मीरा के माधव का द्वार – वृन्दावन में है ये अलौकिक संसार

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विवाह मनुष्य जाति के महत्वपूर्ण संस्कारों में से एक माना जाता है। भारतीय समाज में ये दो व्यक्तियों का ही नहीं अपितु दो परिवारों का बंधन माना जाता है जिसके अटूट होने का अर्थ है कि चाहे जितने भी मतभेद हों, विवाहित साथ में रहकर अपने विवाद सुलझा ही लेते हैं क्यूंकि हमारे समाज में संबंध विच्छेद जैसी कोई चीज नहीं। संबंधों को आत्मा के साथ बांध एक जिम्मेदारी होती है जिसमें एक दूसरे के साथ सबकुछ बांटा जाता है, भावनाओं के साथ।

विवाह करने से पहले विवाह स्थल की खोज बहुत जरुरी हो जाती है। गंतव्य स्थल तक सुगम पहुंच और उस स्थल का माहौल यदि शुद्ध और सात्विक हो तो वाह वाली फीलिंग बहुत आम हो जाती है। आज हम आपको एक ऐसे ही गंतव्य के बारे में बता रहे हैं जिसमें आपको मिलता है एक खास एहसास, मिटटी की सौंधी खुशबु और स्वादिष्ट व्यंजनों के साथ।

मीरा माधव निलयम – माधव का घर

मीरा माधव निलयम वृन्दावन की पावन रज में स्थित वात्सल्यग्राम में स्थित है। वृन्दावन के दर्शनीय स्थलों में से एक वात्सल्यग्राम में स्थिल इस विवाहस्थल में यूँ तो बहुत कुछ वांछनीय है लेकिन कुछ चीजें हैं जो इसे आम लोगों के लिए ख़ास बनती हैं। मथुरा-वृन्दावन मार्ग पर स्थित ये विवाहस्थल अपने सजावट, नैवैद्यम नामक रेस्टॉरेंट में मिलने वाले प्रसादम के लिए प्रसिद्द है लेकिन इसकी अनुपम छटा इसे अद्वितीय अप्रतिम और अलौकिक बना देती है।

यूँ तो आपने मीरा बाई के माधव के लिए दैविक प्रेम के बारे में जरूर पढ़ा सुना होगा लेकिन उनका माधव के साथ मंदिर बहुत जगह नहीं है, ये स्थल बनाया ही मीरा और माधव के नाम पर है जिसके साथ तमिल शब्द ‘निलयम’ जुड़ा है जिसका अर्थ है ‘घर’ अर्थात वह घर जहाँ मीरा और माधव रहते हैं, वियोग में नहीं किन्तु माधव के साथ उनके सामने मीरा भजन जाती हैं। सुनना हो तो एक बार यहाँ घूम कर जरूर आइये।

Meera aur Madhav

नैवैद्यम – सात्विक और स्वादिष्ट भोजन

यहाँ भोजन को प्रसादम कहा जाता है और यही कारण है कि नैवैद्यम में बनने वाले भोजन को पूर्णतः सात्विक और शुद्धता के उच्च मानकों पर ही बनाया जाता है। यहाँ मिलने वाले भोजन की एक और खास बात है कि ये प्याज और लहसुन मुक्त भोजन है क्यूंकि वृन्दावन और मथुरा में प्रवास करने वाले साधुजन प्याज/लहसुन का सेवन वर्जित मानते हैं, उसी ऋषि परंपरा को दृष्टिगोचर करते हुए यहाँ प्याज/लहसुन पूर्णतः वर्जित है।

किसी भी प्रकार के मादक पदार्थ का सेवन लोगों के यहाँ रहने के अधिकार को वंचित करता है और उन्हें बाहर भी निकाला जा सकता है।

केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र जी प्रधान

विवाह मंडप


विवाह में किसी भी प्रकार के व्यवधान से बचने के लिए एक विशेष मंडप की व्यवस्था मंदिर प्रांगण के समीप ही की गयी है जिससे विवाह जैसे पवित्र कार्य निर्विघ्न संपन्न हों और एक नवजीवन की शुरुआत पावन और पवित्र हो जाये।

हवादार और बड़े कमरे, वातानुकूलित स्वच्छ वातावरण

कमरे बड़े और हवादार हैं। कमरों में वातानुकूलित यंत्र की भी समुचित व्यवस्था है। स्वछता इस स्थल की प्राथमिकताओं में है और थका देने वाले उत्सव के बाद आरामदायक शांति और सुरक्षा इस स्थल की विशेषता है।

बैंक्वेट हॉल और बाहर खुला लॉन

आपकी आवश्यकताओं के अनुसार यहाँ बड़ा और विशाल बैंक्वेट हॉल है तो बाहर विशाल लॉन भी, जिसमे विवाह जैसे महापर्व की तैयारी कर विवाह को आनंदोत्सव में परिवर्तित कर दिया जाता है। बैंक्वेट हॉल में एक साथ 200 से अधिक लोगों के बैठने की व्यवस्था है। चौंसठ कमरे भी चार तलों पर उपयुक्त रूप से उपस्थित हैं।

सोचिये जिस जगह विवाह जैसे कार्यक्रम हो, वहां पहले से मीरा माधव का मंदिर हो, साथ में उसी स्थल पर माँ सर्वमंगला का मंदिर बन रहा हो जिसमें तीन गुणों, सत रज और तम की अवधारणा के साथ मंदिर निर्माण हो रहा हो, जहाँ प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक प्रकाश से जीवन आनंद से परिपूर्ण हो रहा हो, उससे अच्छा विकल्प कहीं और कैसे हो सकता है?

