विश्व के प्रथम गुरु – शिव

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कृतज्ञता एवं विनीत होने का महापर्व, गुरुपूर्णिमा, भारतीय सामाजिक अस्मिता के शीर्षबिंदुओं में से एक है। ये पर्व अपने आप में सांस्कृतिक समृद्धि का, वैचारिक नम्रता और सामाजिक उन्नति का महापर्व है।

यूँ तो किसी के सम्मुख झुकना एक दीन भाव है, लेकिन जो इस दीन भाव को भी महान बना दे, वही सांस्कृतिक विरासत है भारतवर्ष की। ये पर्व हमें विनम्र होना सिखाता है। गुरु के प्रति, गुरु स्वरुप माँ प्रकृति के प्रति, माता पिता के प्रति, समाज और देश के प्रति, हमारी सफलता के प्रत्येक मील के पत्थर के प्रति अपने सहज एवं सरल रूप में कृतज्ञता प्रकट करने का महापर्व है गुरुपूर्णिमा।

गुरु – जिसका महत्व ईश्वर से ज्यादा भारतीय वांग्मय में बताया गया है। गुरु – जिसकी कृपा सफलताओं के गिरि पर्वत चढ़ने के लिए आवश्यक है। गुरु – जिसके अनुभव से हमें सही और गलत का अंतर समझ आता है। गुरु – जिसकी शिक्षा हमें पशुता से मनुष्यत्व की यात्रा पर आगे बढाती है। गुरु – जिसकी परीक्षाओं की कठिनाई हमें चुनौतियों के समक्ष कठोर और अजिंक्य बनती हैं। गुरु – जिनकी कसौटी हमें तौलती है, सफलताओं के अहंकार से बचने के लिए।

गुरुपूर्णिमा, उस गुरु को श्रद्धासुमन अर्पित करता महापर्व है, जो हमें, हमारी अनेकों क्षमताओं, सफलताओं और सामर्थ्यों के बोझ को उतार कर फिर से हममें सहजता, सरलता एवं विनम्रता के नवांकुर स्फुटित करता है। गुरुपूर्णिमा महापर्व है आनंद का, उल्लास का, अपने योग्य होती प्रक्रियाओं के प्रति कृतज्ञता प्रदर्शित करने का।

शिव
शिव परिवार

विश्व के प्रथम गुरु माने जाते हैं महादेव शिव शम्भू। भोले बाबा, जो गुरु है, देवताओं के गुरु बृहस्पति और असुरों के गुरु शुक्र के। जो पहले अघोर हैं, अघोर अर्थात, जो भेदभाव से बहुत ऊपर हैं। जिनके लिए अच्छे और बुरे का कोई भेद नहीं, कोई भाव नहीं। जो अपनी बारात में देवों के साथ दानवों के नृत्य का आनंद लेते हैं। जो सज्जनों को दर्शन देते हैं तो दुर्जनों के मन की इच्छा भी पूर्ण करते हैं।

शिव सम है, सरल हैं, साधन और साध्य भी हैं। शिव को साधने के लिए न कोई साधन चाहिए न कोई साधना। शिव सरलता से सधते हैं। सध जाएं तो अशेष आशीषों की वर्षा कर दें, कुपित हो जाएं, तो तृतीय नेत्र खोल विध्वंस कर दें। शिव जो सिखाते हैं जीवन में संतुलन का महत्व। जो सिखाते हैं नारी सम्मान का महत्व, जो योग्यता से नहीं भाव से प्राप्य हैं, जिनके लिए सृजन और विध्वंस उनकी दो भुजाएं हैं। महादेव जिनकी स्तुति होने को एक लोटे जल से भी संभव है, तो क्या कुछ नहीं चढ़वा लें जब रुद्राभिषेक कराएं। शिव, जिनके बिन संसार शव है। शिव जो हलाहल को भी कंठ में धर लें। शिव जो आदियोगी हैं, सत्य का सुंदरतम स्वरुप हैं, जो सरलतम प्रयास से भी सध जाएं, नहीं तो जन्मजन्मांतरों के तप अनर्थ।

सावन के इस शुभारंभ के अवसर पर आइये विश्व के सर्वप्रथम गुरु को नमन करें। आप सभी को गुरुपूर्णिमा की अशेष शुभकामनाएं।

देवशयनी एकादशी का महत्व

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आज देवशयनी एकादशी है। इस पौराणिक महत्व के दिन की मान्यता है कि श्रीहरि विष्णु भगवान आज चतुर्मासिक शयन के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। प्रत्येक शुभ कार्य हेतु श्रीहरि की उपस्तिथि अनिवार्य कही गई है अतः आज से चार मास के कालखंड के लिए पृथ्वी पर कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। इस चार मास की योगनिद्रा के बाद श्रीहरि विष्णु देवोत्थान एकादशी के दिन वापस आते हैं, जिसके बाद सभी शुभ कार्य आरंभ हो जाते हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार इस दिन के महत्व एवं व्रत पूजन के बारे में श्रीकृष्ण भगवान से पूछा था। इसी महत्वपूर्ण दिन के बारे में देवर्षि नारद ने भी ब्रह्मदेव से पूछा जिसके प्रत्युत्तर में ब्रह्मदेव ने देवर्षि को एक कथाप्रसंग सुनाया जिसके अनुसार उन्होंने महान राजा मान्धाता के बारे में बताया।

महाराज मान्धाता एक पराक्रमी, सज्जन एवं धर्म के अनुरूप आचरण करने वाले सूर्यवंशी राजा थे। उनके राज्य में किसी प्रकार का कष्ट अथवा असुविधा किसी को नहीं थी। राजा स्वयं प्रजा को अपनी संततियों समान प्रेम करते थे एवं उनकी समस्याओं का अविलंब समाधान किया जाता था। उनके राज्य में किसी भी प्रकार की कोई भी प्राकृतिक आपदा नहीं आती थी।

