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September 2021

नारी के नारायणी होने के भाव का जीवंत रूप: माँ सर्वमंगला पीठम

By ChikitsalayaNo Comments

स्त्रीत्व का सर्वोत्तम रूप होता है मातृत्व लिए हुए एक माँ का रूप, जिसमें स्त्री जहाँ अपने बालक के लिए भावनाओं के कोमलतम भाव में सन्निहित होती है तो उसकी रक्षार्थ पाषाणिक कठोरतम रूप को भी साध लेती है। स्त्री का आधारभूत चिंतन ही है वात्सल्य लिए हुए, जिसमें कभी वो माँ प्रकृति का रूप धरती है तो कभी माँ गंगा और नर्मदा, कभी वो स्वयंभू धरा होती है तो कभी आदिशक्ति स्वरूपा माँ जगदंबा जी प्रतिपल हमारे उद्धार का चिंतन लिए हमें आशीषों के साए तले रखती है।

सनातन की संस्कृति नारी को पूजने की है, उसके गुणों को सहेजने की है, तभी तो कहा भी जाता है –

यत्र नारी पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता !!

नारी हमारे अवचेतन मन में माँ जगदंबा है। कन्यापूजन हमारे समाज का सामाजिक चिंतन है, माँ के चरणों तले स्वर्ग का भान सनातनी स्वरुप है। माँ भगवती के दर्शन, पूजन और आध्यात्मिक चिंतन सत्मार्ग पर ले जाने का सहज मार्ग है। प्रभु श्री राम ने भी उस कल्पना को ही विस्तारित किया है जिसमें कहा गया है –

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी !!

वृंदावन के वात्सल्यग्राम में भी माँ भगवती के मंगलकारी रूप के विग्रह का निर्माण आध्यात्मिक ज्ञान एवं शांति का एक भव्य केंद्र होगा। माँ सर्वमंगला पीठम नामक इस शक्तिपीठ के निर्माण में तीन छतें होंगी जो एक दूसरे के ऊपर होंगी किंतु बिना किसी सहारे के।

ये तीन छत तम, रज और सत्व गुणों का भाव प्रस्तुत करेंगी जिनके माध्यम से इन तीनों गुणों का संबंध समझने में सरलता होगी। ईश्वर एवं भक्त के बीच का संबंध इन्हीं तीनों गुणों के माध्यम से सतत चलता रहता है। इस शाश्वत भाव के साथ ही इन तीनों छतों का निर्माण होगा।

इन तीनों छतों के नीचे प्रतिष्ठित होगा माँ भगवती त्रिपुर सुंदरी का दिव्य एवं भव्य मंदिर। इस मंदिर के भूतल पर चारों युगों, सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग एवं कलयुग में स्त्री द्वारा स्त्री की सम्पूर्ण सृष्टि यात्रा को आधुनिक तकनीक एवं पुरातन गरिमा के साथ इस अनुभालय में अनुभव किया जा सकेगा। इस अनुभव के माध्यम से आज की नारी आत्मस्थ होकर अपनी पौराणिक गरिमाओं का पुनः स्मरण कर, यथार्थ में माँ सर्वमंगला के स्वरुप में रम सकेगी। इसके अतिरिक्त एक नयनाभिराम प्रदर्शनी के माध्यम से भारत की गौरवशाली गाथाओं का भी प्रदर्शन किया जायेगा।

यदि आप सहयोग करना चाहें तो निम्नलिखित वेबलिंक पर क्लिक कर सकते हैं।

सार्वभौमिक शिक्षा का नवाँकुर: कृष्ण ब्रह्मरतन विद्या मंदिर

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शव से शिव होने की मंगलमय यात्रा है शिक्षा। मनुष्य के अंतस के तमस को हर लेने के सामर्थ्य का संबोधन है शिक्षा। शिक्षा है तो मनुज, नहीं तो पाशविक वृत्तियों का समुच्चय है मनुज। शिक्षा समाधान है, शिक्षा सामर्थ्य और पौरुष भी, मन के निर्मलतम भावों को साकार करती चेतना का पर्याय है शिक्षा। साधारण व्यक्ति को विशिष्ट व्यक्तित्व और विशिष्ट व्यक्तित्व को एक विचार में परिवर्तित करती संकल्पना है शिक्षा।

ईश्वर रचित पर विचरते अनेकों जीव जंतुओं, प्राणियों, पशु पक्षियों में मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ होने की उपमा, स्वयं माँ प्रकृति ने दी। इस विवेक और बुद्धि के परिष्करण का मार्ग उसे शिक्षा ने ही सुझाया है। शिक्षा मानव होने की कसौटी है अन्यथा भावभंगिमाओं से दैनिक क्रियाकलापों तक, मनुष्य पशुओं से भिन्न कहाँ है?

