छोटी दीवाली अर्थात उत्सव, हर्ष और उल्लास!!

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दीपावली – पर्व है जीवन के मंगलगान का। दीप जला अंधेरों को दूर करने का ये महापर्व सनातन का शिखरबिन्दु है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के अयोध्या आगमन का ये महापर्व मन को अपार आनंद से प्रफुल्लित करने का पर्व है। अयोध्या में आज नौ लाख दीये राम की पैड़ी पर जलाये गए है और संपूर्ण अयोध्या में बारह लाख दीप प्रज्वलित किये गए हैं। आस्थाओं के चरम और परम बिंदु का पर्याय है दीपावली। सनातन का सबसे बड़ा त्यौहार है दीपावली जो पांच दिन हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। आज उस महापर्व का दूसरा दिन, छोटी दीपावली है जिसे नरक चतुर्दशी भी कहा जाता है।

आज के पर्व का नाम छोटी दीवाली
आज के पर्व को छोटी दीवाली भी कहा जाता है क्यूंकि आज दीप प्रज्वलित किया जाता है और दीपदान किया जाता है। घरों में देवी देवताओं की पूजा आराधना कर दीप जलाकर रौशनी की जाती है। आज के दिन मिष्ठान बनाये जाते हैं और उनका आनंद लिया जाता है। यही सनातन की सुंदरता है, स्वास्थ्य एवं समृद्धि की मनोकामना के साथ लोग एकजुट हो उल्लसित हो अपनी परम्पराओं को अनुशासन के साथ निभाते हैं।

छोटी दीवाली या नरक चतुर्दशी
दीपावली महापर्व के द्वितीय दिवस को छोटी दिवाली अथवा नरक चतुर्दशी भी कहा जाता है। इस दिन रुद्रावतार महावीर हनुमान जी की पूजा का विशेष महत्व है। आज के दिन पूर्वजों की शांति के लिए भी पूजन किया जाता है। मान्यता है की आज के दिन श्रद्धा और भक्तिपूर्वक ईशप्रार्थना करने वाले व्यक्ति को नरक से मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति होती है जिस कारण इसे नरक चतुर्दशी कहते हैं।

सनातनी सुंदरता का ये महापर्व अपने संपूर्ण यौवन के साथ आया है। लाखों दीयों जगमग के साथ रात से अँधेरे दूर हैं। चहुंओर प्रसन्नता है, उल्लास है, आनंद है। इसी मंतव्य से इस महापर्व को मनाइये, दीपावली पर्व है मुस्कुराने का, मुस्कुराइये !!

वात्सल्य परिवार की ओर से खुशियों के महापर्व, छोटी दीवाली की सभी धर्मावलम्बियों को अनंत शुभकामनाएँ उत्सव, हर्ष और उल्लास!!

धनतेरस: स्वस्थ समाज का चरम बिंदु

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सनातन उत्सव का धर्म है। उल्लास और हर्ष इस समाज के प्रतीक हैं। जितने तीज और त्यौहार सनातन धर्म में मनाये जाते हैं, उतने किसी भी अन्य पंथ, मत और संप्रदाय में नहीं। आज धनतेरस है। धन को अर्थ का एक प्रतिरूप माना जाता है जबकि सनातनी संस्कृति में अर्थ के अतिरिक्त आरोग्य और स्वास्थ्य को भी धन के रूप में महत्व दिया गया है। इसीलिए धनतेरस को भगवान नारायण के अवतार भगवान धन्वन्तरी की जयंती मनाई जाती है।

भारतीय संस्कृति में स्वास्थ्य एवं आरोग्य का महत्व, धन से अधिक रहा है। यह कहावत आज भी प्रचलित है कि ‘पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख घर में माया’ इसलिए दीपावली में सबसे पहले धनतेरस को महत्व दिया जाता है। यही सनातन संस्कृति है जिसका मत अनुशासित जीवन पद्धति है, जो आरोग्य महत्व निश्चित करती है।

समुद्र मंथन के दौरान कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन भगवान धन्वन्तरी अपने हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। मान्यता है कि भगवान धन्वंतरि विष्णु के अंशावतार हैं। संसार में चिकित्सा विज्ञान के विस्तार और प्रसार के लिए ही भगवान विष्णु ने धन्वन्तरी का अवतार लिया था। भगवान धन्वन्तरी के प्रकट होने के उपलक्ष्य में ही धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है।

सनातन धर्म में त्योहारों का वैज्ञानिक महत्व है। इनके मानने के कारण और आधार वैज्ञानिक हैं। धनतेरस के दिन झाड़ू लेकर आने का विधान होता है। झाड़ू प्रतीक है स्वच्छता की, स्वच्छता से उत्तम स्वास्थ्य निर्मित होता है क्यूंकि चहुंओर सफाई से बीमारी पैदा करने वाले कीट पतंगों के साथ डेंगू मलेरिया का भी भय व्याप्त होता है। सफाई होने से इन कीट पतंगों के साथ बीमारी पैदा करने वाले मच्छर भी नष्ट होते हैं जिस कारण स्वस्थ समाज निर्मित होता है।

बाजारों में खरीदारी अन्य दिनों से अधिक होती है जिससे आर्थिक दृष्टि से सरकारों की कर आधारित आय में भी बढ़ोत्तरी होती है जिससे गरीबों के निमित्त योजनाओं को अधिक सबलता के साथ क्रियान्वयित किया जाता है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि धनतेरस प्रतीक है सनातनी दिग्दृष्टि का, समाजोत्थान का, सबके विकास का और स्वास्थ्य को सबसे बड़ा सुख और धन मानने की विचारधारा का। धनतेरस आगमन है दीपावली का, जिससे सुख समृद्धि की प्रतीक माँ लक्ष्मी धरती पर आती हैं, सभी पर अपनी कृपा बरसाती हैं। धनतेरस अर्थात सुख, सौभाग्य और समृद्धि का संस्मरण। धनतेरस अर्थात आरोग्य आधारित समृद्ध समाज का निर्माण जिसमें ‘आरोग्यं धन सम्पदा’ का आह्वान किया जाता है।