श्रीहरि विष्णु

एक बार राज्य में देवयोग के कारण भीषण अकाल पड़ा। प्रजा के खाद्यान्न का संकट उत्पन्न हो गया। प्रजा त्राहिमाम कर उठी। धार्मिक अनुष्ठानों पर भी रोक लग गई। अकाल से पीड़ित प्रजा राजा के पास पहुंची एवं प्रार्थना करने लगी कि ‘हे राजन! संसार के जीवन यापन का मुख्य आधार वर्षा है। हमारे राज्य में वर्षा न होने के कारण अकाल पड़ा हुआ है जिससे अन्नजल का संकट उत्पन्न हो गया है। यदि इस समस्या का समाधान न हुआ तो हमें किसी अन्य राज्य में शरण लेनी पड़ेगी’।

प्रजा की इस दारुण दुःख से उत्पन्न पुकार पर राजा को ह्रदय विदारक दुःख हुआ। राजा ने ईशप्रार्थना की एवं कुछ लोगों के साथ वन की ओर चल दिये। अनेकों ऋषि मुनियों के पास समाधान हेतु गए किन्तु समाधान कहीं न मिला। थक हार कर राजा महर्षि अंगिरा के पास पहुँचे। महर्षि अंगिरा ने आने का कारण पूछा। राजा ने अपने कष्ट का कारण बता समाधान बताने की गुहार लगाई।

इसके बाद ब्रह्मा जी के मानस पुत्र महर्षि अंगिरा ने राजा को देवशयनी एकादशी का व्रत करने को कहा। महर्षि ने कहा कि इस व्रत के पालन से वर्षा भी होगी एवं प्रजा भी सुखमय जीवन व्यतीत करेगी। इसके बाद राजा ने महर्षि के कहे अनुसार विधि विधान के साथ व्रत किया। इसके बाद राज्य में वर्षा हुई तथा प्रजा को भी अकाल से मुक्ति मिल गई।

देवशयनी एकादशी के इस पावन पर्व पर आप सभी को वात्सल्य परिवार की अशेष शुभकामनाएँ।

कामधेनु गौ गृह का वात्सल्यमय महत्व

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सनातन धर्म और गौ को यदि एक-दूसरे का पूरक कहा जाए तो कुछ गलत नहीं होगा। गौ को पुरातन वैदिक संस्कृति के अनुसार माता रूप में पूजा जाता है। गौसेवा के लिए युगपुरुष भगवान श्रीकृष्ण भी गौपालक की लीला की थी। इससे गौसेवा का महत्व समझा जा सकता है।

वेदों से पुराणों तक, अनेकों महाग्रंथों में गौ का महत्व वर्णित है। संसार की संरक्षिका भी गौ को ही कहा गया है। गौ को हिंदुत्व दर्शन में माँ कहा गया है। माँ जो सहेजे, पोषण दे, पालन के साथ मातृत्व के भाव में अपना वात्सल्य लुटाये, वो गौमाता ही हो सकती है। शिशु के जन्मते ही, गौ दुग्ध से पोषित किया जाता है।

३३ कोटि, अर्थात प्रकार के देवताओं का वास गौमाता में कहा गया है। गौमाता को धन के रूप में माना जाता है। गौधन के संरक्षण, गौसेवा एवं गौपालन का चलन आज भी ग्रामीणांचल में प्रमुख रूप से है। प्रकृति और मानव के मध्य की एक प्रमुख कड़ी, गौमाता के अनेकों प्रसंग प्राचीन महाकाव्यों एवं ग्रंथों में मिलते हैं।

ज्योतिष विज्ञान के अनुसार, विवाह के लिए गोधूलि वेला सर्वोत्तम मानी जाती है। नवग्रहों की शांति में भी गौमाता की प्रमुख भूमिका होती है। आज भी भारतवर्ष के करोड़ों परिवारों में पहली रोटी गौमाता के लिए निकले जाने का विधान है। किसी शुभ कार्य के निष्कंटक संपूर्ण होने के लिए गौमाता को गुड़ खिलाने का प्रचलन है।

गौमाता का रूप कामधेनु है। कामधेनु जिसकी सेवा किसी भी वांछनीय फल की प्राप्ति में सहायक है। गौसेवा अनेकों कष्टों से मुक्ति दिलाती है। गौमाता वैज्ञानिक रूप से भी वातावरण की शांति एवं शुद्धि में सहायक है। वैसे भी गौमाता के रंभाने में जो स्वर निकलता है, उसमें ‘माँ’ की ध्वनि सुनाई देती है।

ऐसी ही अनेकों गौमाताओं की सेवा वात्सल्यग्राम के कामधेनु गौगृह में प्रतिदिन होती है। इन गौमाताओं की कुल संख्या लगभग २०० के आसपास है जिनसे वात्सल्यग्राम में पलते अनेकों बच्चों का पोषण होता है। इन गौमाताओं का आशीष ही इन बच्चों को प्रबुद्ध एवं विकसित करता है। वैसे भी कहा गया है कि गौमाता का दुग्ध बाल पोषण हेतु सर्वोत्तम है। इन गौमाताओं के प्रश्रयस्थल को कामधेनु गौ गृह कहा जाता है, जो वात्सल्यग्राम के मध्य में स्थित है।

कामधेनु गौगृह की समुचित व्यवस्था के लिए आपका सहयोग अपेक्षित है। सहयोग के लिए निम्न वेबलिंक पर क्लिक करें।