शिक्षा की इस अनुपम उपयोगिता के संज्ञान में होने के उपरांत भी भारत में एक बड़ी जनसंख्या प्राथमिक शिक्षा से विहीन है। उसके जीवनस्तर की गिरावट का कारण उचित शिक्षा का अभाव है अथवा शिक्षा के अभाव के कारण जीवनस्तर की गिरावट है, यह व्यक्तिविशेष ही जानता है किंतु गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, उच्च जीवनस्तर की आधारशिला होती अवश्य है।

सदियों बाद प्राप्त हुई स्वतंत्रता ने भारतवर्ष को लोककल्याणकारी राज्य के रूप में आकार दिया। एक ऐसा देश जहाँ शिक्षा, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य हेतु जनता सरकारों पर निर्भर रही किंतु अपेक्षानुरूप कार्य नहीं हुए एवं इस कारण देश में मध्यम एवं उच्च वर्गीय परिवारों के बच्चों की शिक्षा असार्वजनिक क्षेत्र के विद्यालयों में संपन्न होती है। इससे जहाँ व्यवस्थापकों के बच्चों को भी असार्वजनिक विद्यालयों में सुविधापूर्ण शिक्षा प्राप्त होती है, जिस कारण सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता में कोई सुधार नहीं होता।

अपने सामाजिक दायित्वों के प्रति जागरूक संत समाज ने सामाजिक परोपकार एवं समाज सुधार के कार्यों में हमेशा रुचिकर संलग्नता दिखाई है। वृंदावन के वात्सल्यग्राम नामक सेवाप्रकल्प की अधिष्ठात्री परमपूज्य दीदी माँ साध्वी ऋतंभरा को संपूर्ण देश एक समाजोन्मुखी संत के रूप में जानता है। शैक्षणिक ज्ञान के प्रसार हेतु परमआदरणीय दीदी माँ जी ने कृष्ण ब्रह्मरतन विद्या मंदिर की नींव रखी जिसमें पिछड़े तबके के बच्चों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण एवं रहन सहन की पर्याप्त व्यवस्था के साथ अन्य क्रियाकलापों के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान की जा रही है। इस प्रकल्प के संरक्षक श्री ब्रह्मरतन जी अग्रवाल का सान्निध्यपूर्ण सहयोग अनुकरणीय रहा है।

व्यवस्थापक मंडल के रूप में श्री संजय भैया जी, स्वामी जी, सुमन दीदी का विशेष सहयोग इस शैक्षणिक सेवाप्रकल्प को प्रगति के मार्ग पर ले जा रहा है। श्री ओमप्रकाश जी बंसल एवं श्री कृष्णमुरारी जी का विशेष सहयोग उन्हें साधुवाद का पात्र बनाता है।

कृष्ण ब्रह्मरतन विद्या मंदिर की बागडोर एक प्रखर विद्वान, एक शिक्षाविद, मृदुभाषी एवं सरल स्वभाव के स्वामी आचार्य श्री शिशुपाल सिंह जी के हाथों में है। आदरणीय आचार्य जी का शिक्षा के क्षेत्र में विशेष योगदान रहा है। विद्याभारती के वृंदावन स्थित वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय के प्राचार्य रह चुके हैं जिनके प्रेरणामय उद्बोधनों से, अनुशासन से एवं आशीर्वाद से अनेकों शिष्य विभिन्न सेवाओं में समाज की सेवाएं दे रहे हैं। आचार्य जी की विशेष रूचि छात्रों में पाठ्यक्रम के प्रति रूचि जगाना है तो वहीं संस्कारों के माध्यम से उनके जीवन में नैतिकता का भाव उत्पन्न हो, ये भी उनका उद्देश्य है जिससे ये समाज एक उत्तम समाज के रूप में वैश्विक स्तर पर परिभाषित हो।

मात्र १५ बच्चों के साथ आरंभ हुए इस विद्यालय में आज ३०० से अधिक विद्यार्थी अध्ययनरत हैं, जिसमें स्वाबलंबन के भाव को जागृत रखने हेतु न्यूनतम शुल्क में अधिकतम सुविधाओं का आधारभूत शैक्षणिक प्रतिकृति खड़ा करना ही इस विद्यालय का उद्देश्य है। कृष्ण ब्रह्मरतन को २०१९ में बेसिक शिक्षा परिषद से कक्षा ५ तक मान्यता प्राप्त है। “आत्म निर्भर भारत” योजना के अंतर्गत बच्चों में कौशल विकास के माध्यम से स्वाबलंबी बनाने एवं तकनीकी शिक्षा देने हेतु भारतीय संस्कृति एवं नैतिक शिक्षा पर आधारित संस्कारों से परिपूर्ण वातावरण में अप्रैल २०२१ से बालिकाओं हेतु कक्षा ६ को भी आरंभ किया गया है।

शिक्षा की गुणवत्ता विद्यालयों के ढाँचे और आधारभूत संरचनाएँ तय नहीं करतीं। गुणवत्ता तय होती है सेवा भाव से, शिक्षकों की संवाद स्थापित करने की पद्धति से जिसके ऊपर आदरणीय आचार्य जी सदैव क्रियान्वित रहते हैं।

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आध्यात्मिक एवं शांत वातावरण के साथ नैतिक व्यक्तित्व निर्माण का केंद्रबिंदु बन चुका ब्रह्मरतन विद्या मंदिर, आज क्षेत्र के निम्न आयुवर्ग के अभिभावकों के लिए एक उम्मीद की किरण है। सरकारी विद्यालयों में शैक्षिक वातावरण का सर्वथा अभाव एवं गैर-सरकारी विद्यालयों में अत्यधिक शुल्क ऐसे बच्चों को शिक्षा से कहीं वंचित न रख दें, इसी विमर्श की प्रतिकृति है कृष्ण ब्रह्मरतन विद्या मंदिर।

शिक्षा के ऐसे मंदिरों के निर्माण मानव जाति के कल्याणकारी प्रकल्प हैं। समाज निर्माण में ऐसे प्रकल्पों का अतुल्य योगदान ही भारतीय समाज को वैश्विक दृष्टि से सामाजिक समरसता का आधारबिंदु बनाता है।