धनतेरस की प्रामाणिक कथा:-
दानवों का राजा बलि बहुत पराक्रमी राजा था। कहते हैं कि राजा बलि के भय से देवता सदैव त्रस्त रहते थे। आज के दिन, बलि के भय से देवताओं को मुक्ति मिली थी और बलि ने जो धन-संपत्ति देवताओं से छीन ली थी उससे कई गुना धन-संपत्ति देवताओं को मिल गई। इस उपलक्ष्य में भी धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है।

धनतेरस और स्वर्ण

धनतेरस के दिन सनातन समाज में स्वर्ण क्रय केंद्रों में अधिकाधिक मात्रा में क्रय होता है। कहा जाता है कि इस दिन स्वर्ण आभूषणों का आगमन घर में सौभाग्य और समृद्धि लेकर आता है। जीवन में माँ लक्ष्मी की उपस्थिति सहज सुलभ हो जाती है। इस दिन लिए गए आभूषण पहन महिलाएँ स्वयं माँ लक्ष्मी का रूप पाती हैं, उनके होने से ही घर मंदिर सा पुण्यतीर्थ हो जाता है। ये है सनातन की सुंदरता, जहाँ महिलाओं का सम्मान ही पुरुष के पौरुष का चरम बिंदु है, जिसमें कठिन परिश्रम से अर्जित किये गए धन से जो आभूषण क्रय किये गए हैं, वो निमित्त हैं ‘नारी तू नारायणी’ जैसी विचारधारा के।
ये है धनतेरस का सामाजिक महत्व, जिसमें महिलाओं का सम्मान ही धर्म को धारण करने का एक साधन है। यही है धनतेरस जिसमें महिलाओं के सम्मान से ही सुख समृद्धि अर्जित की जाती है, का भाव हर क्षण सभी को सदैव धारण किये रहता है।

नारी सशक्तिकरण को समर्पित महाप्रकल्प है वात्सल्यग्राम

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नवरात्रि एक पर्व, महोत्सव और वार्षिक/अर्धवार्षिक अनुष्ठान का नाम ही नहीं है। ये पर्व है शक्ति पूजन का, शक्ति की आराधना का, शक्ति की साधना का। शक्ति अर्थात माँ पार्वती, माँ दुर्गा, माँ सर्वमंगला।

शक्ति की आराधना का ये पर्व मात्र व्रत और धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं हैं। सनातन अपनी व्यावहारिक आस्था के लिए प्रसिद्द है। मात्र कलश स्थापना के साथ व्रत रखने से, मेलों से, भजन संध्या आयोजनों से और जगरातों से ही शक्ति की, माँ सर्वदेवी की पूजा नहीं होती। शक्ति की साधना का, आराधना का अर्थ होता है शक्ति को प्राप्त करना, जिनके बिन शिव भी शव हों, उन माँ दुर्गा की।

नवरात्रि उत्सव है नारी के शक्तिशाली और समर्थ होने का। जब माँ दुर्गा नरपिशाचों का वध करती हैं उन्हें अपने हथियार देते हैं। रक्तबीज, चाँद, मुंड और महिषासुरों को दंडित करने का कार्य माँ अपने हाथ लेती हैं। उस महान परंपरा के पूजन का महापर्व है नवरात्रि जिसमें कन्यापूजन विशेष महत्व रखता है। आज अष्टमी है, अनेकों घरों में महाष्टमी का पूजन होता है, लोग अपने आसपड़ोस से बच्चियों को भोज पर आमंत्रित करते हैं, उनके चरण पखारते हैं, उन्हें प्रेम से प्रसाद परोसा जाता है, अंत में दक्षिणा देकर आशीर्वाद लिया और विदा किया जाता है, ये है आस्थाओं का सनातनी सागर जिसमें माँ सर्वोपरी है, नारी ही नारायणी है।

वास्तविक धरातल पर नारी के इसी शक्तिस्वरूप का विस्तार है वात्सल्यग्राम। एक परियोजना जिसका शुभारंभ हुआ एक माँ के हाथों, जिसने वृद्धाश्रम, अनाथालय और नारी निकेतन जैसे संवेदनहीन शब्दों से परे, एक परिवार का स्वरुप रच दिया, परिवार उनका, जिनका आपस में कोई रक्त-संबंध भले न हो, लेकिन भावनाओं का एक सागर है जिसमें सभी एक दूसरे के साथ बंध जाते हैं।

माँ सर्वमंगला पीठम जैसे भव्य और दिव्य मंदिर का निर्माण विशुद्ध सनातनी नारीवाद का अप्रतिम उदाहरण है। यही हमारा सच है, यही सनातन है। सहस्त्राब्दियों से पुरातन इतिहास है हमारा। जब हर ओर, विशेष रूप से, यूरोप अंधकार युग में था, हम उससे भी हजारों वर्ष पूर्व नारी को पूज रहे थे। भारतवर्ष में स्थित बावन शक्तिपीठ इस बात को प्रमाणित करते हैं कि सनातनी गौरव महिलाओं के सशक्तिकरण से है और उसी गौरव का भान आज वृंदावन स्थित वात्सल्यग्राम कराता है।

वात्सल्यग्राम में महिलाओं के स्वाभिमानी स्वाबलंबन के विस्तार के लिए संविद एक्सपर्ट स्कूल है जहाँ महिलाओं को रोजगारपरक शिक्षा देकर उन्हें रोजगारयोग्य बनाया जाता है जिससे वो अपने पैरों पर खड़ी हो सकें।