सप्तसुरों से अवगत कराता एक रिसोर्ट: मीरा माधव निलयम

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वृन्दावन के वात्सल्यग्राम स्थित है मीरा माधव निलयम रिसोर्ट। प्राकृतिक छटा ऐसी कि शांति की माला में संगीत के मोती पिरोते पंछी आज भी जब पूरे वृन्दावन कहीं नहीं मिलते, वो आपको मीरा माधव निलयम में दिखते हैं, मिलते हैं, गीत और संगीत की एक सांझी शाम आपके लिए सहेजते हैं। मीरा माधव निलयम – नाम में ही रस है, मीरा का माधुर्य, माधव का मोह और निलयम की अनुपम सांस्कृतिक विरासत। 

कभी आइये वृन्दावन तो इस रिसोर्ट में आराम के लिए नहीं, प्रकृति को महसूस करने आइये। यहाँ साँझ सवेरे खिड़की पर गौरैया आकर कुछ कह जाती है। कभी मद्धम, कभी तेज। 

कंक्रीट के बियाबान में जब मन अकुलाने लगे तब पहाड़ों और वादियों की महंगी यात्रा का मोह त्याग वृन्दावन के वात्सल्यग्राम स्थित इस रिसोर्ट आना आपको अधिक श्रेयस्कर लगेगा। 

यहाँ एक रोचक तथ्य ये है कि प्रकृति से मानव, इतना दूर हो गया कि इन पंछियों से मिलना और इन्हें समझना बहुत मुश्किल ही नहीं रहा, अपितु असंभव हो गया है। भाषा आज भी कितनी कमजोर है, विज्ञान आज भी कितना असहाय है। रोबोट से सर्जरी करा लेने वाले हम, फोन, टीवी, और शहरों को भी स्मार्ट बना देने वाले हम, एक चिड़िया की भाषा को समझने में असहाय हैं, ये प्रकृति से हमारी दूरी दर्शाता है। 

अगर ये दुनिया भी हैरी पॉटर का हॉग्वाट्स स्कूल होता तो हम सब आपस में बातें कर एक दूसरे को समझ सकते। शाम को पेट्रोल महंगा होगा, जाकर टंकी फूल करालो वाला भविष्य का ज्ञान देता तोता हमें संकटों से बचा, सही निर्णय लेने में मदद करता। मगर ये हो न सका, तो उसका दुःख भी क्या मनाना। 

लेकिन एक समय जब इंसान ने भाषा और लिपि नहीं बनाई थी, तब हर शब्द, ध्वनि, बराबर थीं। संगीत में भी सात स्वर, सात जीवों से लिए गए हैं। 

बादलों को घुमड़ते देख ख़ुशी में मोर जो ध्वनि निकालता है, वही “सा” है। गौमाता जब अपने बछड़े को ढूंढ मार्मिक स्वर में उसे पुकारती है वही ऋषभ यानि “रे” है। झुंड में मिमियाती बकरियां “ग” ही कहती हैं। भूख से व्याकुल बगुला “म” स्वर में रोता है। स्वरों कोकिला, कोयल, जब बसंत के सुहाने मौसम में अपनी वसुधा की सुंदरता का बखान करती है, तो वह “पंचम स्वर” लगाती है। घोड़े की हिनहिनाहट में जो स्वर है, वही धैवत यानि “ध” है। हाथी जब मतवाला होता है, तब उसका चिंघाड़ना “नी” यानि निषाद बन जाता है। 

आज भी गांव में भैंस, भेड, बकरी, गाय आदि से संवाद स्थापित करते समय लोग विभिन्न प्रकार की ध्वनियों का इस्तेमाल करते हैं। भोजपुरी, अवधी, पंजाबी, राजस्थानी आदि लोकगीतों में भी कुछ निश्चित ध्वनियाँ हैं, जिनका प्रयोग किया जाता है, जैसे, हे, ओहो, अरररर, सरररर आदि। 

महत्वपूर्ण ये नहीं है, कि कौन कैसी ध्वनि निकालता है। महत्वपूर्ण ये है कि हमारे आसपास की ध्वनियों को सुनने के अभ्यस्त हम बचे भी हैं या नहीं? हमारे आसपास कौन क्या कह रहा है, वो हम समझ पा रहे हैं? 

शायद नहीं। 

संभव है कि आपके शहर, मूड और आसपास के शोर में आप कुछ सुनना भूल गए हों। उस शांत वातावरण में, अपने मन की ख़ामोशी की आवाज सुनने के लिए, समय निकालिये। 

मीरा माधव निलयम की खासियत ही है, आध्यात्मिक शांति, आवाज देकर बुलाती गौरैया, वानस्पतिक सुख और आनंदित करता खिड़की पर आवाज लगाता खगकुल, जो शायद देर से सोने पर ताना मारे आपको,

“इतनी देर तक कौन सोता है”???

स्वस्थ समाज की अवधारणा: मातृशक्ति का पूजन सिखाता वात्सल्यग्राम

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माँ
उपरोक्त शब्द भारतीय सांस्कृतिक विशेषताओं का साम्य है। संस्कृति मतलब जीवन जीने का सलीका, तरीका, तौर और विशेषताएं, जिनके माध्यम से हम जीवन को सार्थक करते हैं। जीवन जिसके स्तर को उच्चपदीय बनाने को, मनाने को, दूसरों को सभ्यता सिखाने को, भारतीय समाज ने शक्ति को केंद्र में रखा है। 
शक्ति, जिसका अर्थ है महादेव जिसके वियोग में तांडव कर दें, राम जिनके वियोग में प्रकृति प्रदत्त साधनों का साधक बन साध लें समुद्र को भी, नष्ट भ्रष्ट कर दें स्वर्णिम लंका को भी, जिनके सम्मान की रक्षा हेतु एक असभ्य हिंसक राक्षकदल को समाप्त कर दें, जिनके सम्मुख महिष असुर और रक्तबीज भी प्राणों की भीख मांगें, वो शक्ति इस राष्ट्र की आत्मचेतना का चरम और परम प्रतीक रही हैं। 
भारत की संस्कृति में महिलाओं का सम्मान इस स्तर तक रहा है कि देश को ही माता कहा गया है। जननी और जन्मभूमि को बराबर का महत्व है। अपने देश को हम माँ कहते हैं, प्रकृति को माँ कह छठ जैसा त्योहार मनाते हैं, नवरात्रों में कन्यापूजन घर घर में होता है जहाँ बेटियों के पैर धोकर उन्हें पूजा जाता है। शादियों में आज भी कन्यादान होता है, जिसे पवित्र और पुण्यफल अर्जित करने का माध्यम भी माना जाता है। गौ को माता मान घर से निकलने पर गुड़ खिलाया जाता है, पहली रोटी निकाली जाती है, हमारी महिला शक्ति के प्रति सम्मान का भाव दर्शाती है। 