स्वाबलंबन से स्वाभिमान की अनंत यात्रा का पर्याय: संविद एक्सपर्ट स्कूल

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समाज की जिस आधारभूत संरचना में हम रहते हैं, उसके सबसे निचले पायदान पर जो वर्ग आता है, उसे महिला कहते हैं। कहने को सामाजिक उत्थान किसी भी वर्ग का नहीं हो सकता, यदि महिलाओं की सहभागिता और साझेदारी न हो। ये एक विस्मयकारी सत्य है कि विश्व को नारी सम्मान का सूत्र हम भारतवासियों ने दिया है तो महिलाओं के विरुद्ध आपराधिक प्रकरण भी हमारे समाज के बीच ही होते हैं। दहेज़ के लिए प्रताड़ना हो अथवा उन्हें घर से निकालना, संख्या ऐसे कुकृत्यों की बढ़ रही है जो एक सभ्य समाज के रूप में चिंतनीय और गंभीर विषय है।

महिलाओं के सामाजिक उत्थान की योजनाओं के साथ बातें बहुत होती हैं। समाज इस विषय पर निःसंदेह चिंतित भी है और अपने सामर्थ्य के अनुसार उपाय भी कर रहा है। महिला उत्थान एक विषय है लेकिन उन्हें स्वाभिमानी बनाना, उनके अर्थ तंत्र को सुदृढ़ करना और उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना ही सही अर्थों में महिला सशक्तिकरण है, जिसके अर्थ को कुछ लोगों ने गलत संदर्भ में ही प्रस्तुत किया है।

महिलाओं के इस आर्थिक रूप से वंचित वर्ग में एक वर्ग ऐसा भी है, जो परित्यक्त है। उन्हें अकेले छोड़ दिया गया है। जीवन को सही अर्थों में देखने की दृष्टि उन माताओं बहनों के पास नहीं है। किन्हीं नारी निकेतनों, वृद्धाश्रमों आदि में खुद को समेटती इन महिलाओं की, इनके स्वाभिमान की, आदर की, सम्मान की चिंता एक सभ्य समाज होने के नाते हमें ही करनी होगी। कुछ सनातनी संत ऐसे परित्यक्त माताओं को सदा से आश्रय दे रहे हैं, सम्मानपूर्वक। उनके स्त्रीत्व की, शील की, उनकी मुस्कान और स्वाबलंबन की रक्षा अपने वात्सल्य रूपी चादर के आवरण से हमेशा हुई है, चाहे अहिल्या के उद्धारक प्रभु श्रीराम हों, अथवा माता सीता का आतिथ्य करते महर्षि वाल्मिकी।

दिव्यांग बच्चों द्वारा बनाए गए दीये

वात्सल्यग्राम में परमपूज्य दीदी माँ साध्वी ऋतंभरा ने भी इसी आतिथ्य की सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दिया है। परम पूज्य दीदी माँ जी की पहचान एक भगवाधारिणी साध्वी की है तो उनके विराट व्यक्तित्व का एक छुपा हुआ पहलु है वात्सल्य। अनगिनत बच्चों को, महिलाओं को, एक ऐसे बंधन में बांधने की परिकल्पना को उन्होंने वात्सल्यग्राम नामक मूर्तरूप से साकार किया है। इन महिलाओं को वात्सल्यग्राम में आवास, पोषण एवं स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं की प्राप्ति ही नहीं होती, अपितु उनके रिक्त जीवन में संबंधों के पुष्पों द्वारा पल्लव खिलाए जाते हैं। एक महिला वात्सल्य की धूनी अपने ह्रदय में जला लेती है जिसकी सुगंध से उस बच्चे का भी जीवन संवर जाता है जिसका कोई नहीं। वैसे भी दीदी माँ जी कहती हैं –

“विश्वनाथ के इस विश्व में कोई अनाथ कैसे हो सकता है?”

इन बच्चों को जहाँ पोषण के लिए गौमाता के दूध से लेकर एक केंद्रीय शिक्षा बोर्ड द्वारा संचालित विद्यालय तक की सुविधा उपलब्ध है जहाँ मुफ्त शिक्षा, वस्त्र, स्वास्थ, स्टेशनरी, आवास, भोजन जैसी बुनियादी सुविधाएं प्राप्त होती हैं। विद्यालय में उन्हें रोबोटिक्स, थ्री डी प्रिंटिंग, एनसीसी, घुड़सवारी, टेनिस कोर्ट, संगीत एवं नाट्य अकादमी, अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रमों के माध्यम से अमेरिकी स्कूलों का एक्सपोजर मिलता है जिससे वो किसी भी प्रतियोगिता में खुद को किसी भी अन्य बच्चे से कमतर समझें।

दिव्यांग बच्चों द्वारा बनाए गए दीये

वहीं इन माताओं बहनों को मिलता है सामाजिक सुरक्षा का अधिकार, करुणामयी दीदी माँ का सान्निध्य, प्राकृतिक निकटता एवं इन सबसे बढ़कर, स्वाबलंबन से स्वाभिमान की यात्रा जिसे संविद एक्सपर्ट स्कूल कहा जाता है।

संविद एक्सपर्ट स्कूल एक प्रयास है, महिलाओं को स्वाबलंबी बनाने का, उनके आर्थिक पक्ष को सुदृढ़ करने का, उनकी क्रियात्मक रचनात्मकता को उनके मजबूत भविष्य की नींव के लिए सुदृढ़ करने का। संविद एक्सपर्ट स्कूल में कढ़ाई, बुनाई, सिलाई, सॉफ्ट टॉयज, दीये, अगरबत्ती, पापड़, बड़ी आदि बनाने का प्रशिक्षण मिलता है। इसके साथ साथ यहाँ चूड़ी, कड़े, मेकअप का सामान, ब्यूटी पार्लर ट्रेनिंग जैसे रोजगारपरक कोर्स पढ़ाए जाते हैं।