बेहतर शिक्षा व्यवस्था के लिए, संविद गुरुकुलम जैसा आधुनिक विद्यालय है जहाँ नैतिक शिक्षा भी आधुनिक शिक्षा के सदृश्य महत्वपूर्ण है। आधुनिक सुविधासंपन्न गौशाला, विशिष्ट बच्चों के लिए वैशिष्ट्यम जैसे अनेकों प्रकल्प इस सेवा प्रकल्प के तत्वाधान में निरंतर संचालित हैं, जिसमें शिक्षा, चिकित्सा, स्वास्थ्य, महिला विकास जैसे निकाय सतत क्रियाशील हैं।

नारी का सशक्तिकरण एक सभ्य समाज की अवधारणा के लिए अत्यंत आवश्यक है। आधुनिक भारत के इतिहास में भी हमें रानी दुर्गावती, होल्कर, पद्मावती, रानी लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगनाओं के महान व्याख्यान सुनने और पढ़ने को मिलते हैं, जिनमें दृष्टिगोचर होता है कि भारत तब भी नारी शिक्षा और शक्ति की साधना का उतना ही पोषक था।

नवरात्रि की शुभकामनाएँ !

वीरता का अद्भुत आख्यान: भानुप्रताप शुक्ल शहीद संग्रहालय

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स्वतंत्रता से बलवती भावना कोई नहीं है। स्वतंत्रता से स्वछंदता प्राप्त होती है, मन के अनुसार निर्णय लेने की, क्रिया करने की किंतु ये इतनी सहज और सुलभता से उपलब्ध भी तो नहीं। भारत सैकड़ों वर्षों तक अन्य हिंसक आक्रांताओं की परतंत्रता में रहा है। यद्यपि ये भी एक सर्वविदित तथ्य है कि इन परतंत्र वर्षों में भी स्वाधीनता का भाव कभी समाप्त नहीं हुआ, लुप्त नहीं हुआ। महाराणा प्रताप से छत्रपति शिवाजी, बप्पा रावल से रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे, शहीद भगत सिंह से पंडित आज़ाद तक, ये शाश्वत है कि भारतवर्ष की महान अस्मिता स्वतंत्र ही रही, इससे कोई आक्रांता पार न पा सका।

स्वाधीनता का एक मूल्य होता है। वीर सावरकर हों अथवा भगत सिंह, कैप्टन मनोज पांडे हों या नचिकेता, कर्नल संतोष बाबू से हनुमंथप्पा तक स्वाधीनता के इस महा समर के शौर्यपूर्ण यज्ञ में वीरगति की आहूति देने में कोई कमी नहीं रही। लेकिन इस वीरगति का क्या लाभ यदि इस वीरता को, इस शौर्य को और इस भाव को अपनी अगली पीढ़ी तक न पहुँचाया जाये? यदि हमारे युवाओं को इन वीरता के मुस्कुराते चेहरों से परिचित न कराया जाये तो इस शौर्य का कोई अर्थ न रहेगा।

वृंदावन के वात्सल्यग्राम स्थित शहीद भानु प्रताप शुक्ल संग्रहालय एक प्रयास है अपने महापुरुषों के चरणवंदन का, उनकी वीरता को नमन करने का, अपनी संततियों को उन शूरवीरों से परिचित कराने का, जिनकी वीरता ने हमारे जीवन की स्वधीनता का मूल्य अपने जीवन से चुकाया है। वो शहीद हुए ताकि हम स्वतंत्र रह सकें। वो अपने परिवार से बिछड़ गए ताकि हमारे परिवार की सुरक्षा से कोई खिलवाड़ न हो सके।

शहीद भानु प्रताप शुक्ल संग्रहालय एक प्रयास है युवाओं के मन में देशभक्ति का भाव जगाने का। उनके मन में इस देश के वीरों के प्रति श्रद्धा हो, सम्मान में सर झुकते हों क्यूंकि किसी भी देश की संप्रभुता उस देश की अपने वीर शहीदों के प्रति कृतज्ञता से निश्चित होती है। जो देश अपने वीरों के प्रति उदासीन होते हैं, वहाँ अगली पीढ़ियों में वीरगति के भाव नहीं पनपते।

पुस्तकालय:-
इस संग्रहालय में एक विशाल पुस्तकालय भी है जहाँ अपने वीरों के प्रति उत्सुकता शांत की जा सकती है। यहाँ अनेकों पुस्तकें उपलब्ध हैं जिनमें साहित्य के प्रति अनुरागियों को स्तरीय साहित्य उपलब्ध कराया जाता है। पुस्तकें ज्ञान का परिष्कृत रूप होती हैं। जितनी पुस्तकें पढ़ी जाती हैं, व्यक्ति के विचारों में उतनी ही शुद्धता और मन में उतनी ही शांति होती है। एक कलकल करते झरने से ठहरे समुद्र की यात्रा को तय करना है पुस्तकों का अध्ययन। देशभक्ति की पावन जलधारा में डुबकी लगाने का अनुपम आनंद है शहीद भानुप्रताप शुक्ल संग्रहालय की यात्रा।

आज युवाओं को अपने देश और समाज के इतिहास के विषय में जानकारी रखना आवश्यक है। इतिहास हमारी चूकों और गौरवमयी गरिमाओं का साक्षी होता है। उसका साक्षात्कार हमें पुस्तकें उपलब्ध कराती हैं। उन जानकारियों के माध्यम से हमें अपनी ऐतिहासिक चूकों से सतर्कता का मार्ग मिलता है तो अपने वीर शौर्य की प्रतिमूर्तियों को समझने और उनपर गर्व करने का भाव भी उत्पन्न होता है।

आइये और इस अनुपम श्रद्धामय संग्रहालय में अपने वीर पूर्वजों को नमन कीजिये, अपार आनंद की अनुभूति निश्चित मिलेगी।