अगर आप डेस्टिनेशन वेडिंग का विचार कर रहे हैं तो मीरा माधव निलयम से उपयुक्त विकल्प आपको नहीं मिलेगा, आइये और घूम कर देखिये। मीरा के माधव के धाम जैसी जगह है कहीं? कहीं नहीं।

भारतीय दर्शन और पर्यावरण के दर्शन कराता संविद गुरुकुलम

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भारतीय दर्शन, अध्यात्म एवं सामुदायिक परिवेश का केंद्रबिंदु पर्यावरण संरक्षण हैं। सुबह उठकर प्रातः स्मरण करने में हम माँ पृथ्वी से उसके ऊपर पैर रखने से पहले क्षमा मांगते हैं :-

समुद्रवसने देवि ! पर्वतस्तनमंड्ले ।

विष्णुपत्नि! नमस्तुभ्यं पाद्स्पर्श्म क्षमस्वे ॥

पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन, भारतीय जनमानस के अंतःकरण में प्रतिस्थापित है। भगवान राम ने भी त्रेता में ‘वृक्षों में जीवन’ की अवधारणा को प्रतिस्थापित करते हुए माँ सीता का पता वृक्षों, लता पत्रादि से पूछा था। इसका कारण उनके मानसिक विषाद नहीं, मानव जाति को पर्यावरणीय व्यवस्था को समझने, उसके अनुरूप कार्य करने की मनःस्थिति को बलिभूत करना था। 

योगराज श्रीकृष्ण ने भी परमधाम गमन से पूर्व, पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान किया था। हमारी संस्कृति और संकल्पनाओं के केंद्र में पवित्र पर्यावरण की परिकल्पना है। सृष्टि में पदार्थों में संतुलन बनाए रखने के लिए यजुर्वेद में एक श्लोक वॢणत है- 

ओम द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति: पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:। 

वनस्पतये: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति: सर्व शान्ति: शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि।। 

ओम शान्ति: शान्ति: शान्ति:।। 

पर्यावरण से संबंध, भारतीय दर्शन या उससे भी अधिक, जीवनशैली की आत्मा है। ठाकुर जी के भोग में तुलसी का होना नितांत आवश्यक है तो ग्रहों की शांति के लिए पीपल जैसे वृक्षों को पानी देना भी हमारे शास्त्रों की वाणी। भोलेनाथ के पूजन में बेलपत्र की महत्ता सभी को पता है। सत्यनारायण की पूजा में केले के पत्तों का उपयोग आम है। 

महत्व परम्पराओं के साथ सामंजस्य बिठाना ही नहीं है, जनमानस के अंतस में पर्यावरणीय बोध को जगाना है, वृक्षारोपण के माध्यम से लोगों को संवेदनशील बनाना भी सनातन की एक भारतीय परंपरा है, अनेकों अवसरों एवं उपलक्ष्यों पर, किसी महात्मा के जन्मदिवस पर वृक्षारोपण, हम सबने अपने आसपास देखा है। 

सिद्धार्थ को गौतम, एक वट की छाँव ने बनाया। महावीर को ज्ञान प्राप्ति भी एक पेड़ के नीचे ही हुई। अनेकों मुनियों, ऋषियों ने तत्वज्ञान की प्राप्ति, पेड़ों के नीचे की। पेड़ों में जीवन, सनातन में शुरू से वर्णित है। कितनी गहनतम जानकारी और ज्ञान रहा होगा जब हमारे ऋषियों ने प्रत्येक वृक्ष का गहराई से विश्लेषण करके यह जाना की पीपल और वट वृक्ष सभी वृक्षों में कुछ खास और अलग है। इनके धरती पर होने से ही धरती के पर्यावरण की रक्षा होती है। यही सब जानकर ही उन्होंने उक्त वृक्षों के संवरक्षण और इससे मनुष्य के द्वारा लाभ प्राप्ति के हेतु कुछ विधान बनाए गए उन्ही में से दो है पूजा और परिक्रमा।

हिंदू धर्म में जब भी कोई मांगलिक कार्य होते हैं तो घर या पूजा स्थल के द्वार व दीवारों पर आम के पत्तों की लड़ लगाकर मांगलिक उत्सव के माहौल को धार्मिक और वातावरण को शुद्ध किया जाता है। अक्सर धार्मिक पांडाल और मंडपों में सजावट के लिए आम के पत्तों का इस्तेमाल किया जाता है।

इसी सांस्कृतिक विरासत की अनेकों रूपों में विश्लेषणात्मक व्याख्या कर उचितार्थ भाव अपने नौनिहालों में बहाते विद्यालय, संविद गुरुकुलम में भी आज माँ प्रकृति की विशेष पूजा, वृक्षारोपण के माध्यम से की गई। इस अवसर पर परमपूज्य दीदी माँ ऋतंभरा जी उपस्थित रहीं, जिनके द्वारा उपस्थित छात्राओं के कोमल मन में पर्यावरण के प्रति लगाव की लौ प्रज्वलित की गई।  

पर्यावरण क्षरण रोकने हेतु आवश्यक है कि हम अपने नौनिहालों  को,बच्चों को वृक्षारोपण  लिए प्रेरित करें, उनके जन्मदिवस पर एक पौधा रोपित कराएं। जैसे जैसे  पौधा बढ़ता जायेगा, बच्चे के अंदर मानवीय गुणों का प्रादुर्भाव होगा। अस्तु, कहीं दूर होने के अवसर पर बालमन में उद्विग्नता का भाव होगा, यही प्रेम का अंकुर उसके मन में असंख्य जीवों, पशुओं, मानवों के प्रति अन्याय से उसे असहज ही नहीं करेगा, अपितु, उसके द्वारा उन क्रियाओं का संपादन भी होगा, जिनसे इन जीवों, पशुओं, वनचरों, मानवों की उन्नति का मार्ग प्रशस्त होगा। मानव का प्रकृति के साथ तारतम्य बैठेगा। वैचारिक रूपेण समाज की अनेकों अवधारणाओं को पर्यावरणीय संरक्षा मिलेगी। 

सामाजिक विकास में वृक्षों का सम्मान बढ़ेगा, जिसके वो अधिकारी हैं, कटान से मृदा अपरदन जैसे अनेकों विषयों पर सामाजिक नैतिक बोध होगा, जिससे किसी महामारी के समय अथवा जैविक युद्ध के समय हम डट सकें, लड़ सकें और जीत सकें। प्राणवायु की कमी से प्राणों की क्षति न हो। आइये प्रण लें – वृक्षारोपण का, उसके नैतिक मूल्यों का बच्चों के मन में भाव भरें – संविद गुरुकुलम के साथ, जिसमें साथ हो दीदी माँ का आशीर्वाद।  