संविद एक्सपर्ट स्कूल में महिलाओं के साथ विशिष्ट बच्चों का भी प्रशिक्षण होता है जिसमें वे दीये, अगरबत्ती, सॉफ्ट टॉयज बनाने का प्रशिक्षण लेते हैं। इन बच्चों में ऑटिज्म, सेरिब्रल पाल्सी, डाउन सिंड्रोम जैसी समस्याएँ होती हैं, जिन्हें उपयुक्त आवासीय सुविधाओं एवं प्रशिक्षित ट्रेनर्स द्वारा चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराई जाती है।

एक समाज के सभ्य होने के लिए आवश्यक है कि ऐसे प्रयोगों, प्रकल्पों एवं परियोजनाओं का सहयोग किया जाए। संवाद स्थापित कर इनके मार्गदर्शन से लेकर सहयोग तक, हर प्रकार की मदद की जाए। संविद एक्सपर्ट स्कूल की इन महिलाओं के सामर्थ्य को सम्मानित करें। इन्हें इनकी जिजीविषा, उत्कट एवं स्वाबलंबन के लिए हाथ बढ़ाया जाए, मिलाया जाए, आगे बढ़ाया जाए, ताकि भारतीय समाज का सही अर्थों में मानी बदल जाए, वही जो दीदी माँ कहती हैं –

“विश्वनाथ के इस विश्व में कोई अनाथ कैसे हो सकता है।”

संविद गुरुकुलम में मनाया गया राधाष्टमी महोत्सव

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राधा- जिनके नाम से आज भी बृज क्षेत्र में लोग एक दूसरे को संबोधित करते हों, जिनका नाम कृष्ण से पहले लिया जाता हो, जिनकी कृपा को हज़ारों अधरों से प्रार्थना के स्वर प्रतिपल फूटते हों, जो बृज की रज में, कण में, आदि से विस्तारित हो अंत तक हों, जिनकी अनुकंपा से श्याम विश्व के इकलौते सम्पूर्ण ईश कहाते हों, जिनकी निष्ठा और प्रेम से प्रेम को अमरत्व मिलता हो, आज उन्हीं लाड़ली जी राधिकारानी का जन्मोत्सव हर्षोल्लास के साथ मनाया गया।

राधा एक नाम, एक पहचान से इतर एक भाव है जो श्याम में प्राण बनकर रहती हैं। श्यामा अपने श्याम को देखे बिना अपने नयन नहीं खोलतीं, वहीं श्याम भी अपनी सखी राधिकारानी के बिना चैन नहीं पाते। कृष्ण के जीवन को उठाकर ध्यान से देखा जाये तो कृष्ण के जीवन में आनंद और उल्लास तभी तक रहा, जब तक राधारानी का प्रत्यक्ष रूपेण वास उनके जीवन में रहा। कृष्ण भगवान थे, उसके बाद भी, राधारानी के प्रत्यक्ष से नेपथ्य में स्थानांतरित होने की दशा का प्रभाव कान्हा के नक्षत्रों पर जीवनपर्यन्त रहा।

उनके जीवन में महाभारत जैसा विध्वंस आया तो स्यमंतक मणि की चोरी का आरोप भी उस ब्रह्मांडनायक के मस्तक पर रहा जिसके अधिकारक्षेत्र में ये समूचा विश्व, जीव, प्रकृति, वनस्पति, ब्रह्मांड है। जो राजाधिराज महाराज हैं, जिनकी भुजाओं में सृजन और विनाश साथ झूलते हैं। जो बीज से ब्रह्मांड की आनंदमयी यात्रा का अनुभव हैं, उन कन्हैया को भी लाड़लीजी की शरण में शीश नवाना पड़ा। ये महिमा, ये भूमिका, ये प्रतिष्ठा हमारी प्यारी लाड़ली जी की बृज और समूचे भारत में है।

आज भी भारत में, भजन, कन्हैया से अधिक प्रेम की अधिष्ठात्री देवी राधिका के ही लिखे, सुने और गुनगुनाये जाते हैं। बोलै जाता होगा जय श्री कृष्ण गुजरात और द्वारिका में, बृज चौरासी कोस की ब्रह्मांडीय यात्रा में तो राधे-राधे ही संबोधन का एकमात्र प्रक्रिया है।

वृन्दावन के वात्सल्यग्राम स्थित संविद गुरुकुलम विद्यालय में आज राधिकारानी का जन्मोत्सव हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। छात्रों ने अपनी प्रतिभानुसार जहाँ राधा-कृष्ण के चित्र बनाये वहीं नाट्य कार्यक्रमों के माध्यम से आनंद बरसाया गया। इस आनंदोत्सव में जहाँ सांस्कृतिक कार्यक्रमों द्वारा छात्रों को अपनी सनातन संस्कृति की हर्षोल्लास के साथ तीज त्यौहार मनाने की प्रथा बताई गई वहीं छात्रों का अप्रतिम उल्लास देख कार्यक्रम में शामिल हुए अतिथि भी वाह कह उठे। कार्यक्रम के समापन पर प्राचार्या द्वारा छात्रों को इस कार्यक्रम का महत्व, मनाने के उद्देश्यों के साथ अन्य महत्वपूर्ण जानकारियाँ दीं।

हिंदी दिवस की अशेष शुभकामनाएँ

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हिंदी सिर्फ एक भाषा ही नहीं है, हिंदी एक प्रतीक है, हिंदी एक पहचान है, हिंदी एक सूचक है, हिंदी हिंद का अभिमान है, हिंदी जुड़ाव है मिट्टी से, अपनों से, अपने आप से!!