कालांतर में, उसी देश में अपराध भी महिला केंद्रित होकर रह गए हैं। दहेज़ हत्या, घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न, अपहरण, ऑनर किलिंग जैसी समस्याएं दिन प्रति दिन बढ़ती जाती हैं। इन समस्याओं के उन्मूलन के लिए सरकार बहादुर अनेक प्रयास करती है। कठोरतम कानून लेकर आती है लेकिन परिणाम वही  ढाक के तीन पात रहता है। 
इन परेशान करती हृदयविदारक आपराधिक ख़बरों के बीच वृन्दावन के हृदयस्थल में एक ग्राम ऐसा है जहाँ “यत्र नारी पूज्यन्ते” की असल परिभाषा गुंथी हुई है। जहाँ मातृ शक्ति के अनुसार व्यवस्थाएं चलती हैं और महिला मतलब वो जो पूज्यनीय है – सभी के लिए। यहाँ सभी सम्मान में प्रणाम करते हैं, नमो नारायण से सम्बोधित करना आम प्रथा है। अनेकों प्रकल्पों की मुख्यकर्ता महिलाएं ही हैं। इस वात्सल्य के गांव को वात्सल्यग्राम कहते हैं। 
वात्सल्यग्राम की परिकल्पना परम पूज्य दीदी माँ ऋतंभरा जी ने की। वात्सल्यग्राम के केंद्र में समाज में त्यक्त महिलाओं को एक छत के नीचे लाकर आत्मीयता के संबंधों में बांध दिया जाता है। वात्सल्यग्राम का स्वरुप द्वापरयुगी है। यहाँ प्रेम रस बरसता है। इस ग्राम में मीरा के प्रेम को माधव का साथ मिलता है, मंदिर में दोनों एक साथ विराजते हैं, जो अन्यत्र कहीं नहीं मिलता। 

माँ सर्वमंगला पीठम की स्थापना का पुण्यफल भी वात्सल्यग्राम को मिला है, जिसके आँगन में, सत रज तम जैसे गुणों की अवधारणा के अनुरुप अपने इतिहास और गौरव को समेट आने वाली पीढ़ियों को शिक्षित ही नहीं, संस्कारित भी करेगा। 
व्यक्ति विशेष के अन्तःकरण में सभी उत्तरों का मूल होती है माँ, जननी भी और जन्मभूमि भी। इसी कारण पिछले वर्ष लगे लॉकडाउन में पलायन करती हज़ारों की भीड़ अपनी माँ अपने गाँव की ओर पैदल ही चल दी। उन्हें पता था कि अपनी जन्मभूमि अपनी गोद में लेकर भूख लगने पर खिला देगी, धूप में छाँव करेगी, मूलभूत आवश्यकताओं की कमी नहीं होगी। 

महिलाओं को हमेशा कमजोर और पीड़ित कहा गया है, लिखा गया है, समझा गया है। उन्हें इनडोर गेम्स खेलने को कहा गया है क्यूंकि बाहर मैदान में वो चोटिल हो सकती हैं। वात्सल्यग्राम में स्थित संविद गुरुकुलम स्कूल में स्थापित खेल अकादमी में घुड़सवारी कराई जाती है, इन्ही कमजोर दिखती बालिकाओं को। 
विरोधाभास देखिये, इस घुड़सवारी के माध्यम से सर्वसमाज को जो सन्देश मिलता है, वो ये कि लड़कियां सिर्फ बोर्ड परीक्षाओं की टॉपर ही नहीं, लक्ष्मीबाई सी घुड़सवार भी हो सकती हैं। 
वात्सल्यग्राम नारीवाद की वास्तविक परिभाषाओं को परिलक्षित करता है, इसके अधिकतर सेवा प्रकल्पों की जिम्मेदारी महिलाओं के हाथ है। विशिष्ट बच्चों के लिए बनाया गया वैशिष्ट्यं जैसे प्रकल्प हों या संविद गुरुकुलम जैसे विद्यालय जहाँ रोबोटिक्स से 3 डी प्रिंटिंग तक की पढाई कराई जाती है, नृत्य से कला तक अनेकों विषयों में बालिकाओं को पारंगत किया जाता है अथवा संविद एक्सपर्ट स्कूल जैसे स्वाबलंबन के शिल्पकेंद्र, महिलाओं की सफल व्यवस्था की तस्वीर दिखती है। 
समाज को सभ्य, भयमुक्त और बेहतर स्थल बनाने के साथ अपराधमुक्त करना है तो वात्सल्यग्राम की इस भावना को जनजन तक पहुँचाना होगा। भाव जिसमें महिलाओं को सम्मान मिलता हो, समान नहीं थोड़े अधिक अधिकार मिलें, शीर्ष पदों पर उनकी नियुक्ति हो, तो अपने आप महिलाओं के प्रति सम्मान का भाव आएगा, अपराध कम होंगे। 
वात्सल्यग्राम की इस मानव की मनःस्थिति को सुधर सुदृढ़ करने के प्रण के साथ आप हैं, तो सहयोग कीजिये, हाथ बढ़ाइए, साथ दीजिये, आगे बढ़ाइये – मातृशक्ति के पूज्य होने के भाव, संस्कार और सम्मान को। 