सुबह की पहली किरण: संविद एक्सपर्ट स्कूल

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सुबह हमेशा नई होती है, ताज़गी लिये, वातावरण में सृजन के गीत गाती, कोपलों के फूटने का विश्वास जगाती, रात के अंधकार को मिटाती, अंकुरों के स्फुटन का प्रण करती, ओस की बूंदों सी सुबह, मन मस्तिष्क को नई ऊर्जा और नवारंभ को बल देती है।

मानव जीवन में अनेकों उपक्रम, घटनाएँ एवं वास्तविकताएँ उस सुबह की गुनगुनी धूप सी ही होती हैं। इन मखमली आभासों में कुछ शुभ संकेत होते हैं। स्त्री के जीवन में एक ऐसी ही ताज़गी भरी सुबह है संविद एक्सपर्ट स्कूल।

संविद एक्सपर्ट स्कूल एक ऐसा प्रकल्प है जहाँ समाज की उन महिलाओं के सशक्तिकरण पर बल दिया जाता है जिन्हें जीवन की कठोरताओं का सर्वाधिक अनुभव होता है। आर्थिक परतंत्रता हो अथवा उत्पीड़न, इन महिलाओं के पास कार्यकौशल जैसी कोई शक्ति नहीं होती जिसकी सहायता से ये अपने जीवन में रंग भर सकें अथवा अपने परिवार की सहायता के बिना अपने लिए कुछ कर सकें।

संविद एक्सपर्ट स्कूल ऐसी महिलाओं को ब्यूटी पार्लर के साथ सिलाई कढ़ाई, सॉफ्ट टॉयज, आर्टक्राफ्ट जैसे अनेकों विधाओं में पारंगत करता है। उन्हें परीक्षण के साथ रोजगार से संबंधित क्रियाकलापों में संलग्न कर उन्हें स्वाबलंबी बनाता है और आर्थिक स्वाबलंबन से जो पथ बनता है, उसका अंतिम पड़ाव स्वाभिमान ही तो है।

इस प्रकार अनेकों रोजगारपरक कार्यक्रमों का लाभ लेकर महिलाएँ अपने लिए एक नई सुबह का स्वप्न बुनती हैं जिसमें आर्थिक स्वतंत्रता हो, स्वाबलंबन की चादर ओढ़ ये महिलाएँ अपने लिए स्वाभिमान का एक नव भवन सृजित करती हैं, जिसमें इनके साथ होती है वो सुबह जिसमें स्वतंत्रता की चिड़िया आनंद मंगल के गीत सुनाती है, जहाँ निराश्रित होने के भाव एक शुभ सृजन रचते हैं और कष्टमय अंधेरों को दूर करते हैं।

संविद एक्सपर्ट स्कूल एक प्रयास है जिसके नवांकुर स्फुटित हुए हैं। इस नवसृजन की पहल को अनेकों पड़ाव पार करने हैं। सहयोग अपेक्षित रहेगा।

गौमाता का अपना घर: कामधेनु गौ गृह

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एक देश के रूप में, भारतवर्ष, सर्वदा प्रकृति एवं उसकी संततियों के प्रति आसक्त रहा है। उन संततियों को सनातन धर्म में जो स्थान मिला, वो अन्यत्र कहीं न मिल सका। पहली रोटी गाय को और अंतिम रोटी कुत्ते को निकालने के साथ मछलियों को आटा और पक्षियों को जल की समुचित व्यवस्था करते भतेरे लोग हमें यत्र तत्र मिल ही जाते हैं। भारतवर्ष में जीवन का आधार ही गौ, गीता एवं गायत्री को माना गया है। अर्थात जीवन के मूल में माँ प्रकृति, पुस्तकें एवं आध्यात्म हैं। यही सनातन है, यही सत्य है, यही संस्कृति है।

गौपालन के माध्यम से गौ संवर्धन ग्रामीण अंचल में गौरवमय व्यवसाय रहा है। गौ सेवा के क्षेत्र में अनेकों युवाओं को आज भी गौमाता की सेवा करते देखा जा सकता है लेकिन अनेकों कारणों से वर्तमान परिस्थितियों में गौमाता की सेवा के प्रति संवेदनाओं में कमी आई है। गौपालन की गरिमा यद्यपि भारतीय समाज में पुनर्स्थापना की प्रक्रिया के माध्यम से गुजर रही है।

वात्सल्यग्राम में आने वाले अधिकांश बच्चे शिशु होते हैं। दुर्भाग्य से, स्तन के दूध की अनुपस्थिति में उनके बहुमूल्य जीवन की रक्षार्थ, उन्हें उचित पोषण देने के लिए दूध आवश्यक हो जाता है। पोषण एवं शारीरिक विकास हेतु गाय का दूध एक उत्कृष्ट विकल्प है। प्रोटीन और कैल्शियम से भरपूर दूध, हड्डियों के विकास के लिए अच्छा है, पोषक तत्वों से भरपूर यह मानसिक विकास के लिए भी सर्वोत्तम विकल्प है। वात्सल्यग्राम स्थित कामधेनु गौगृह एक सामान्य गौशाला न होकर, एक भावनात्मक केंद्र है जहाँ गौमाताओं के अमृतमय दुग्ध से अनेकों मातृत्वविहीन शिशुओं का पालन-पोषण किया गया है और किया जा रहा है। इन गौमाताओं के निवास के आधुनिक एवं उत्तम साधनों के साथ उनके प्रति सेवा का भाव दर्शनीय है। इस गौवंश में भारत की श्रेष्ठतम वंश की गौएँ आनंदमय निवास करती है। उनका उच्चकोटि दुग्ध जहाँ गोकुलम में रहने वाले अनेकों स्तनपान की आधारभूत अनिवार्यता से हीन बालकों को अपने दुग्ध से पोषित कर रही हैं।