हिंदी माँ है, माँ जो मुझे समझती है, मैं जैसा हूँ, वैसे। बच्चा तोतला हो तो भी, माँ से बेहतर कौन समझता है? खड़ी बोली के अनेकों भेद अपने आप में समेटे है हिंदी। दिल्ली वाली हिंदी का मथुरा वाली हिंदी से और जयपुर वाली हिंदी का उज्जैन वाली हिंदी से भेद तो है लेकिन उन बहनों जैसा जिनमें प्रेम बहुत है। इंग्लिश, स्‍पेनिश और मंदारिन के बाद दुनिया में चौथी सबसे ज्‍यादा बोली जाने वाली भाषा हिंदी है। यहां तक कि कई अंग्रेजी शब्दों की उत्पत्ति भी हिंदी के शब्दों से ही हुई है। 

विविधता में एकता का अर्थ है हिंदी हो जाना। सह अस्तित्व सही अर्थों में हमें हिंदी से ही सीखने को मिलता है जब हम देखते हैं कि “नई वाली हिंदी”‘ के नाम पर समाचार पत्रों तक में अंग्रेजी और उर्दू का धड़ल्ले से दुरुप्रयोग हो रहा है लेकिन चल रहा है।

हिंदी आत्मा है विचारों की। इसमें कोई दुराव नहीं है कैपिटल और स्मॉल लेटर जैसा। इसमें ‘आप, तुम और तू’ में अंतर है। भावना के व्यक्त करने का सबसे सुदृढ़ साधन है हिंदी।

हिंदी दिवस की शुभकामनाएं।। हिंदी को पुनः वही वैभव प्रदान हो, जिसकी ये भाषा अधिकारिणी है।

वैसे भी, एक भारतीय जब अपनी पहचान बताता है तो गर्व से तीन शब्द ही उच्चारित होते हैं- हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान!!

मीरा माधव का द्वार: वात्सल्यग्राम का अलौकिक संसार

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विवाह – एक परिणय सूत्र में बंधे सिर्फ दो व्यक्तियों के एक साथ जीवनयापन करने की सामाजिक व्यवस्था का ही नाम नहीं है, ये नाम है दो कुलों के एक होने का। पाणिग्रहण संस्कार से पावन क्या है जिसमें एक युवती अपने पिता के घर से ब्याह कर अपने घर प्रस्थान कर जाती है, एक नए घर को अपनी उपस्थिति से सजाने, सँवारने, अपने संस्कारों की पावन महक बिखेरने। सनातन में इस संस्कार को बहुत प्रमुखता से निभाने की प्रथा है क्यूंकि विचारों के न मिलने पर भी यहाँ संबंध विच्छेद नहीं होते, शायद इसीलिए डिवॉर्स शब्द का हिंदी शब्दमाला में कोई शाब्दिक अर्थ नहीं मिलेगा आपको।

विवाह तय होने के बाद सबसे जरुरी होता है विवाह स्थल का चयन। विवाह स्थल की शुचिता, स्वछता, आसपास का माहौल भी ध्यान में रखा जाता है क्यूंकि एक पावन कार्य के शुभारंभ पर काफी कुछ टिका होता है।

मीरा भी माधव से विवाह करना चाहती थीं। बचपन में ही माधव को अपने पति के रूप में स्वीकार चुकी थीं। अपने सच्चरित्र एवं शुचितामय जीवन के तप के प्रभाव राणा के विष मीरा पर कोई प्रभाव न पड़ा था। धर्म के अन्यत्र उनका समाज में अप्रतिम योगदान है। उनके भजनों ने सनातन को जनमानस के अंतस में चिरायु रखा। आक्रांताओं के जबरन धर्मांतरण के बाद भी लोग सनातन यदि नहीं छोड़ना चाहते थे तो उसके मूल में भक्तिकाल के संतों का बहुत बड़ा योगदान है।

मीरा सशरीर माधव के विग्रह में जा मिली थीं। मीरा और माधव आज भी एक हैं। एक है उनका निलयम, जिसमें मीरा के भजन सुन माधव आनंदित होते हैं। निलयम एक तमिल शब्द है, जिसका अर्थ है घर। संस्कृत के बाद, विश्व की सबसे पुरानी और शाश्वत भाषा है तमिल। उस निलयम में मीरा हैं, जहाँ माधव सुनते हैं, मीरा गाती हैं। माधव रूठते हैं, तो मीरा मनाती हैं, माधव कहते जाते हैं तो मीरा सुनती जाती हैं। कदाचित माधव उनसे अपने प्रेम के देहहीन रूप की प्रासंगिकता को स्थापित करने के उद्देश्य के लिए किये प्रयत्नों की चर्चा करते हों, या मीरा उनके मोरपंख को माथे पर सजाने की कथा का वर्णन पूछती हों। मीरा और माधव यूँ ही पहरों बैठे उस भाव को जीते हों, जिसके लिए द्वारिकाधीश योगेश्वर कृष्ण को कान्हा और कन्हैया बनना पड़ता हो।

