधान किया जाता था। उनके राज्य में किसी भी प्रकार की कोई भी प्राकृतिक आपदा नहीं आती थी।

श्रीहरि विष्णु

एक बार राज्य में देवयोग के कारण भीषण अकाल पड़ा। प्रजा के खाद्यान्न का संकट उत्पन्न हो गया। प्रजा त्राहिमाम कर उठी। धार्मिक अनुष्ठानों पर भी रोक लग गई। अकाल से पीड़ित प्रजा राजा के पास पहुंची एवं प्रार्थना करने लगी कि ‘हे राजन! संसार के जीवन यापन का मुख्य आधार वर्षा है। हमारे राज्य में वर्षा न होने के कारण अकाल पड़ा हुआ है जिससे अन्नजल का संकट उत्पन्न हो गया है। यदि इस समस्या का समाधान न हुआ तो हमें किसी अन्य राज्य में शरण लेनी पड़ेगी’।

प्रजा की इस दारुण दुःख से उत्पन्न पुकार पर राजा को ह्रदय विदारक दुःख हुआ। राजा ने ईशप्रार्थना की एवं कुछ लोगों के साथ वन की ओर चल दिये। अनेकों ऋषि मुनियों के पास समाधान हेतु गए किन्तु समाधान कहीं न मिला। थक हार कर राजा महर्षि अंगिरा के पास पहुँचे। महर्षि अंगिरा ने आने का कारण पूछा। राजा ने अपने कष्ट का कारण बता समाधान बताने की गुहार लगाई।

इसके बाद ब्रह्मा जी के मानस पुत्र महर्षि अंगिरा ने राजा को देवशयनी एकादशी का व्रत करने को कहा। महर्षि ने कहा कि इस व्रत के पालन से वर्षा भी होगी एवं प्रजा भी सुखमय जीवन व्यतीत करेगी। इसके बाद राजा ने महर्षि के कहे अनुसार विधि विधान के साथ व्रत किया। इसके बाद राज्य में वर्षा हुई तथा प्रजा को भी अकाल से मुक्ति मिल गई।

देवशयनी एकादशी के इस पावन पर्व पर आप सभी को वात्सल्य परिवार की अशेष शुभकामनाएँ।

कामधेनु गौ गृह का वात्सल्यमय महत्व

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सनातन धर्म और गौ को यदि एक-दूसरे का पूरक कहा जाए तो कुछ गलत नहीं होगा। गौ को पुरातन वैदिक संस्कृति के अनुसार माता रूप में पूजा जाता है। गौसेवा के लिए युगपुरुष भगवान श्रीकृष्ण भी गौपालक की लीला की थी। इससे गौसेवा का महत्व समझा जा सकता है।

वेदों से पुराणों तक, अनेकों महाग्रंथों में गौ का महत्व वर्णित है। संसार की संरक्षिका भी गौ को ही कहा गया है। गौ को हिंदुत्व दर्शन में माँ कहा गया है। माँ जो सहेजे, पोषण दे, पालन के साथ मातृत्व के भाव में अपना वात्सल्य लुटाये, वो गौमाता ही हो सकती है। शिशु के जन्मते ही, गौ दुग्ध से पोषित किया जाता है।

३३ कोटि, अर्थात प्रकार के देवताओं का वास गौमाता में कहा गया है। गौमाता को धन के रूप में माना जाता है। गौधन के संरक्षण, गौसेवा एवं गौपालन का चलन आज भी ग्रामीणांचल में प्रमुख रूप से है। प्रकृति और मानव के मध्य की एक प्रमुख कड़ी, गौमाता के अनेकों प्रसंग प्राचीन महाकाव्यों एवं ग्रंथों में मिलते हैं।

ज्योतिष विज्ञान के अनुसार, विवाह के लिए गोधूलि वेला सर्वोत्तम मानी जाती है। नवग्रहों की शांति में भी गौमाता की प्रमुख भूमिका होती है। आज भी भारतवर्ष के करोड़ों परिवारों में पहली रोटी गौमाता के लिए निकले जाने का विधान है। किसी शुभ कार्य के निष्कंटक संपूर्ण होने के लिए गौमाता को गुड़ खिलाने का प्रचलन है।

गौमाता का रूप कामधेनु है। कामधेनु जिसकी सेवा किसी भी वांछनीय फल की प्राप्ति में सहायक है। गौसेवा अनेकों कष्टों से मुक्ति दिलाती है। गौमाता वैज्ञानिक रूप से भी वातावरण की शांति एवं शुद्धि में सहायक है। वैसे भी गौमाता के रंभाने में जो स्वर निकलता है, उसमें ‘माँ’ की ध्वनि सुनाई देती है।

ऐसी ही अनेकों गौमाताओं की सेवा वात्सल्यग्राम के कामधेनु गौगृह में प्रतिदिन होती है। इन गौमाताओं की कुल संख्या लगभग २०० के आसपास है जिनसे वात्सल्यग्राम में पलते अनेकों बच्चों का पोषण होता है। इन गौमाताओं का आशीष ही इन बच्चों को प्रबुद्ध एवं विकसित करता है। वैसे भी कहा गया है कि गौमाता का दुग्ध बाल पोषण हेतु सर्वोत्तम है। इन गौमाताओं के प्रश्रयस्थल को कामधेनु गौ गृह कहा जाता है, जो वात्सल्यग्राम के मध्य में स्थित है।

कामधेनु गौगृह की समुचित व्यवस्था के लिए आपका सहयोग अपेक्षित है। सहयोग के लिए निम्न वेबलिंक पर क्लिक करें।