रुई से हल्की नौनिहालों की नन्ही दुनिया

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पक्षी जब जलस्त्रोत से जल ग्रहण करते हैं तो यूँ लगता है कि ऋण का नीर हो। अन्न के कुछ कण भी यूँ चुगते हैं जैसे धरती इनकी सौतेली माँ हो। चौके से कुछ खाते भी हैं तो चोरी के भाव में डरे रहते हैं। खटका होते ही भाग जाते हैं। 


इन पंछियों की नींद भी रुई सरीखी होती है, एकदम हल्की। लगता है जैसे इनकी नींद में भाप भरी हुई है, फुर्र से उड़ जाती है। संशय के कारण एक संकुचित सी नींद लेना चिंता से भर देता है। इन पक्षियों को एकटक निहारते रहने से जीवन में असीमित आमोद प्रमोद भरा जा सकता है। वेदों में इन्हे यूँ ही ईश स्वरुप नहीं कहा गया है। इनकी सुंदरता रहस्यमयी है। उनका जीवन और मरण एक उत्सव है। 


ये खगकुल बहुत समृद्ध संकुल है। लम्बी यात्रा करने वाले कई प्रवासी पंछी हवा को अपने पैरों से तौलते हुए सो भी लेते हैं। आँखों में रात काट देते हैं। अपने प्राणों पर संकट उन्हें चैन से सोने नहीं देता। वो कभी निश्चिंत नहीं रहते। कभी किसी पक्षी को आपने निश्चिंत, निर्भय, अचल, स्थिर देखा है?


प्रश्न ये है कि इनका संशय, इतना भय, इतना अविश्वास इनके कोमल मन में कैसे आया, किसने भरा? इस भय का कोई उपाय मानव ने कभी क्यों नहीं खोजा? क्या बाल्यकाल से हमें वो संस्कार, वो प्रेम, अपनत्व का भाव नहीं मिला, जिसके हम अभिलाषी हों?
इस अनुत्तरीय प्रश्न का उत्तर ढूंढ़ते हुए एहसास होता है कि करुणा और प्रेम का भाव यूँ अचानक प्रकट नहीं होता। मारकाट के माहौल में बड़ा होता बचपन कभी करुणा को अपने ह्रदय में स्थान नहीं देगा। प्रकृति की गोद से वंचित बालक जब बड़ा होगा तो विकास की आंधी में वो पेड़ पौधों को बाधा ही समझेगा और उस अंधे विकास के पथ पर अपने कंक्रीट के जंगल बिछा देगा जिसकी कीमत पर होगा अनगिनत पंछियों का भय, डर और पेड़ पौधे जो अब नहीं रहेंगे।

वृन्दावन के वात्सल्यग्राम में एक ऐसा ही प्रयास किया गया है जिसमें कोमल बाल मन में प्रकृति को माँ के रूप में दिखा पंछियों, पशुओं और पेड़ पौधों से प्रेम करना सिखाया जाता है। नन्ही दुनिया नामक इस प्रकल्प में छोटा सा किन्तु महत्वपूर्ण प्राकृतिक स्थल बनाया गया है जिसमें छोटी सी कुटिया है, नन्हे नौनिहालों के लिए कृत्रिम पशु पक्षी बनाये गए हैं, अध्यात्म की चिर ज्वलंत लौ है, जिससे बच्चों को प्राकृतिक सान्निध्य मिले, माँ प्रकृति के आशीष में वो रहना सीखें, उन पंछियों को अपने पास पाएं जिन्हे वो शायद वो किताबों और कहानियों में देखते हैं, लेकिन समझ नहीं पाते। 

आइये उन पंछियों के कोलाहल में छिपे संगीत से अपने बच्चों के जीवन में सुर लय और ताल की नदी बहाएं, उन्हें करुणा और दया का भाव दें, उनके कोमल मन मस्तिष्क में पंछियों की वो पवित्रता स्थापित करें जिसमें वो पावन जीवन समाया है। आइये नन्ही दुनिया घूम कर आएं।  

संस्कारों, तपस्या और परोपकार का आनंद – वैशिष्ट्यम

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बृज की पावन नगरी में एक सेवाकेंद्र है जिसे वात्सल्यग्राम के नाम से जाना जाता है। इस सेवाकेंद्र को परम पूज्य दीदी माँ ऋतम्भरा जी ने स्थापित ही नहीं किया अपितु पुष्पित पल्लवित और पोषित इस प्रकार किया कि इस केंद्र के अनेकों प्रकल्पों के दर्शन करने से मानवीयता और उसका महत्त्व समझ आ जाता है। प्राकृतिक छटा ऐसी कि सभी आह्लादित हो जाते हैं। इस आह्लाद का आनंद लेने देश के बड़े प्रतिष्ठित मंत्री श्री देवेंद्र जी प्रधान वैशिष्ट्यम नामक प्रकल्प में नव भवन निर्माण हेतु भूमिपूजन हेतु आमंत्रित थे और उनका विधिवत मंत्रोच्चार के साथ स्वागत किया गया। इस नवीन भवन के भूतल के निर्माण कार्य हेतु देश की प्रतिष्ठित महारत्न कंपनी ओएनजीसी सहयोग कर रही है, जिसके लिए निदेशक (मानव संसाधन) श्रीमती मित्तल का भी आगमन हुआ, जिससे अधिक बच्चे, जो विशिष्ट हैं, इस सेवा प्रकल्प के माध्यम से अपने कष्टमय जीवन में सुगमता और सरलता ला सकें। 

भूमिपूजन 

कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी कैंपेन के अंतर्गत देश की महारत्न कंपनी ऑइल एंड नेचुरल गैस कारपोरेशन की मानव संसाधन निदेशक श्रीमती अलका मित्तल भी कार्यक्रम में मौजूद रहीं जिसमें संविद गुरुकुलम विद्यालय के विद्यार्थियों ने लीलाधर भगवान श्री कृष्ण के भजनों पर मनमोहक नृत्य प्रस्तुत कर सम्पूर्ण सभा-भवन को भक्तिमय कर दिया। इस भक्तिमय माहौल को और आकर्षक बनाया वैशिष्ट्यम के विशिष्ट बच्चों ने जिन्होंने देशभक्ति गीत पर दर्शनीय प्रस्तुति देकर सबका मन मोह लिया। 