रुक्मणी और राधा के प्रेम के इतर, मीरा का माधव के लिए प्रेम अलग था। जहाँ रुक्मणी को परमयोद्धा, ब्रह्माण्डनायक योगिराज द्वारिकाधीश की प्राप्ति हुई, तो राधा को उनके नटखट धेनु चराते बांसुरीवादक कृष्ण की। ये ग्वाला कहीं भी माखन मिश्री के लिए मटक देता है तो वो ईश्वर सबको अपनी उँगलियों पर नचाता है। इन दोनों ही ठकुरानियों को पूरे कृष्ण नहीं मिले। रुक्मणी हमेशा उनके बालरूप के दर्शनों के लिए तरस गईं तो राधारानी ने उन्हें योद्धा और राजा के रूप में कभी न पाया। मीरा को ये दोनों रूप मिले, उन्हें सशरीर श्रीकृष्ण ने मोक्ष प्रदान किया।

परमधाम वृन्दावन के सेवाप्रकल्प वात्सल्यग्राम में मीरा माधव के इसी रूप की परिकल्पना की गई है। इस मंदिर में नाम से एक आध्यात्मिक रिसॉर्ट भी बनाया गया है जिसके केंद्र में है ये मीरा माधव का धाम। इस रिसॉर्ट का नाम है, मीरा माधव निलयम।

वृन्दावन के दर्शनीय स्थलों में से एक वात्सल्यग्राम में स्थिल इस विवाहस्थल में यूँ तो बहुत कुछ वांछनीय है लेकिन कुछ चीजें हैं जो इसे आम लोगों के लिए ख़ास बनती हैं। मथुरा-वृन्दावन मार्ग पर स्थित ये विवाहस्थल अपने सजावट, नैवैद्यम नामक रेस्टॉरेंट में मिलने वाले प्रसादम के लिए प्रसिद्द है लेकिन इसकी अनुपम छटा इसे अद्वितीय अप्रतिम और अलौकिक बना देती है।


यहाँ भोजन को प्रसादम कहा जाता है और यही कारण है कि नैवैद्यम में बनने वाले भोजन को पूर्णतः सात्विक और शुद्धता के उच्च मानकों पर ही बनाया जाता है। यहाँ मिलने वाले भोजन की एक और खास बात है कि ये प्याज और लहसुन मुक्त भोजन है क्यूंकि वृन्दावन और मथुरा में प्रवास करने वाले साधुजन प्याज/लहसुन का सेवन वर्जित मानते हैं, उसी ऋषि परंपरा को दृष्टिगोचर करते हुए यहाँ प्याज/लहसुन पूर्णतः वर्जित है। कमरे बड़े और हवादार हैं। कमरों में वातानुकूलित यंत्र की भी समुचित व्यवस्था है। स्वछता इस स्थल की प्राथमिकताओं में है और थका देने वाले उत्सव के बाद आरामदायक शांति और सुरक्षा इस स्थल की विशेषता है।

आपकी आवश्यकताओं के अनुसार यहाँ बड़ा और विशाल बैंक्वेट हॉल है तो बाहर विशाल लॉन भी, जिसमे विवाह जैसे महापर्व की तैयारी कर विवाह को आनंदोत्सव में परिवर्तित कर दिया जाता है। बैंक्वेट हॉल में एक साथ 200 से अधिक लोगों के बैठने की व्यवस्था है। चौंसठ कमरे भी चार तलों पर उपयुक्त रूप से उपस्थित हैं।

सोचिये जिस जगह विवाह जैसे कार्यक्रम हो, वहां पहले से मीरा माधव का मंदिर हो, साथ में उसी स्थल पर माँ सर्वमंगला का मंदिर बन रहा हो जिसमें तीन गुणों, सत रज और तम की अवधारणा के साथ मंदिर निर्माण हो रहा हो, जहाँ प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक प्रकाश से जीवन आनंद से परिपूर्ण हो रहा हो, उससे अच्छा विकल्प कहीं और कैसे हो सकता है?

अगर आप डेस्टिनेशन वेडिंग का विचार कर रहे हैं तो मीरा माधव निलयम से उपयुक्त विकल्प आपको नहीं मिलेगा, आइये और अपने सपनों को पर लगते देखिये मीरा माधव के इस परमधाम में।

संविद गुरुकुलम में मनाया गया गणेशोत्सव

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पर्व और उत्सव हमारे महान देश की अनूठी प्रस्थापना हैं। उत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठानों और रीति-रिवाजों के प्रदर्शन तक ही सीमित नहीं होते हैं। उत्सव लोगों को अपने रिश्तों को नए आयामों में जोड़ने, संवाद करने और समन्वय करने में मदद करते हैं, नीरस दिनचर्या को तोड़ते हैं, जीवन में प्रसन्नता भरते हैं और हमारे जीवन में जीवंत रंग और खुशियाँ लाते हैं।

इन सभी पर्व-उत्सवों में से, गणेश चतुर्थी सबसे मनाया जाने वाला महापर्व है। इस दिन भगवान गणेश का जन्मदिन होता है। इस त्योहार को विनायक चतुर्थी या गणेशोत्सव के नाम से भी जाना जाता है।

इस महापर्व के उपलक्ष्य में, समविद गुरुकुलम के विद्यार्थियों ने भी इस पर्व को बड़ी धूमधाम से मनाया। कार्यक्रम की शुरुआत स्कूल परिसर में गणेश प्रतिमा की स्थापना के साथ हुई। छात्रों और शिक्षकों द्वारा गणेश का स्वागत किया गया, उसके बाद आरती के साथ रंगारंग कार्यक्रमों के माध्यम से छात्रों ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।