व्यक्ति से व्यक्तित्व और व्यक्तित्व से विचार होने की गौरवमय यात्रा हैं संजय भैया: मिलिए वात्सल्यग्राम के नींवपुरुष से

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बुद्ध के लिए जैसे नागार्जुन थे, गांधीजी के लिए धर्मपाल थे, वैसे ही वात्सल्यग्राम एवं परमशक्तिपीठ के लिए आदरणीय संजय भैया जी। बुद्ध के अनित्य-अनात्म को नागार्जुन ने सैद्धांतिक रूप दिया। बुद्ध के निर्वाण को शून्यवाद और निःस्वभाववाद की संज्ञा दी। गाँधी-चिंतन की मूलभूत सरणियों को धर्मपाल ने सूत्रबद्ध किया। तर्कणा की एक ठोस भूमि गांधीवाद के मूल में बनाई है।

संजय भैया जी का वात्सल्यग्राम एवं परमशक्तिपीठ के संवर्धन, उचित सम्प्रेषण एवं दीदी माँ जी के आशीष के साथ दिग्दर्शन उसी के सापेक्ष कहा जाए तो अतिश्योक्ति न होगी। अकादमिक अध्ययन की धाराएँ सिद्धांत से संबंध रखती हैं। संविद गुरुकुलम विद्यालय के गुण और आकार का विस्तारण एवं उसकी योजनाओं के सफल क्रियान्वयन का सुरम्य तारतम्य हैं संजय भैया जी।

देश की कठिनतम प्रतियोगी परीक्षा सीए पास कर अर्थ के नवीन सिद्धांतों की रचना उनके लिए दुरूह न होती, किन्तु दीदी माँ जी के आशीर्वाद के साथ, उनके सहयोगी, श्री भैया जी आज वात्सल्यग्राम के अनेकों सेवाप्रकल्पों के आत्मबल हैं। संविद गुरुकुलम विद्यालय में बालिकाओं के भविष्य को सँवारने के महायज्ञ को उनसे बेहतर कौन समझ सकता है? भारतीय संस्कारों के मूल के साथ आधुनिक शिक्षा के सम्मिलित स्वरुप की पराकाष्ठा है संविद गुरुकुलम विद्यालय, जहाँ दीदी माँ जी के आशीष स्वरुप संस्कारम की कक्षाओं के साथ 3 डी प्रिंटिंग एवं रोबोटिक्स का भी पाठन किया जाता है।

धौरवर्ण धवल वस्त्र, पैरों में जड़ाऊँ, तेजपूर्ण आभामंडल – दीदी माँ जी के सहयोगियों में सबसे सार्थक, सक्रिय एवं सार्वजनिक जीवन उन्होंने जिया है। इस प्रेरणामय जीवन से गोकुलम आवास में रहने वाले अनेकों बच्चों को लक्ष्य प्राप्ति की शक्ति मिलती है। वैसे भी यदि देखा जाये तो मनुष्य अंधकार में जी सकता है, अन्याय में जी सकता है, किन्तु आशा के बिना नहीं जी सकता। आदर्श का एक विग्रह उसे अपने सम्मुख चाहिए – मानुषी विग्रह। जिसकी तरफ नजर बढाकर देखा जा सके। जो प्रेरित करे। यह विश्वास दिला सके कि जीवन लक्ष्य प्राप्ति का साधन है। कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं। मानवसेवा आत्मसंतुष्टि के लिए जरुरी है। वात्सल्यग्राम के लिए भैया जी वैसी ही आशा का मूर्तन है।

भैया जी भारतीय मूल्यों एवं चेतना का अनुगायन हैं। सबकुछ प्राप्य होने से त्याज्य होने की यात्रा हैं। उसी यात्रा का सातत्य हैं – सिद्धांत से व्यवहार तक। ज्ञान और कर्म का द्वैत हैं भैया जी। उन्होंने वात्सल्यधाम की सेवा के लिए स्वयं को लोकार्पित किया है। प्रेय को जो त्याग दे, वह तपस्वी है। किन्तु श्रेय को भी जो त्याग दे, साधु तो वही कहलाएगा। भैयाजी भी श्रेय के बिना संलग्न हैं – सतत, अपने संकल्प की सिद्धि के लिए, जो वात्सल्यग्राम एवं परमशक्तिपीठ के रूप में, दीदी माँ जी के आशीर्वाद के साथ, समाजसेवा का संकल्प।

जन्मदिन के अवसर पर निष्ठा दिवस की अनंत मंगलकामनाएं।

स्वाधीनता आंदोलन के जनक चापेकर बंधु: वात्सल्यपूर्ण नमन

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समय था ईसवी 1897 और जगह थी पुणे। महामारी ने पुणे को अपने चंगुल में ले रखा था। प्रशासन से जनता को आशा थी सहयोग की, सहायता की, किन्तु प्रशासनिक अधिकारी जनता को पीड़ित और अपमानित ही करते रहे। उनके पूजास्थल में जूते पहन कर घुस जाना, प्रताड़ित करना उन्हें अच्छा लगता था। इन अधिकारियों में प्रमुख थे – जिलाधिकारी वाल्टर चार्ल्स रैंड तथा सहायक लेफ्टिनेंट एगर्टन आयर्स्ट।

हरिभाऊ चापेकर पुणे के सम्मानित सज्जन थे। उनके तीन पुत्र थे दामोदर हरि चापेकर, बालकृष्ण हरि चापेकर और वासुदेव हरि चापेकर। ये तीनों भाई तिलक को गुरु मानते थे और उसी प्रकार सम्मान देते थे। अत्याचार और अन्याय विषय के संदर्भ में लोकमान्य तिलक ने शिवाजी महाराज का उदाहरण देते हुए चापेकर बंधुओं से एक दिन प्रश्न किया कि शिवाजी महाराज ने अत्याचार का विरोध अपने समय में किया था लेकिन अंग्रेजों के अत्याचार के विरोध में तुम लोग क्या कर रहे हो? इस प्रश्न के बाद ही चापेकर बंधुओं ने विचार कर लिया कि पुणे की अस्मिता की रक्षा करने के लिए इन अंग्रेज अधिकारियों को दंडित करना होगा।