श्रीमती मित्तल निदेशकओएनजीसी लिमिटेड

इस गीत संगीत और रंगारंग कार्यक्रमों के बीच जो भाव दर्शनीय था, वो था, आगंतुक अतिथियों का इन विशिष्ट बच्चों के प्रति सम्मान एवं प्रेम का भाव, जो परिलक्षित होता है उस ट्वीट के माध्यम से जो मंत्री जी ने दीदी माँ और वात्सल्य परिवार के वैशिष्ट्यम के प्रति स्नेह के कारण किया। कार्यक्रम का सञ्चालन श्री उमाशंकर राही और साध्वी सत्यप्रिया दीदी ने किया।

अपने सम्बोधन में श्रीमती मित्तल ने उस प्रकरण की भी चर्चा की जिसमें उनका वात्सल्यग्राम से स्नेह और कौशल विकास में उनकी अग्रणी सोच प्रदर्शित होती है। उनका अपने प्रतिष्ठित प्रतिष्ठान ऑइल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन की कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी कैंपेन में वात्सल्यग्राम के वैशिष्ट्यम को शामिल करना उस मानवीय संवेदनाओं का फिर से जी उठना है जो आज के समय में कहीं खो सी गई हैं। वैशिष्ट्यम के बच्चों को सम्बोधित करते हुए उन्होने कहा कि उनकी कंपनी में वैशिष्ट्यम कके बच्चों का स्वागत है। 

आदरणीय प्रधान जी ने भी दीदी माँ का आभार व्यक्त करते हुए अपने उद्गार व्यक्त कर सभी को सम्बोधित किया। उनका उद्बोधन सरलता और सहजता का सम्मिश्रण था जिसमें काफी गंभीर बातों को सहज तरीके और सरल शब्दों के माध्यम से व्यक्त करना लोगों को प्रभावित कर गया। 

शिलान्यास 

दीदी माँ जी के सम्बोधन में एक आकर्षण हमेशा रहता है जिससे श्रोता का ध्यान कभी भंग नहीं होता। वो बोलती हैं तो लगता है व्याकरण की साधक हैं, अपने शब्दों के  चयन से कैसे वो इतना सम्मोहित करती हैं। दीदी माँ जी के आज के सम्बोधन में वो सब कुछ था जिसकी उनके श्रोता उत्सुकता से प्रतीक्षा करते हैं। अथितियों का स्वागत सत्कार हो या बच्चों के प्रति उनका निश्छल निर्मल प्रेम, परोपकार की भावना हो या भगवन राम के प्रति उनका समर्पण, निश्चय ही वो इस धरा की तो नहीं लगतीं। 

 दीदी माँ जी का सम्बोधन राम के रामत्व पर था, राम मंदिर के भव्य निर्माण की प्रसन्नता उनके शब्दों के माध्यम से श्रोताओं के कान में शहद घोल देती है। संस्कृति और सभ्यता का अंतर व्यक्त करते हुए दीदी माँ ने कहा कि सभ्यता के नहीं हम संस्कृति के उपासक हैं, निश्चित रूप से ये सही भी है क्यूंकि मेसोपोटामिया से लेकर यूनान और मिस्र से लेकर रोम तक, हर सभ्यता नष्ट भ्रष्ट हो गयी लेकिन संस्कृति थे हम इसीलिए प्रासंगिक हैं। अंत में सभी को भूमिपूजन के साथ आगंतुक अतिथि गणों ने विदा ली और एक मोहक माहौल में ये परोपकार का पावन कार्य सम्पूर्ण हुआ।  

मीरा और माधव: प्रेम से आध्यात्म तक

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वो क्या है जो किसी भी समाज की सबसे अमूल्य निधि मानी जाती है? जिसके बिना यूनान, मिस्र, रोम जैसे साम्राज्य मिट गए लेकिन हजारों वर्षों के सतत आक्रमणों और गुलामी को झेलने के बाद भी भारतीय सभ्यता और संस्कृति अडिग और अमिट ही रही ? वो अमूल्य निधि है, अपनी वास्तविक पहचान। उस पहचान को बनाये रखने के लिए किये गए प्रयत्न, लड़े गए युद्ध और उससे भी बढ़कर, समाज के रूप में उन प्रयत्नों की कहानियों को आगे बढाकर अगली पीढ़ी तक पहुंचाना। 

विदेशी आक्रांताओं के अधार्मिक व्यवहार और अनुचित नीतियों ने अनेकों लोगों को धर्मान्तरण पर विवश किया। अत्यंत तीव्र और बहुतायत में किये जा रहे इन धर्मान्तरण के बाद भी भारत की बहुसंख्यक जनता कैसे सनातन को मानती रही, ये प्रश्न भी आपके मन में आता होगा। लाजिमी है, क्यूरिऑसिटी को जिंदा रखना ही तो जिंदगी है। इतिहास का गहन अध्ययन करने पर जो एक चीज समझ आती है वो है कि उस समय पर उत्पन्न हुए भक्ति आन्दोलनों ने सनातन धर्म की रक्षा की। धर्म की ध्वजा को पकडे रखा और भारतीय उपमहाद्वीप अपनी वास्तविक पहचान को सहेज सका। 

मीराबाई उन महान संतों में से एक हैं जिनकी भक्ति और भजनों ने भक्ति की लौ प्रज्वलित रखी और हमें सिखाया कि प्रेम का एक रुप आध्यात्म भी है। प्रेम का एक रुप प्रेम करते चले जाना है जिसमें वांछित लक्ष्य कुछ नहीं। वांछनीय कुछ भी नहीं। एक माधव एक मीरा। यही है प्रेम जिसमें मीरा माधव को ढूंढ़ते हुए रात के अंतिम पहर में भी संकीर्तन में पहुंच जाती थीं। 

यूँ आसान नहीं किसी के लिए मीरा हो जाना। माधव का नाम जपते जपते उन्होंने अपने चरित्र पर लांछन के छींटे भी झेले, मगर उफ़ न की। माधव के प्रेम को अंतिम संकल्प समझ जो किया वो वही था, जिसके लिए लोग उन्हें जानते हैं – प्रेम। 