गणेश को बुद्धि का देवता माना जाता है। वह हमें एकाग्र रहने और नियमित अध्ययन पर बेहतर ध्यान केंद्रित करने का आशीर्वाद देते हैं। सुख देने वाले और दुखों को हरने वाले देव हैं गणेश। अपने साथ रिद्धि और सिद्धि का आशीर्वाद देते हैं। प्रथम पूज्य गणेश जगतपालक हैं तो वही सम्पूर्ण जगत भी हैं। माता पिता के आशीष में, जगत में पूज्यनीय बना देने की क्षमता है। गणेशजी इस तथ्य को चरितार्थ करते हैं। सामाजिक दृष्टिकोण में माता पिता की अनिवार्यता के साथ, उनकी संतुष्टि की अनिवार्यता को बल देने वाले देव हैं गणेश। जिनकी उपस्थिति मात्र किसी भी कार्य के निर्विघ्न संपन्न होने की निश्चितता कर दे, वो देव हैं गणेश। संकट हरते, सुख करते, दर्शन मात्र से मनकामना की पूर्ति करते हैं गणेश।

सांस्कृतिक कार्यक्रम

सनातनी राष्ट्रवाद का परम एवं चरम बिंदु है गणेशोत्सव। भारतीय सनातनी समाज को विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा देने के विचार के साथ बालगंगाधर तिलक ने इसकी शुरुआत की थी, देखते ही देखते ये सम्पूर्ण महाराष्ट्र और भारत में मनाया जाने लगा।

पूजन

संविद गुरुकुलम के छात्र हमेशा ऐसे आयोजनों में बहुत रुचि लेते हैं। इस तरह के आयोजनों का मकसद अपनी महान संस्कृति से जुड़े रहना और इस दुनिया को रहने के लिए एक बेहतर जगह बनाना है। छात्रों में इस प्रकार के आयोजन उनकी संस्कृति से जुड़ाव के लिए बहुत आवश्यक हैं।

गीत गायन

कार्यक्रम में बच्चों ने गणेश वंदन के साथ उनके गीतों पर सांस्कृतिक प्रस्तुतिकरण के साथ अपने विचार भी व्यक्त किये। साथ में प्राचार्या श्रीमती आस्था जी ने भी अपने विचारों से छात्रों को अवगत कराया।

आप सभी को गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएं!!

संस्कारम – आज की अनिवार्यता, कल का आनंद

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एक देश के रूप में भारत एक विश्व शक्ति बन चुका है और आर्थिक पैमाने पर बढ़ता सकल घरेलु उत्पाद भी इस बात की ओर इंगित करता है कि आने वाली सदी, एक देश के रूप में, भारत की ही होगी। आर्थिक एवं व्यावसायिक स्तर पर देश की प्रगति, खुशहाल समाज की ओर हमारे कदमों को मजबूत करती है लेकिन एक समाज के रूप में भी, क्या हम उतने ही सुदृढ़ हो पा रहे हैं?

कोरोना काल में लोगों का अपने माँ बाप को अकेले छोड़ देना, हुतात्माओं को अंतिम संस्कार के लिए प्रियजनों का न होना, लगातार बढ़ते आपराधिक प्रसंग, सामाजिक असुरक्षा के शिकार बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे, हमारे संवेदनहीन समाज का कुरूप चेहरा दिखाते हैं। हमें ये बताते हैं कि आर्थिक सफलता, यशस्विता और प्रसिद्धि ही सब कुछ नहीं है। संस्कारों की पौध का अगली पीढ़ी में रोपण भी उतना ही अनिवार्य है जितना आर्थिक एवं व्यावसायिक उन्नत होना।

पिछले दिनों एक पुत्र ने अपनी माँ का अंतिम संस्कार ये कहकर नहीं क्या कि उसने(पुत्र ने) धर्म परिवर्तन कर लिया है और माँ को धर्मान्तरित व्यक्ति के धर्मानुरूप अंत्येष्टि क्रिया में सम्मिलित किया जाये। विवाद बढ़ने की स्थिति में महिला की पौत्री हजार किलोमीटर का सफर तय कर आई और अंत्येष्टि की गई। एक अन्य प्रसंग में एक महिला की कुछ महीने पुरानी लाश का संस्कार पड़ोसियों ने किया क्यूंकि पुत्र अमरीका में नौकरी करता था। महिला अकेले रहती थी।

ये एक नई समस्या है जो हमारे समाज के सम्मुख मुँह बाए कड़ी है। इन समस्याओं का यदि कोई शाश्वत समाधान है तो वो है बच्चों को संस्कारों के उचित मार्ग पर लाना, उन्हें संवेदनशील बनाना अपने रिश्तों के प्रति, अपने मित्रों के प्रति, अपनी जलवायु, प्रकृति, पशुपक्षियों के प्रति, उन्हें उन्नत किया जाये संस्कारों की निधि से, उनके हाथ चलें तो संवेदनाओं की महक उठे, उनका हर क्रियाकलाप ये देख कर हो कि उसका निकटवर्ती ही नहीं दूरगामी भी, परिणाम कहीं हमें या अन्य किसी को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित तो नहीं करेगा।

वृन्दावन नगर के वात्सल्यग्राम में परमपूज्या साध्वी दीदी माँ ऋतंभरा जी का प्रवास है जहाँ उनकी प्रज्ञा और मेधा का लाभ, संविद गुरुकुलम में अध्ययनरत बालक बालिकाओं को समय समय पर मिलता है। इन विशेष उद्देश्य से प्रायोजित कक्षाओं को संस्कारम के नाम से जाना जाता है और इन कक्षाओं का एकमात्र उद्देश्य इन भविष्य के उन्नत नागरिकों के मन में राष्ट्रप्रेम, अपनत्व, सहयोग एवं संवेदनशीलता का बीज रोपित करना है जिसके ब्रह्मांड बन जाने पर समस्त जगत उन शिक्षादीक्षाओं से गौरवान्वित हो सके।