जिस घडी की प्रतीक्षा थी, वो अवसर लेकर आई। दिनांक 22 जून 1897 को पुणे के ‘गवर्नमेंट हाउस’ में महारानी विक्टोरिया के राज्यारोहण की हीरक जयंती मनाई जा रही थी। इसमें उक्त दोनों अंग्रेज अधिकारी भी आए हुए थे। दामोदर हरि चापेकर अपने भाई बालकृष्ण हरि चापेकर अपने एक मित्र महादेव रानाडे वहां पहुंच गए। अब प्रतीक्षा थी, सभास्थल से इन दोनों अधिकारियों के बाहर निकलने की। रात सवा 12 बजे के लगभग ये दोनों सभास्थल से बाहर निकले, और अपनी अपनी बग्गियों में सवार हो गए। अपनी योजनानुरूप, दामोदर हरि चापेकर अंग्रेज अधिकारी रैंड की बग्गी के पीछे चढ़ गए और समय व्यर्थ किये बिना उस अधिकारी को गोली मार दी। उधर बालकृष्ण हरि चापेकर ने आयर्स्ट पर गोली चला दी। गोली लगने से आयर्स्ट मौके पर ही मारा गया लेकिन रैंड अस्पताल में तीन दिन बाद मृत्यु को प्राप्त हुआ।

पुणे की उत्पीड़ित जनता के कष्टों का अंत करने वाले चापेकर बंधुओं की पुणे की जनता ने जय जयकार की। चापेकर बंधु फरार हो चुके थे। पुलिस की सामर्थ्य अनुसार खोजबीन के बाद भी उन्हें पकड़ा नहीं जा सका। अंततः इंटेलिजेंस सुपरिटेंडेंट ब्रुइन ने घोषणा की कि इन फरार लोगों को पकड़ने में मदद करने वाले को बीस हजार का ईनाम दिया जायेगा।

इस ईनाम के लोभ में दो भाइयों, जिन्हें गणेश शंकर द्रविड़ और रामचंद्र द्रविड़ कहा जाता था, ने चापेकर बंधुओं का सुराग अंग्रेज अधिकारी ब्रुइन को दे दिया। दामोदर हरि चापेकर पकड़ में आ गए, किन्तु बालकृष्ण हरि चापेकर का पता न लग सका। न्यायालय में मुकदमा चलाया गया, सजा सुनाई गई – फांसी। दामोदर हरि चापेकर ने सहर्ष सजा स्वीकार की। लोकमान्य तिलक उनसे मिलने आये और गीता की एक प्रति भेंट की। अप्रैल 1898 को वो हंसते हुए फांसी के फंदे पर चढ़ गए। फांसी चढ़ते हुए भी उनके हाथ में गीता की प्रति थी।

बालकृष्ण हरि चापेकर के कहीं भी पकड़ में न आने पर पुलिस उनके घरवालों को परेशान करने लगी। इन अत्याचारों के कारण बालकृष्ण जी स्वयं पुलिस थाने पहुंच गए। तीसरे भाई वासुदेव चापेकर ने अपने साथी महादेव गोविंद रानाडे को साथ लेकर द्रविड़ भाइयों को 8 फरवरी 1899 को द्रविड़ भाइयों को गोली मार दी। अंततः वासुदेव चापेकर को 8 मई और बालकृष्ण चापेकर को 12 मई 1899 को यरवडा कारागार में फांसी दे दी गई।

महान क्रांतिवीर महादेव गोविंद रानाडे को भी उसी यरवडा कारागार में 10 मई को फांसी पर लटका दिया गया जहां चापेकर बंधुओं का जीवन अंत हुआ था। इस महान क्रांतिपथ पर पथिक होने की प्रेरणा इन चारों युवकों को लोकमान्य तिलक द्वारा प्रवर्तित ‘शिवाजी महोत्सव’ तथा ‘गणपति महोत्सव’ से ही मिली थी। इन महोत्सवों का उद्देश्य ही था महाराष्ट्र के युवाओं को धर्म तथा राष्ट्र के लिए लड़ने हेतु प्रेरित करना। ये चारों युवक फांसी पर झूल तो गए लेकिन अंग्रेजी हुकूमत को ये संदेश दे गए कि भारत, भारतीयों का है। यहाँ शासन का अधिकार भारतीयों का ही है। यदि किसी प्रकार कोई विदेशी सत्ता भारत पर अधिकार कर अन्यायपूर्ण एवं अराजक शाशन करना चाहते हैं, तो उन्हें भारतीय युवाओं द्वारा प्रायोजित हिंसक विरोध का सामना करने हेतु भी तैयार रहना चाहिए।

अपने देश, समाज, परिवार एवं धर्म को अत्याचारों से बचाते चापेकर बंधु हों या महादेव गोविंद रानाडे, इस त्याग और समर्पण की दूसरी मिसाल मिलना मुश्किल है। इस अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना, गलत को प्रतिकार करना और खुद को मातृभूमि के लिए समर्पित करने के इस प्रण का ही नाम है क्रांति।