एक रजवाड़े की बेटी, एक रजवाड़े की बहु, एक राजा की पत्नी, कैसे माँ के एक बार  माधव को दूल्हा बताने  समर्पण की अंतिम सीढ़ी पर पहुंच गईं। मीरा ने विष के प्याले को भी विश्वास के माध्यम से अमृत कर दिया। राणा के क्रोध का भय किसे जब लगन उस माधव में हो। 

मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई। 

जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई। 

ये भाव लिए वो जीवित रहीं और इसी भाव से वो परलोक सिधार गईं। पीछे छोड़ गईं एक सीख, जो सिखाती है हमें कि प्रेम का वास्तविक अर्थ क्या है। प्रेम में मीरा हो जाना असंभव है, कम-से-कम आज के परिदृश्य में तो है ही। उस परिदृश्य की चर्चा लेखक ने जानबूझ कर नहीं की है। 

मीरा माधव के इस ब्रह्माण्ड स्वरुप प्रेम को मूर्त रूप दिया गया है वृन्दावन नगर में स्थित एक रिसोर्ट में जो मीरा माधव के नाम पर बसाया गया है। इस रिसोर्ट का नाम ही है, मीरा माधव निलयम, निलयम एक तमिल शब्द है जिसका अर्थ है घर। मीरा माधव निलयम जहाँ मीरा और माधव को एक साथ स्थापित किया गया है, उनके मंदिर में। रिसोर्ट का मध्य बिंदु ही है ये मंदिर जहाँ भोजन बनता है तो नैवैद्यम नामक रसोई में, जिसे प्रसादम कहा जाता है। 

देखना हो तो वृन्दावन के वात्सल्यग्राम में आइये और कुम्भ मेले के दर्शन के साथ मीरा माधव के घर रहकर देखिये, परम आनंद की अनुभूति होगी। 

एक माँ, एक सपना और हज़ारों मुस्कुराहटों वाला छोटा सा गांव

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माँ प्रकृति के सान्निध्य में एक छोटा सा गांव है जहाँ संस्कृति रहती है, वहीं एक कुटिया प्रेम की भी है जहां बचपन अपनी मासूमियत के साथ खिलखिलाता है, उसके साथ एक कमरे में संस्कारों के नन्हे कदम लक्ष्य प्राप्ति की ओर निर्बाध रूप से बढ़ रहे हैं, जिनकी नन्ही उंगलियों को एक माँ और उसके अमृतमयी वात्सल्य ने मजबूती से थाम रखा है, एक विश्वास के साथ, कि चाहे जो भी हो, इस गांव के नन्हे बच्चों को सफल और समर्थ बना किसी और को उसी मजबूती से फिर से थामना है। फिर से वही प्रक्रिया और वही सफलता का लक्ष्य लेकिन अनुशासन और संस्कारों की ओट करके अपने बच्चों को विश्व की बुराइयों से बचाते हुए। 

मथुरा वृन्दावन मार्ग पर बसे इस छोटे से ग्राम को परम आदरणीय साध्वी दीदी माँ ऋतम्भरा ने बसाया है और यहाँ संस्कारों और उच्च आचरण के बीज उपजाए जाते हैं उन नन्हे नौनिहालों में, जिनके जीवन को सुमधुर और सफल बनाने की जिम्मेदारी ली है एक माँ ने जिन्हे उनके आसपास के लोग दीदी माँ कहते हैं। तेजमयी चेहरा, चेहरे पर हमेशा बसने वाली मुस्कान और उस मुस्कान से मिलता दृढ विश्वास जिसमे संकल्प है साधारण जीवन को असाधारण बना ज्ञान और भक्ति के प्रकाशित मार्ग से देश के भविष्य को सुरक्षित करने का। इस गाँव की खास बात है कि यहाँ खुशियां बसती हैं, जिनके हाथ थाम बचपन तरुण होते हैं, रिश्तों की एक अटूट डोर से हर कोई बंधा हुआ है, सभी को अपना बना, सम्मान के साथ बढ़ता जीवन, जिसके अर्धपूर्ण होने में भी एक पूर्णता का आभास होता है। दीदी माँ ने आध्यात्म और विज्ञान की एक ऐसी प्रयोगशाला स्थापित की है जहाँ भक्ति के साथ ज्ञान है। ये ज्ञान संस्कारों और संस्कृति से जोड़ता है, हमें अपनी जड़ें दिखता है, अपने पूर्वजों का गौरवशाली इतिहास और प्रेरणादायी उपलब्धियों से मिलाता है। 

इस गाँव का नाम है वात्सल्यग्राम जो मथुरा-वृंदावन मार्ग पर स्थित है। दीदी माँ ने सिर्फ इस ग्राम की ही नहीं, संस्कृति और संस्कारों के एक नवयुग की भी आधारशिला रख दी है, जिसमें प्रकृति माँ को सम्मान दिया जाता है। माँ शारदा का एक दिव्य मंदिर जिसमें सत्व, रज और तम आदि तीनो गुणों को गुम्बदों के आकार में परिलक्षित किया गया है। इसके एक तल पर म्यूजियम भी बनाया जा रहा है। इसके साथ इस गाँव में समाज के वंचितों और  महिलाओं के साथ बच्चों के लिए अतुलनीय रूप से सेवा प्रकल्प चलाये जा रहे हैं, जिसमें दीदी माँ के संकल्पों को मूर्त रूप दिया जा रहा है। उस समय में जब विभिन्न ओटीटी प्लेटफार्म हिन्दू घृणा में अश्लीलता और अधार्मिक सामग्री को प्रचारित प्रसारित कर रहे हैं, ये आवश्यक हो जाता है कि वात्सल्यग्राम जैसे अलौकिक समाधान इस समाज में और बढ़ें और फलें। 