निरंतर सेवारत सेवरतों के माध्यम से इस गौवंश की उत्तम देखभाल की जाती है। नियमित भोजन, जल एवं चिकित्सकीय सुविधाओं युक्त कामधेनु गौगृह वृंदावन ही नहीं, अपितु, राज्य के सर्वोत्तम गौशालाओं में सर्वश्रेष्ठ है। यहाँ गौमाताओं को माता के भाव में पूजा जाता है, उनकी चिंता की जाती है, बदले में इन गौमाताओं ने अपने मातृत्व से अनेकों शिशुओं की शिराओं में अपने अमृतमय दुग्ध से जीवन को गति दी है।

वात्सल्यग्राम की अपनी गौशाला होने से यह भी सुनिश्चित होता है कि बच्चों को मिलने वाला दूध मिलावट से मुक्त हो, वहीं गौवंश की समुचित देखभाल हो। यह बच्चों को पोषण प्रदान करने के साथ-साथ गायों के संरक्षण के दोहरे उद्देश्य को भी पूरा करता है। वृंदावन में गौशाला की शुरुआत जून 2004 में सिर्फ 2 गायों के साथ हुई थी और अब 175 गाय और बछड़े हैं। गौसंरक्षण एवं गौसंवर्धन केंद्र के रूप में कामधेनु गौगृह सुविख्यात है। इसकी प्रबंधकीय गुणवत्ता से इस गौशाला केंद्र की ख्याति चहुंओर व्याप्त है। गौमाता अपने आशीष से जगत का यूँ ही कल्याण करें।

यदि आप सहयोग करना चाहें, तो निम्नलिखित वेबलिंक पर क्लिक कर सहयोग कर सकते हैं।

नारी के नारायणी होने के भाव का जीवंत रूप: माँ सर्वमंगला पीठम

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स्त्रीत्व का सर्वोत्तम रूप होता है मातृत्व लिए हुए एक माँ का रूप, जिसमें स्त्री जहाँ अपने बालक के लिए भावनाओं के कोमलतम भाव में सन्निहित होती है तो उसकी रक्षार्थ पाषाणिक कठोरतम रूप को भी साध लेती है। स्त्री का आधारभूत चिंतन ही है वात्सल्य लिए हुए, जिसमें कभी वो माँ प्रकृति का रूप धरती है तो कभी माँ गंगा और नर्मदा, कभी वो स्वयंभू धरा होती है तो कभी आदिशक्ति स्वरूपा माँ जगदंबा जी प्रतिपल हमारे उद्धार का चिंतन लिए हमें आशीषों के साए तले रखती है।

सनातन की संस्कृति नारी को पूजने की है, उसके गुणों को सहेजने की है, तभी तो कहा भी जाता है –

यत्र नारी पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता !!

नारी हमारे अवचेतन मन में माँ जगदंबा है। कन्यापूजन हमारे समाज का सामाजिक चिंतन है, माँ के चरणों तले स्वर्ग का भान सनातनी स्वरुप है। माँ भगवती के दर्शन, पूजन और आध्यात्मिक चिंतन सत्मार्ग पर ले जाने का सहज मार्ग है। प्रभु श्री राम ने भी उस कल्पना को ही विस्तारित किया है जिसमें कहा गया है –

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी !!

वृंदावन के वात्सल्यग्राम में भी माँ भगवती के मंगलकारी रूप के विग्रह का निर्माण आध्यात्मिक ज्ञान एवं शांति का एक भव्य केंद्र होगा। माँ सर्वमंगला पीठम नामक इस शक्तिपीठ के निर्माण में तीन छतें होंगी जो एक दूसरे के ऊपर होंगी किंतु बिना किसी सहारे के।

ये तीन छत तम, रज और सत्व गुणों का भाव प्रस्तुत करेंगी जिनके माध्यम से इन तीनों गुणों का संबंध समझने में सरलता होगी। ईश्वर एवं भक्त के बीच का संबंध इन्हीं तीनों गुणों के माध्यम से सतत चलता रहता है। इस शाश्वत भाव के साथ ही इन तीनों छतों का निर्माण होगा।

इन तीनों छतों के नीचे प्रतिष्ठित होगा माँ भगवती त्रिपुर सुंदरी का दिव्य एवं भव्य मंदिर। इस मंदिर के भूतल पर चारों युगों, सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग एवं कलयुग में स्त्री द्वारा स्त्री की सम्पूर्ण सृष्टि यात्रा को आधुनिक तकनीक एवं पुरातन गरिमा के साथ इस अनुभालय में अनुभव किया जा सकेगा। इस अनुभव के माध्यम से आज की नारी आत्मस्थ होकर अपनी पौराणिक गरिमाओं का पुनः स्मरण कर, यथार्थ में माँ सर्वमंगला के स्वरुप में रम सकेगी। इसके अतिरिक्त एक नयनाभिराम प्रदर्शनी के माध्यम से भारत की गौरवशाली गाथाओं का भी प्रदर्शन किया जायेगा।

यदि आप सहयोग करना चाहें तो निम्नलिखित वेबलिंक पर क्लिक कर सकते हैं।

सार्वभौमिक शिक्षा का नवाँकुर: कृष्ण ब्रह्मरतन विद्या मंदिर

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शव से शिव होने की मंगलमय यात्रा है शिक्षा। मनुष्य के अंतस के तमस को हर लेने के सामर्थ्य का संबोधन है शिक्षा। शिक्षा है तो मनुज, नहीं तो पाशविक वृत्तियों का समुच्चय है मनुज। शिक्षा समाधान है, शिक्षा सामर्थ्य और पौरुष भी, मन के निर्मलतम भावों को साकार करती चेतना का पर्याय है शिक्षा। साधारण व्यक्ति को विशिष्ट व्यक्तित्व और विशिष्ट व्यक्तित्व को एक विचार में परिवर्तित करती संकल्पना है शिक्षा।

ईश्वर रचित पर विचरते अनेकों जीव जंतुओं, प्राणियों, पशु पक्षियों में मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ होने की उपमा, स्वयं माँ प्रकृति ने दी। इस विवेक और बुद्धि के परिष्करण का मार्ग उसे शिक्षा ने ही सुझाया है। शिक्षा मानव होने की कसौटी है अन्यथा भावभंगिमाओं से दैनिक क्रियाकलापों तक, मनुष्य पशुओं से भिन्न कहाँ है?