वात्सल्य परिवार की ओर से भावपूर्ण श्रद्धांजलि।

माँ गंगा की अवतरण कथा

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अयोध्या के महाराजा सगर की दो पत्नियां थीं जिनका नाम था केशिनी और सुमति। जब वर्षों तक महाराज सगर के कोई संतान नहीं हुई तो उन्होंने हिमालय में भृगु ऋषि की सेवा की। भृगु ऋषि ने उनकी सेवा से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान मांगने को कहा। सगर ने भृगु ऋषि से संतान प्राप्ति की इच्छा व्यक्त की। भृगु ऋषि ने आशीर्वाद देते हुए कहा कि तुम अनेकों पुत्रों के पिता बनोगे। तुम्हारी एक पत्नी से तुम्हें साठ हजार पुत्र होंगे और दूसरी पत्नी से तुम्हें एक पुत्र होगा और वही तुम्हारा वंश आगे बढ़ाएगा।

कुछ समय पश्चात रानी केशिनी ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम असमंजस रखा गया। सुमति के गर्भ से एक मांसपिंड उत्पन्न हुआ जो साठ हजार टुकड़ों में विभक्त हो गया। बाद में महीनों तक घी से भरे गर्म घड़ों में रखने पर इनसे साठ हजार बच्चों का जन्म हुआ। सगर के सभी पुत्र वीर एवं पराक्रमी हुए हुए किन्तु असमंजस निष्ठुर एवं दुष्ट था। राह चलते लोगों को प्रताड़ित करना उसे अच्छा लगता था। लोगों को सड़क से उठाकर सरयू में फेंक देता था।

महाराजा सगर ने भरसक प्रयास किए कि उनका पुत्र सद्मार्ग पर आगे बढे। धर्म और पुरुषार्थ के कर्मों में संलग्न रहे किन्तु कुछ भी परिवर्तन न होने पर उन्होंने असमंजस को राज्य से निष्कासित कर दिया। असमंजस के पुत्र का नाम था अंशुमान जो गुणों में अपने पिता से सर्वथा विपरीत था। वह धर्मोन्मुख, वेदों का ज्ञाता एवं दयालु था। अनेकों विद्याओं में निपुण अंशुमान कर्तव्यनिष्ठ था।

एक बार महाराजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ करने का प्रण किया। अनेकों महान ऋषिगण उपस्थित हुए किन्तु यज्ञ प्रारंभ होने से पूर्व ही इंद्र ने घोडा चुराकर महर्षि कपिल के तपोवन में छोड़ दिया। महाराजा सगर ने यज्ञ के घोड़े को ढूंढने में अपने सभी पुत्रों को लगा दिया, क्यूंकि उस घोड़े के बिना यज्ञ संभव नहीं था। अनेकों प्रयासों के बाद भी घोडा नहीं मिला तो महाराजा सगर ने अपने पुत्रों को फटकार लगाई क्यूंकि काफी समय व्यतीत हो चुका था।

पिता की फटकार से व्याकुल हुए पुत्रों ने सही गलत का भेद छोड़ पुनः अश्व की खोज प्रारंभ की। यहाँ वहां पृथ्वी की खुदाई करने लगे, लोगों पर अत्याचार बढ़ा दिए गए, पृथ्वी और वातावरण को नुकसान पहुंचाने लगे। पृथ्वी को कई जगह खोदने के बाद उन्हें वो अश्व महर्षि कपिल के आश्रम के पास दिखा। कपिल मुनि समीप ही तपस्या में लीन थे। घोड़े के मिलने से प्रसन्न उन राजकुमारों ने जब समीप में महर्षि को देखा तो उन्हें लगा कि ये घोडा महर्षि कपिल ने ही चुराया है, जिस कारण वो कपिल मुनि को मारने दौड़े। कपिल मुनि ने आंखें खोलकर उन्हें भस्म कर दिया।

जब बहुत समय बीतने पर भी सगर के पुत्र नहीं लौटे तो उन्होंने अपने पौत्र अंशुमान को उनकी खोज में भेजा। अंशुमान अपने चाचाओं को ढूंढ़ते हुए कपिल मुनि के आश्रम के समीप पहुंचे तो वहां उन्हें अपने चाचाओं की भस्म का ढेर देखा। अपने चाचाओं की अंतिम क्रिया के लिए जलश्रोत ढूंढ़ने लगे। गरुड़ देव ने उन्हें बताया कि किस प्रकार उनके चाचाओं को कपिल मुनि ने उनका अपमान करने पर भस्म कर दिया है। किसी भी सामान्य जल से तर्पण करने पर इन्हें मुक्ति नहीं मिलेगी। अंशुमान ने गरुड़ देव से इसका उपाय पूछा तो उन्होंने कहा कि स्वर्ग से हिमालय की प्रथम पुत्री गंगा के पृथ्वी पर अवतरण से ही सगर पुत्रों को मुक्ति मिलेगी।

अंशुमान यज्ञ के अश्व के साथ अयोध्या वापस आ गए और उन्होंने महाराजा सगर को सारी बात विस्तारपूर्वक बताई। सगर अपना राजपाठ अंशुमान को सौंपकर हिमालय पर तपस्या करने चले गए, जिससे कि पृथ्वी पर गंगा को लाकर अपने पुत्रों का तर्पण कर सकें। महाराजा सगर गंगा को पृथ्वी पर लाने में असफल रहे।अंशुमान भी अपना राज अपने पुत्र दिलीप को सौंपकर हिमालय तपस्या करने चले गए ताकि गंगा को पृथ्वी पर ला सकें। वर्षों तक तपस्या करने के बाद अंशुमान भी स्वर्ग सिधार गए परंतु गंगा को धरती पर न ला सके।

दिलीप भी अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तपस्या करने हिमालय गए जहाँ अपना सम्पूर्ण जीवन लगा देने के बाद भी वो गंगा को पृथ्वी पर न ला सके।