वसुधैव कुटुंबकम की पुरातन व्यवस्था को मूर्त रूप देते हुए दीदी माँ के प्रकल्प उन्हें परम आदरणीय माँ के रूप में प्रतिस्थापित करते हैं, जहाँ हज़ारों अधरों पर मुस्कान बिखेरी जाती है, जहाँ अपने पूर्वजों को आदरपूर्वक स्मरण कर आत्मविश्वास पैदा किया जाता है, जहाँ सभी को महिलाओं का सम्मान करना सिखाया जाता है, जहाँ गौ माता की सेवा होती है जहाँ त्येन त्यक्तेन भुंजीथा की विचारधारा के अनुरूप चलते हुए दीदी माँ भारत वर्ष के आधार श्री राम के भव्य मंदिर निर्माण के लिए सहर्ष १ करोड़ की राशि दान करती हैं। 

महिलाओं के पुनरुद्धार और संस्कृति की रक्षा करती आदरणीया दीदी माँ एक महान समाज सुधारक नहीं, एक समाज उद्धारक हैं। ऐसी महमानुषी को कोटि कोटि नमन। 

एक माँ, एक सपना और वात्सल्य का संसार

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माँ – अनेकों रूपों, गुणों, भावों और विचारों में वर्णित ईश्वरीय आस्था का मानवीकरण, जिसकी इच्छा, खुशियां, शौक, कुछ भी अपना नहीं। सब कुछ समर्पित, त्याज्य और अपने बच्चों की मुस्कान से खुश होती वो ईश्वरी, अपनी मुस्कानों और खुशियों के लिए भी निर्भर है अपने नौनिहालों पर, बढ़ते बच्चों पर, जो कितने भी बड़े हो जाएं, पद में, प्रतिष्ठा में अथवा उम्र में, उसके लिए वही रहते हैं- वही भय्यू, वही अल्पू, और उसका वही लाडला मर्फी।

मातृत्व भावनाओं के सागर में झूमती एक अविरल धारा का नाम है। सेवा, त्याग और समर्पण के इस मिश्रित रूप को वात्सल्य भी कहा जाता है। उस ईश्वरीय गुण की अगाध आस्था के समर्पित पुष्पित भाव को ही कहते हैं – माँ। चोट लगने पर जो रात भर न सो सके, पिता की डांट से गुस्सा जाये, खाती नहीं वो जब तक तुम्हें न खिला दे, खुद कुछ भी पहने – तुम्हें रंग पहनना सिखाती है, चहकना भी, उंगली पकड़ चलाती है, गिरने पर हौसला देती, छोटी सी बात पर चहक जाती, घर से निकलने पर मुट्ठी में वही पांचसौ का नोट दबा देती, जरुरत नहीं है कहने पर भी चुपचाप रख ले, कहकर रख देती, जैसे आशीर्वाद देने का यही तरीका आता है उसे।

पारिवारिक जीवन की इस माँ को हम सब जानते हैं। माँ होना मुश्किल है, बहुत मुश्किल, लेकिन इस भाव को शक्ति मिलती है अपनत्व के भाव से। अपना बच्चा, अपना घर, अपने लोग- सबको प्रिय होते हैं, लेकिन ये अपनत्व का ऐसा भाव भी है जो आत्मकेंद्रित बनाता है। आत्मावलोकन से दूर आत्मसमर्पित करता है और आई, मी एंड माइसेल्फ तक रोक देता है।

इस पारिवारिक माँ जैसी एक माँ और भी है, जिसके वात्सल्य के लिए उसका बेटा होना कोई जरुरी नहीं, जो समर्पित है समाज की माताओं, बहनों और त्याग दिए गए बच्चों को। इस माँ के वात्सल्य में कोई भेदभाव नहीं, कोई बड़ा छोटा नहीं, कोई अपना पराया नहीं, सबको प्रेम और समर्पण के भाव के साथ रिश्तों की रेशमी डोर में बांध लेतीं ये माँ सनातन की ध्वजवाहक हैं। हमें संस्कृति और संस्कारों का महत्व बताती हैं, होली पर हमारे जीवन को रंगों से भरने का आशीर्वाद देती हैं, इनके लिए आपके सोशल स्टेटस, बैकग्राउंड और एजुकेशन से कोई मतलब नहीं। सिर्फ प्रेम और वात्सल्य की इस देवमूर्ति को हम और आप दीदी माँ जी के नाम से जानते हैं। सरल, सौम्य और सनातन के सद्गुणों से समाज को सद्बुद्धि की ओर प्रेरित करती हैं परम पूज्य दीदी माँ ऋतंभरा जी।

भावों के सागर का नाम है वात्सल्यग्राम 

वात्सल्यग्राम के परिवार में जो भाव बहते हैं, उन भावों का मूलतत्व है – मातृत्व, 

दीदी माँ जी ने जिस अद्भुत संसार को वात्सल्यग्राम का स्वरुप दिया है, उसमें एक यशोमती मैया है जिसके बच्चों से उसका कोई रक्तसम्बन्ध नहीं है लेकिन मातृत्व का भाव वही है जो एक सगी माँ का हो सकता है। दीदी माँ सनातन की उस उन्नत परंपरा का पर्याय हैं जिसमें भारतीय माताओं को हर विधा का ज्ञान होता है। दीदी माँ अपने बच्चों से हमेशा कनेक्टेड रहती हैं, सबकी चिंताओं से बंधी रहती हैं, इसीलिए संस्कारम जैसे प्रकल्पों को मूर्तरूप भी देती हैं। सांसारिक बदलावों से भी परिचित हैं, मैकॉले के षड्यंत्रों के बारे में भी जानकारी देती हैं जनमानस को तो वैक्सीन के प्रचार से लोगों को जागरूक भी करती हैं। 

दीदी माँ महिला सशक्तिकरण का भारतीय संस्करण हैं – विशुद्ध सनातनी। रामजन्मभूमि आंदोलन का एक प्रखर बौद्धिक स्वरुप, जिनका बालमन मंदिर निर्माण के बारे में जानकर नाचने लगता है। जो छोटे बच्चों की मासूमियत लिए खुलकर, मुस्कुराकर और सबको अपना मानकर रहती हैं।