शिक्षा की इस अनुपम उपयोगिता के संज्ञान में होने के उपरांत भी भारत में एक बड़ी जनसंख्या प्राथमिक शिक्षा से विहीन है। उसके जीवनस्तर की गिरावट का कारण उचित शिक्षा का अभाव है अथवा शिक्षा के अभाव के कारण जीवनस्तर की गिरावट है, यह व्यक्तिविशेष ही जानता है किंतु गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, उच्च जीवनस्तर की आधारशिला होती अवश्य है।

सदियों बाद प्राप्त हुई स्वतंत्रता ने भारतवर्ष को लोककल्याणकारी राज्य के रूप में आकार दिया। एक ऐसा देश जहाँ शिक्षा, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य हेतु जनता सरकारों पर निर्भर रही किंतु अपेक्षानुरूप कार्य नहीं हुए एवं इस कारण देश में मध्यम एवं उच्च वर्गीय परिवारों के बच्चों की शिक्षा असार्वजनिक क्षेत्र के विद्यालयों में संपन्न होती है। इससे जहाँ व्यवस्थापकों के बच्चों को भी असार्वजनिक विद्यालयों में सुविधापूर्ण शिक्षा प्राप्त होती है, जिस कारण सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं होता।

अपने सामाजिक दायित्वों के प्रति जागरूक संत समाज ने सामाजिक परोपकार एवं समाज सुधार के कार्यों में हमेशा रुचिकर संलग्नता दिखाई है। वृंदावन के वात्सल्यग्राम नामक सेवाप्रकल्प की अधिष्ठात्री परमपूज्य दीदी माँ साध्वी ऋतंभरा को संपूर्ण देश एक समाजोन्मुखी संत के रूप में जानता है। शैक्षणिक ज्ञान के प्रसार हेतु परमआदरणीय दीदी माँ जी ने कृष्ण ब्रह्मरतन विद्या मंदिर की नींव रखी जिसमें पिछड़े तबके के बच्चों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण एवं रहन सहन की पर्याप्त व्यवस्था के साथ अन्य क्रियाकलापों के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान की जा रही है। इस प्रकल्प के संरक्षक श्री ब्रह्मरतन जी अग्रवाल का सान्निध्यपूर्ण सहयोग अनुकरणीय रहा है।

व्यवस्थापक मंडल के रूप में श्री संजय भैया जी, स्वामी जी, सुमन दीदी का विशेष सहयोग इस शैक्षणिक सेवाप्रकल्प को प्रगति के मार्ग पर ले जा रहा है। श्री ओमप्रकाश जी बंसल एवं श्री कृष्णमुरारी जी का विशेष सहयोग उन्हें साधुवाद का पात्र बनाता है।

कृष्ण ब्रह्मरतन विद्या मंदिर की बागडोर एक प्रखर विद्वान, एक शिक्षाविद, मृदुभाषी एवं सरल स्वभाव के स्वामी आचार्य श्री शिशुपाल सिंह जी के हाथों में है। आदरणीय आचार्य जी का शिक्षा के क्षेत्र में विशेष योगदान रहा है। विद्याभारती के वृंदावन स्थित वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय के प्राचार्य रह चुके हैं जिनके प्रेरणामय उद्बोधनों से, अनुशासन से एवं आशीर्वाद से अनेकों शिष्य विभिन्न सेवाओं में समाज की सेवाएं दे रहे हैं। आचार्य जी की विशेष रूचि छात्रों में पाठ्यक्रम के प्रति रूचि जगाना है तो वहीं संस्कारों के माध्यम से उनके जीवन में नैतिकता का भाव उत्पन्न हो, ये भी उनका उद्देश्य है जिससे ये समाज एक उत्तम समाज के रूप में वैश्विक स्तर पर परिभाषित हो।

मात्र १५ बच्चों के साथ आरंभ हुए इस विद्यालय में आज ३०० से अधिक विद्यार्थी अध्ययनरत हैं, जिसमें स्वाबलंबन के भाव को जागृत रखने हेतु न्यूनतम शुल्क में अधिकतम सुविधाओं का आधारभूत शैक्षणिक प्रतिकृति खड़ा करना ही इस विद्यालय का उद्देश्य है। कृष्ण ब्रह्मरतन को २०१९ में बेसिक शिक्षा परिषद से कक्षा ५ तक मान्यता प्राप्त है। “आत्म निर्भर भारत” योजना के अंतर्गत बच्चों में कौशल विकास के माध्यम से स्वाबलंबी बनाने एवं तकनीकी शिक्षा देने हेतु भारतीय संस्कृति एवं नैतिक शिक्षा पर आधारित संस्कारों से परिपूर्ण वातावरण में अप्रैल २०२१ से बालिकाओं हेतु कक्षा ६ को भी आरंभ किया गया है।

शिक्षा की गुणवत्ता विद्यालयों के ढाँचे और आधारभूत संरचनाएँ तय नहीं करतीं। गुणवत्ता तय होती है सेवा भाव से, शिक्षकों की संवाद स्थापित करने की पद्धति से जिसके ऊपर आदरणीय आचार्य जी सदैव क्रियान्वित रहते हैं।

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आध्यात्मिक एवं शांत वातावरण के साथ नैतिक व्यक्तित्व निर्माण का केंद्रबिंदु बन चुका ब्रह्मरतन विद्या मंदिर, आज क्षेत्र के निम्न आयुवर्ग के अभिभावकों के लिए एक उम्मीद की किरण है। सरकारी विद्यालयों में शैक्षिक वातावरण का सर्वथा अभाव एवं गैर-सरकारी विद्यालयों में अत्यधिक शुल्क ऐसे बच्चों को शिक्षा से कहीं वंचित न रख दें, इसी विमर्श की प्रतिकृति है कृष्ण ब्रह्मरतन विद्या मंदिर।