संस्कारम की कक्षाओं में कोई कोर्स से संबंधित पाठ नहीं होता, वो तो बच्चे अपने विद्यालय में पढ़ ही लेते हैं लेकिन यहाँ उन्हें कहीं से भी प्राप्त न हो सकने वाला ज्ञान मिलता है जो उनके बालमन को अच्छी शिक्षाओं के माध्यम से प्रसन्न रहना सिखाता है, उन्हें बुजुर्गों के सम्मान और छोटों से प्रेम का जीवन में महत्व बताता है, उन्हें आने वाली चुनौतियों से अवगत कराता है, उनसे निपटने के उपाय बताता है। संस्कारम की कक्षाओं का महत्व, समाज की आधारभूत संरचना का संवर्धन करना है ताकि ये सभी बच्चे जब अपने अपने समाज में एक समझदार नागरिक बनकर रहें तो उन्हें सही और गलत की तार्किक समझ हो, वो एक नागरिक होने के अधिकारों से अधिक कर्तव्यों की चर्चा करें। एक सामाजिक इकाई के रूप में मुफ्त सुविधाओं का लाभ लेने की जगह लोगों को सहयोग करें।

संस्कारम एक प्रयोग है, जो अपने असर निश्चित रूप से आने वाले भविष्य में दिखाएगा किन्तु इसके प्रसार प्रचार के माध्यम से ऐसी अनेकों कक्षाओं की महती आवश्यकता हम सभी को है, ताकि एक सामाजिक सुरक्षा सभी को उपलब्ध हो, वृद्धाश्रमों में पलते बुजुर्गों की संख्या कम हो और सामाजिक स्तर पर हम विश्व की सबसे उन्नत श्रेणी में स्थान पा सकें।

असुविधाजनक सत्य के साहित्यकार दुष्यंत कुमार: वात्सल्यपूर्ण नमन

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हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गांव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

ये अश’आर हिंदी के सबसे बड़े गजल बुनकर, दुष्यंत कुमार के हैं। दुष्यंत कुमार होना एक परिकल्पना के यथार्थवादी अस्तित्व को पा लेना है। दुष्यंत कुमार की प्रासंगिकता अपने समय से अधिक आज है। उनकी गजलें, उनके गीत नौजवानों को प्रश्न पूछने और जागरूक बनने के हिमायती रहे। दुष्यंत का पहला कविता संग्रह जिस दौर में आया, उस दौर में शब्दों बाजीगरी के बड़े नाम मौजूद थे। हिंदी में अज्ञेय मुक्तिबोध की कविताओं के सूर्य थे तो धूमिल और बाबा नागार्जुन जैसे बड़े नाम समाज को जागरूक करते थे। भोपाली शायरों की गजलें अपने शिखर पर थीं।

दुष्यंत ने उस समय में अपनी एक नई साहित्यिक विधा उत्पन्न की, जिसने गजल कहने के अंदाज़ बदलकर रख दिए। दुष्यंत कुमार त्यागी अब सीधी, स्पष्ट और दो टूक कविताओं के लिए जाने लगे थे। अज्ञेय जैसे विद्वान को समझना मुश्किल था, कविताओं और गजलों को समझ आने लायक बनाने का शौर्य दुष्यंत कुमार के नाम पर है।

निदा फाज़ली (Nida Fazli), दुष्यंत कुमार के बारे में लिखते हैं, “दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है. यह ग़ुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के ख़िलाफ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है।”

दुष्यंत कुमार को उनकी ऊंचाई के स्तर से देखें तो वो गजल या कविता मात्र कहने वाले शायर या कवी नहीं हैं, वो आम आदमी के गुस्से का इजहार हैं, संवेदनहीन सत्ताओं से टकराने का हौसला हैं, जुनून का इंसानी रूप हैं, वो दुष्यंत कुमार हैं। इसकी बानगी यहाँ देखिये –

“मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूं,हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है”

दुष्यंत कुमार समाज के प्रतिनिधि के तौर पर एक आम आदमी को देखते हैं। वस्तुतः कोई राजनेता या अधिकारी इस लायक कभी हुआ ही न हो –

“वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है”

सरकारी नौकरी करते हुए सरकारी तंत्र की आलोचना, वो भी इतनी कठोर? सरकारें ये कहाँ बर्दाश्त कर पाती हैं? उनके ऊपर होनी थी सो कार्यवाही हुई, लेकिन उनकी कलम की स्याही न सूखी। शासन की ढुलमुल रवैये पर उन्होंने लिखा था –

“कहां तो तय था चिराग हरेक घर के लिए,

कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।

यहां दरख्तों के साये में धूप लगती है,

चलो यहां से और उम्र भर के लिए।

वे मुतमइन है कि पत्थर पिघल नहीं सकता,

मैं बेकरार हूं आवाज के असर के लिए।”

सत्य कहने की असुविधा से उत्पन्न होने वाले खतरे सभी को झूट बोलने को प्रेरित करते हैं। अनेकों संकटों से भी विचलित न होने वाले इस महाकवि ने कुछ यूँ खुद को बयां किया – “इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियाँ”ओजस्विता और जनमानस के कवि दुष्यंत कुमार जी की आज पुण्यतिथि है, आपको वात्सल्यपूर्ण नमन।