दीदी माँ की दूरगामी सोच का अंदाजा वात्सल्यग्राम को देखकर लगाया जा सकता है जिसमें उन्होंने अनाथालय, नारीनिकेतन और वृद्धाश्रम की धारणा के विपरीत वात्सल्य से परिपूर्ण एक ग्राम का निर्माण किया। रोटी देने की जगह रोटी कमाने लायक बनाया। बेचारगी के दीनपूर्ण भाव से मुक्त कर वात्सल्यग्राम की बेटियों, माओं, और दादी/नानी को आत्मबल से परिपूर्ण किया। लोगों को एक दूसरे के साथ माँ, बेटी, दादी, मौसी, नानी जैसे अपनत्व के भावों से भर माँ वत्सला होना सिखाया।

आज भी दीदी माँ जी की अनेकों बेटियां देश के अनेको विश्वविद्यालयों से शिक्षित हो रही हैं। अपनी बेटियों को पीअर प्रेशर से बचाकर सत्मार्ग पर आगे बढ़ाने के लिए दीदी माँ प्रतिदिन बात करती हैं। इनमें से कोई मेडिकल डॉक्टर बन रही है, कोई इंजीनियर और वकील लेकिन इन आत्मीय रिश्तों से बंधे संबंधों में एक चीज है – माँ का वात्सल्य, जो दीदी माँ जी ने दिया है, सभी को।

आज मातृदिवस के अवसर पर जरुरी है दीदी माँ को सम्मान प्रदर्शित करने की जिन्होंने आत्मकेंद्रित व्यवस्थाओं की भीड़ में भी, समाजकेंद्रित रहने का लक्ष्य निर्धारित किया, उसपर चलीं और अनेकों लोगों को प्रेरित किया। खून के रिश्तों से ज्यादा आत्मीय होते हैं भाव के रिश्ते, वात्सल्यग्राम के गोकुलम में ये भी देखा जा सकता है।

महिलाओं को स्वाभिमान के साथ स्वाबलंबन के मार्ग पर चलना भी सिखाती हैं दीदी माँ जी। संविद एक्सपर्ट स्कूल बानगी है इसकी और इसीलिए देश मानता है, अपनी पारिवारिक माँ से बड़ी हम सबकी माँ हैं परम पूज्य दीदी माँ ऋतंभरा जी।

समाज आपका ऋणी सदा रहेगा। आपके श्री चरणों में शत शत नमन।

संविद एक्सपर्ट स्कूल ‘स्वाबलंबन से स्वाभिमान तक’

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स्वाबलंबन से स्वाभिमान तक!!

ये संविद एक्सपर्ट स्कूल की टैग लाइन ही नहीं है, एक सफर की दास्तान है। सफर, जिंदगी का, जिसमें जीवन जीने की बुनियादी जरूरतों पर माननीय सर्वोच्च न्यायलय ने भी गौरवपूर्ण जीवन की आवश्यकता का अनुमोदन किया है। स्वाबलंबन एक सीढ़ी है गौरवपूर्ण जीवन का, गरिमामय उपस्थिति का, स्वीकार्यता का। 

महिलाओं के लिए स्वाबलंबी जीवन हर दूसरी चीज से अधिक महत्वपूर्ण है। जीवन की गरिमा बनाये रखने के लिए, बहुत महत्वपूर्ण। जिस माहौल में महिलाओं को रहना होता है, उसमें उनकी सहअस्तित्व की अस्मिता एक स्वस्थ मानसिकता के समाज के लिए आवश्यक है। 

लज्जा के साथ स्वाभिमान भी महिलाओं का आभूषण है। लज्जा थोड़ी ओवररेटेड है, क्यूंकि सिनेमा में इस गुण को बेच सकना आसान होता है। ‘गांव की गोरी’ की कहानी गढ़ती सिनेमैटिक नौटंकी को स्वाभिमानी नहीं, लजाती महिला भाती है, क्यूंकि लाज काढ़े महिला की तस्वीर बिकती है, स्वाभिमान के साथ सर उठा चलती महिला, नीचे से ऊपर जाते हर तबके को बर्दाश्त कहाँ?

इसी समाज की ठुकराई हुई महिलाओं को अपने पैरों पर खड़ा करने की कहानी का नाम है – संविद एक्सपर्ट स्कूल। साध्वी ऋतंभरा, जिन्हें उनके अगाध सम्मान के कारण दीदी माँ जी कहा जाता है, उनका नाम लिखने से पहले, उनके नाम के आगे परमपूज्य क्यूँ लग जाता है, उसका उत्तर है – संविद एक्सपर्ट स्कूल। ये स्कूल अभी अपने प्रारंभिक चरण में है, लेकिन इसके स्थापन की सोच की वजह से ये आज लोगों में चर्चा का विषय बना हुआ है। 

कुटीर उद्योगों की शकल में महिलाओं को कम लागत के व्यावसायिक उपक्रमों की जानकारी देना, पापड़ अचार बड़ी और दूसरी चीजें बनाना सिखाया जाता है यहाँ, बेचा जाता है, जिससे इन महिलाओं को ट्रेनिंग के साथ अर्निंग का अर्थ समझ आता है। संविद एक्सपर्ट स्कूल सच्चाई है महिलाओं के हुनर को हौसले के साथ आगे बढ़ा हाथ से हाथ मिलाने की, मैं और तुम से हम होकर अपनी विजय का शंखनाद करने की। 

संविद एक्सपर्ट स्कूल, वात्सल्यग्राम के शांत और सुरम्य वातावरण में बढ़ रहा है। यहाँ खाने पीने की चीजें बनाने के अलावा, ब्यूटी पार्लर, हथकरघा, सॉफ्ट टॉयज और कई अन्य चीजें भी बनाई जाती है, जिससे महिलाओं के अंधमय जीवन में अर्थपूर्ण सवेरे की किरण दस्तक दे, ख़ुशी की चिड़ियों की ध्वनि गूंजे और स्वाबलंबी जीवन उन्हें गरिमामय अस्तित्व के साथ स्वाभिमान के साथ सर उठा कर चलना सिखाये। सनद रहे, जिस समाज में महिलाओं की स्थिति सुदृढ़ होती है, वहाँ सम्पन्नता का वास और सुरक्षित परिवेश हो ही जाता है। 

अगर आप इन महिलाओं के हाथ और मजबूत करना चाहते हैं, तो निम्नलिखित वेबलिंक पर क्लिक कर सहयोग कर सकते हैं। 