शिक्षा के ऐसे मंदिरों के निर्माण मानव जाति के कल्याणकारी प्रकल्प हैं। समाज निर्माण में ऐसे प्रकल्पों का अतुल्य योगदान ही भारतीय समाज को वैश्विक दृष्टि से सामाजिक समरसता का आधारबिंदु बनाता है।

स्वाबलंबन से स्वाभिमान की अनंत यात्रा का पर्याय: संविद एक्सपर्ट स्कूल

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समाज की जिस आधारभूत संरचना में हम रहते हैं, उसके सबसे निचले पायदान पर जो वर्ग आता है, उसे महिला कहते हैं। कहने को सामाजिक उत्थान किसी भी वर्ग का नहीं हो सकता, यदि महिलाओं की सहभागिता और साझेदारी न हो। ये एक विस्मयकारी सत्य है कि विश्व को नारी सम्मान का सूत्र हम भारतवासियों ने दिया है तो महिलाओं के विरुद्ध आपराधिक प्रकरण भी हमारे समाज के बीच ही होते हैं। दहेज़ के लिए प्रताड़ना हो अथवा उन्हें घर से निकालना, संख्या ऐसे कुकृत्यों की बढ़ रही है जो एक सभ्य समाज के रूप में चिंतनीय और गंभीर विषय है।

महिलाओं के सामाजिक उत्थान की योजनाओं के साथ बातें बहुत होती हैं। समाज इस विषय पर निःसंदेह चिंतित भी है और अपने सामर्थ्य के अनुसार उपाय भी कर रहा है। महिला उत्थान एक विषय है लेकिन उन्हें स्वाभिमानी बनाना, उनके अर्थ तंत्र को सुदृढ़ करना और उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना ही सही अर्थों में महिला सशक्तिकरण है, जिसके अर्थ को कुछ लोगों ने गलत संदर्भ में ही प्रस्तुत किया है।

महिलाओं के इस आर्थिक रूप से वंचित वर्ग में एक वर्ग ऐसा भी है, जो परित्यक्त है। उन्हें अकेले छोड़ दिया गया है। जीवन को सही अर्थों में देखने की दृष्टि उन माताओं बहनों के पास नहीं है। किन्हीं नारी निकेतनों, वृद्धाश्रमों आदि में खुद को समेटती इन महिलाओं की, इनके स्वाभिमान की, आदर की, सम्मान की चिंता एक सभ्य समाज होने के नाते हमें ही करनी होगी। कुछ सनातनी संत ऐसे परित्यक्त माताओं को सदा से आश्रय दे रहे हैं, सम्मानपूर्वक। उनके स्त्रीत्व की, शील की, उनकी मुस्कान और स्वाबलंबन की रक्षा अपने वात्सल्य रूपी चादर के आवरण से हमेशा हुई है, चाहे अहिल्या के उद्धारक प्रभु श्रीराम हों, अथवा माता सीता का आतिथ्य करते महर्षि वाल्मिकी।

दिव्यांग बच्चों द्वारा बनाए गए दीये

वात्सल्यग्राम में परमपूज्य दीदी माँ साध्वी ऋतंभरा ने भी इसी आतिथ्य की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दिया है। परम पूज्य दीदी माँ जी की पहचान एक भगवाधारिणी साध्वी की है तो उनके विराट व्यक्तित्व का एक छुपा हुआ पहलु है वात्सल्य। अनगिनत बच्चों को, महिलाओं को, एक ऐसे बंधन में बांधने की परिकल्पना को उन्होंने वात्सल्यग्राम नामक मूर्तरूप से साकार किया है। इन महिलाओं को वात्सल्यग्राम में आवास, पोषण एवं स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं की प्राप्ति ही नहीं होती, अपितु उनके रिक्त जीवन में संबंधों के पुष्पों द्वारा पल्लव खिलाए जाते हैं। एक महिला वात्सल्य की धूनी अपने ह्रदय में जला लेती है जिसकी सुगंध से उस बच्चे का भी जीवन संवर जाता है जिसका कोई नहीं। वैसे भी दीदी माँ जी कहती हैं –

“विश्वनाथ के इस विश्व में कोई अनाथ कैसे हो सकता है?”

इन बच्चों को जहाँ पोषण के लिए गौमाता के दूध से लेकर एक केंद्रीय शिक्षा बोर्ड द्वारा संचालित विद्यालय तक की सुविधा उपलब्ध है जहाँ मुफ्त शिक्षा, वस्त्र, स्वास्थ, स्टेशनरी, आवास, भोजन जैसी बुनियादी सुविधाएं प्राप्त होती हैं। विद्यालय में उन्हें रोबोटिक्स, थ्री डी प्रिंटिंग, एनसीसी, घुड़सवारी, टेनिस कोर्ट, संगीत एवं नाट्य अकादमी, अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों के माध्यम से अमेरिकी स्कूलों का एक्सपोजर मिलता है जिससे वो किसी भी प्रतियोगिता में खुद को किसी भी अन्य बच्चे से कमतर समझें।

दिव्यांग बच्चों द्वारा बनाए गए दीये

वहीं इन माताओं बहनों को मिलता है सामाजिक सुरक्षा का अधिकार, करुणामयी दीदी माँ का सान्निध्य, प्राकृतिक निकटता एवं इन सबसे बढ़कर, स्वाबलंबन से स्वाभिमान की यात्रा जिसे संविद एक्सपर्ट स्कूल कहा जाता है।