दिलीप के पुत्र भगीरथ, दिलीप के बाद राजा बने। भगीरथ एक धर्मपरायण एवं कर्तव्यनिष्ठ राजा थे। वर्षों तक संतान न होने पर वो अपने राज्य की जिम्मेदारी अपने मंत्रियों को सौंप हिमालय तपस्या करने निकल गए। बिना कुछ खाये पिये उन्होंने कठोर तप किया जिस कारण प्रसन्न होकर ब्रह्मदेव ने उन्हें वर मांगने को कहा। भगीरथ ने ब्रह्मदेव से अपने मन का प्रयोजन कहा जिसमें अपने पूर्वजों के तर्पण हेतु पृथ्वी पर गंगावतरण एवं अपने लिए संतान की इच्छा जताई। ब्रह्मदेव ने तथास्तु के साथ गंगा के तीव्र वेग की समस्या बताते हुए समाधान में महादेव शिवशंकर नाम का उपाय सुझाया। भगीरथ ने महादेव की तपस्या कर उन्हें भी प्रसन्न कर लिया। महादेव ने गंगा जटाओं में धारण करने पर सहर्ष सहमति जता दी।

अंततः देवनदी गंगा ने धरती पर अवतरित होने का निर्णय लिया। महादेव ने गंगा को अपनी जटाओं में समा लिया और जब उन्हें अपनी जटाओं से छोड़ा तो धाराएं निकलीं। तीन धाराएं पूर्व की ओर एवं तीन धाराएं पश्चिम की ओर बहने लगीं तथा एक धारा भगीरथ के पीछे चलने लगी। महाराज भगीरथ अपने रथ पर आगे आगे तथा गंगा की धारा उनके पीछे पीछे। रास्ते में जो कुछ आता, वो नदी में मिल जाता।

गंगा नदी के रास्ते में महर्षि जह्नु का भी आश्रम था जो गंगा के तीव्र प्रवाह में बह गया। इस पर महर्षि जह्नु को अत्यंत क्रोध आया और उन्होंने अपने योगबल से गंगा का सारा पानी पी लिया। इसपर महाराज भगीरथ एवं अन्य देवताओं ने महर्षि जह्नु से प्रार्थना की, कि जनकल्याण हेतु गंगा को मुक्त करें। देवताओं के इस प्रकार विनती करने पर महर्षि जह्नु ने गंगा को अपने कानों के द्वार से मुक्त कर दिया। इस कारण गंगा नदी को जाह्नवी भी कहा जाता है।

उसके बाद महाराज भगीरथ का पीछा करते हुए गंगा समुद्र की ओर बढ़ चली और अंततः सगर के पुत्रों की भस्म को अपने जल में मिला कर उन्हें सभी पापों से मुक्त कर दिया।

पापनाशिनी माँ गंगा के इस अवतरण दिवस पर वात्सल्य परिवार की ओर से सभी महर्षियों के श्री चरणों में शत शत नमन।

समाज के शैक्षणिक सहयोग को समर्पित: कृष्ण ब्रह्मरतन विद्यामंदिर

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मानव के व्यक्तित्व का निर्माण करती, वैज्ञानिक मानसिकता, तार्किकता, भावभंगिमाओं के साथ कलाओं का विकास करती इस शिक्षा का दोहन एवं शोषण भी होता है। व्यक्तिगत (प्राइवेट) प्राथमिक विद्यालयों के डोनेशन से लेकर मासिक अध्ययन शुल्क तक, इस शिक्षा को आम गरीब जन से दूर कर देते हैं। इसके बाद जो माध्यम बचता है, वो है सरकारी विद्यालय, जिनमें कहीं कहीं अच्छी शिक्षा मिल जाती है, लेकिन अधिकतर विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं पाती, यह भी एक सर्वविदित तथ्य है।

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महरानी लक्ष्मीबाई के जीवट को वात्सल्यपूर्ण नमन

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1857 का स्वाधीनता संग्राम अपने आप में एक अनूठा प्रयास था। संचार के साधनों का अभाव, हथियार और कुशल लड़ाकों के अभाव के साथ ही साथ सक्षम नेतृत्व का सर्वथा अभाव के बाद भी स्वाधीनता संग्राम की इस ऐतिहासिक लड़ाई ने अंग्रेजों की चूलें हिला दी थीं।

इस संग्राम की एक बहुत बड़ी मार्गदर्शक और प्रणेता थीं महारानी लक्ष्मी बाई। महारानी लक्ष्मी बाई साक्षात शक्तिस्वरूपा थीं। एक अकेली महिला जिसने ओरछा और दतिया राज्य की सम्मिलित सेनाओं को हराया, ग्वालियर जैसे बड़े राज्य की सेनाओं को हरा वीरता और सक्षम नेतृत्व का परिचय दिया। कुशल युद्धनीति की माहिर रानी लक्ष्मीबाई शस्त्र प्रशिक्षण की महिलाओं के लिए वकालत करती थीं।

अपने सिर को उठाकर चलने का नाम हैं रानी लक्ष्मी बाई। आरामदायक गुलामी से कष्टप्रद संघर्ष को चुनने वाली मूर्तरूप हैं रानी लक्ष्मीबाई। महिलाओं के सशक्तिकरण की साक्षात रूप हैं रानी लक्ष्मीबाई। मानवता के महिलारूप का नाम हैं महारानी लक्ष्मीबाई।

आधुनिक भारत की पहली महिला सशक्तिकरण का पर्याय रही हैं महारानी लक्ष्मीबाई। अंग्रेजों ने महारानी लक्ष्मीबाई को ६० हजार की पेंशन के साथ अन्य सुविधाओं का प्रस्ताव दिया था, जिसके जवाब में महरानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों को इंकार भिजवा दिया।

आज ही के दिन १८५८ को महारानी लक्ष्मीबाई का देहांत हुआ। ये उनकी जिजीविषा की पराकाष्ठा ही है जिसमें उनकी मृत्यु युद्धक्षेत्र में हुई। वात्सल्य परिवार की ओर से महामानवी महारानी लक्ष्मीबाई को शत शत नमन।