संविद एक्सपर्ट स्कूल एक प्रयास है, महिलाओं को स्वाबलंबी बनाने का, उनके आर्थिक पक्ष को सुदृढ़ करने का, उनकी क्रियात्मक रचनात्मकता को उनके मजबूत भविष्य की नींव के लिए सुदृढ़ करने का। संविद एक्सपर्ट स्कूल में कढ़ाई, बुनाई, सिलाई, सॉफ्ट टॉयज, दीये, अगरबत्ती, पापड़, बड़ी आदि बनाने का प्रशिक्षण मिलता है। इसके साथ साथ यहाँ चूड़ी, कड़े, मेकअप का सामान, ब्यूटी पार्लर ट्रेनिंग जैसे रोजगारपरक कोर्स पढ़ाए जाते हैं।

संविद एक्सपर्ट स्कूल में महिलाओं के साथ विशिष्ट बच्चों का भी प्रशिक्षण होता है जिसमें वे दीये, अगरबत्ती, सॉफ्ट टॉयज बनाने का प्रशिक्षण लेते हैं। इन बच्चों में ऑटिज्म, सेरिब्रल पाल्सी, डाउन सिंड्रोम जैसी समस्याएँ होती हैं, जिन्हें उपयुक्त आवासीय सुविधाओं एवं प्रशिक्षित ट्रेनर्स द्वारा चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराई जाती है।

एक समाज के सभ्य होने के लिए आवश्यक है कि ऐसे प्रयोगों, प्रकल्पों एवं परियोजनाओं का सहयोग किया जाए। संवाद स्थापित कर इनके मार्गदर्शन से लेकर सहयोग तक, हर प्रकार की मदद की जाए। संविद एक्सपर्ट स्कूल की इन महिलाओं के सामर्थ्य को सम्मानित करें। इन्हें इनकी जिजीविषा, उत्कट एवं स्वाबलंबन के लिए हाथ बढ़ाया जाए, मिलाया जाए, आगे बढ़ाया जाए, ताकि भारतीय समाज का सही अर्थों में मानी बदल जाए, वही जो दीदी माँ कहती हैं –

“विश्वनाथ के इस विश्व में कोई अनाथ कैसे हो सकता है।”

संविद गुरुकुलम में मनाया गया राधाष्टमी महोत्सव

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राधा- जिनके नाम से आज भी बृज क्षेत्र में लोग एक दूसरे को संबोधित करते हों, जिनका नाम कृष्ण से पहले लिया जाता हो, जिनकी कृपा को हज़ारों अधरों से प्रार्थना के स्वर प्रतिपल फूटते हों, जो बृज की रज में, कण में, आदि से विस्तारित हो अंत तक हों, जिनकी अनुकंपा से श्याम विश्व के इकलौते सम्पूर्ण ईश कहाते हों, जिनकी निष्ठा और प्रेम से प्रेम को अमरत्व मिलता हो, आज उन्हीं लाड़ली जी राधिकारानी का जन्मोत्सव हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।

राधा एक नाम, एक पहचान से इतर एक भाव है जो श्याम में प्राण बनकर रहती हैं। श्यामा अपने श्याम को देखे बिना अपने नयन नहीं खोलतीं, वहीं श्याम भी अपनी सखी राधिकारानी के बिना चैन नहीं पाते। कृष्ण के जीवन को उठाकर ध्यान से देखा जाये तो कृष्ण के जीवन में आनंद और उल्लास तभी तक रहा, जब तक राधारानी का प्रत्यक्ष रूपेण वास उनके जीवन में रहा। कृष्ण भगवान थे, उसके बाद भी, राधारानी के प्रत्यक्ष से नेपथ्य में स्थानांतरित होने की दशा का प्रभाव कान्हा के नक्षत्रों पर जीवनपर्यन्त रहा।

उनके जीवन में महाभारत जैसा विध्वंस आया तो स्यमंतक मणि की चोरी का आरोप भी उस ब्रह्मांडनायक के मस्तक पर रहा जिसके अधिकारक्षेत्र में ये समूचा विश्व, जीव, प्रकृति, वनस्पति, ब्रह्मांड है। जो राजाधिराज महाराज हैं, जिनकी भुजाओं में सृजन और विनाश साथ झूलते हैं। जो बीज से ब्रह्मांड की आनंदमयी यात्रा का अनुभव हैं, उन कन्हैया को भी लाड़लीजी की शरण में शीश नवाना पड़ा। ये महिमा, ये भूमिका, ये प्रतिष्ठा हमारी प्यारी लाड़ली जी की बृज और समूचे भारत में है।

आज भी भारत में, भजन, कन्हैया से अधिक प्रेम की अधिष्ठात्री देवी राधिका के ही लिखे, सुने और गुनगुनाये जाते हैं। बोलै जाता होगा जय श्री कृष्ण गुजरात और द्वारिका में, बृज चौरासी कोस की ब्रह्मांडीय यात्रा में तो राधे-राधे ही संबोधन का एकमात्र प्रक्रिया है।

वृन्दावन के वात्सल्यग्राम स्थित संविद गुरुकुलम विद्यालय में आज राधिकारानी का जन्मोत्सव हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। छात्रों ने अपनी प्रतिभानुसार जहाँ राधा-कृष्ण के चित्र बनाये वहीं नाट्य कार्यक्रमों के माध्यम से आनंद बरसाया गया। इस आनंदोत्सव में जहाँ सांस्कृतिक कार्यक्रमों द्वारा छात्रों को अपनी सनातन संस्कृति की हर्षोल्लास के साथ तीज त्यौहार मनाने की प्रथा बताई गई वहीं छात्रों का अप्रतिम उल्लास देख कार्यक्रम में शामिल हुए अतिथि भी वाह कह उठे। कार्यक्रम के समापन पर प्राचार्या द्वारा छात्रों को इस कार्यक्रम का महत्व, मनाने के उद्देश्यों के साथ अन्य महत्वपूर्ण जानकारियाँ दीं।