महिला सशक्तिकरण का भारतीय संस्करण:- साध्वी दीदी माँ ऋतंभरा

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भारत विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता और संस्कृति वाला देश है। एक ऐसा देश जिसने विश्व को सबसे पहले विश्वविद्यालय और शल्य चिकित्सा का ज्ञान दिया। एक देश जिसके वैभव की चकाचौंध ने लगभग समूचे विश्व को ही अपनी और आकर्षित किया। कुछ यहाँ के विश्वविद्यालयों में ज्ञानार्जन हेतु आये और इस कुछ लोग तुर्क, उज्बेक, मंगोल, पश्तून, अफ़ग़ान, अंग्रेज, डच, फ्रेंच जैसे विदेशी आक्रांताओं और व्यापारियों के रूप में, किन्तु इन सभी को इस देश के अग्रणी ज्ञान विज्ञान ने यूँ ही नहीं आकृष्ट किया। सोने की चिड़िया कहाने वाला ये देश यूँ ही जगतगुरु भी नहीं बना। इस वैभव, ज्ञान और विश्व के बाजार का केंद्र रहा भारत अपने उच्च आदर्शों और महान आचरण वाले महापुरुषों के नेतृत्व से इस शिखर पर रहा। इस महान नेतृत्व का सृजन संस्कारों के कठिन तप से हुआ जिसमें माता सीता जैसी माताओं ने ऐसे अद्भुत बालकों को संस्कारों की शिक्षा दी जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के साथ ध्यान, योग, मीमांसा, वेद, पुराण में उस समय के सर्वगुणसम्पन्न किशोर थे अपितु वीर योद्धा भी। 

भारत में सदा नारी का सम्मान रहा है, विदेशी आक्रांताओं के आक्रमणों से पूर्व भी जब एक राजा दूसरे राजा पर आक्रमण करता था तो एक दूसरे के पूजा स्थलों को भले नुकसान पहुँचाया जाता रहा हो किन्तु महिलाओं को सम्मान की दृष्टि से ही देखा जाता रहा और इस नीति का पालन परम आदरणीय छत्रपति शिवाजी महाराज ने भी किया। जिस देश में इतने उच्च आचरण का पालन किया जाता रहा, जिस ध्येय वाक्य को केंद्र में रखकर शासन व्यवस्था चलती रही आज उसी देश में नारी का अनादर और घृणा एक समाज के रूप में हमें शर्मिंदा कर जाती है। महिला आयोग, नारी निकेतन, महिलाओं का मंत्रालय जैसे शब्द हमें बताते हैं कि इस डिजिटल युग में “यत्र नारी पूज्यन्ते तत्र रमन्ते देवता” जैसे ध्येय वाक्य अब उतने कारगर नहीं रहे और इसी लिए एक समाज, एक देश के रूप में हमारा नैतिक, सामाजिक और आर्थिक पतन हुआ है। 

हमारे समाज के असली नायक नायिकाओं की पहचान हमारी युवा और तरुण पीढ़ी को होना बहुत जरुरी है और इसी क्रम में आज हमें एक ऐसी महातपस्विनी से इन्हें परिचित कराना है जो महिला सशक्तिकरण का सर्वश्रेष्ठ भारतीय संस्करण हैं। जिन्होंने एक दो नहीं अपितु हज़ारों लोगों को सहयोग का ऐसा हाथ थमाया कि उन नन्हे कोमल हाथों ने उन्हें माँ के रूप में मान लिया, उन सैकड़ों महिलाओं ने उनमें दीदी रूप देखा जिनके सान्निध्य में उन्हें अपना जीवन सफल लगने लगा। प्रेम और करुणा की साक्षात प्रतिमूर्ति आदरणीय दीदी माँ ऋतंभरा हमारे समाज की भारतीयता में डूबी हुई एक ऐसी ही महान विभूति हैं, जिनके व्यक्तित्व के बहुआयामी गुणों से हम इस समाज को एक परिवार के रूप में देख सकते हैं, प्रेम कर सकते हैं, वसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा को मूर्त रूप देने वाली दीदी माँ के बहुआयामी व्यक्तित्व का एक आयाम अयोध्या में कार सेवा के लिए लोगों को प्रेरित करने वाली एक सम्माननीय नेतृत्व का है तो दूसरे आयाम को आप वात्सल्यग्राम से समझ सकते हैं। 

वात्सल्यग्राम एक ऐसी परिकल्पना है जिसमें समाज के हर वर्ग के जरूरतमंद लोगों की सेवा की जाती है। एक परिवार के रूप में महिलाओं और बच्चों को साथ रखकर एक परिवार के रूप में उनका पालन, पोषण, शिक्षा, चिकित्सा और रोजगारपरक कार्यक्रमकों के माध्यम से उनके जीवन में उमंग और उल्लास भर संस्कारों को रोपा जाता है और वो भी निशुल्क। स्वयं दीदी माँ के शब्दों में, “हमारे बच्चे तुलसी के पौधे हैं जिन्हें संस्कारों से सींचा जाता है।” ऐसे विचारों के प्रसार और प्रचार की हमें बहुत आवश्यकता है, पुनः विश्व गुरु बनने के लिए। इस समाज को यदि एक सफल परिवार का रूप देना है तो हमें दीदी माँ जैसे किसी बहुमुखी नेतृत्व को स्वीकार उनका अनुसरण करना चाहिए। हमारे देश में दीदी माँ महिला सशक्तिकरण का सर्वोत्तम उदाहरण हैं। महिला सशक्तिकरण एक बहुत व्यापक और वृहद् विषय है। हमारे आदर्श हमारे अनुकरणीय वही हो सकते हैं जो हम जैसे हों, हमारे जैसे दिखते हों, हमारी तरह आचरण करते हों या जिनमें देशप्रेम की भावना हमारे जैसी ही हो। कोई विदेशी संस्कारों के अनुसार जीवन यापन करते कलाकार जिनकी मित्रता सीमाओं के परे है, जो कला को देश के सम्मान से ऊंचा समझे वो हमारा नायक कैसे हो सकता है। हमारे आचरण को शुद्ध करने के लिए, समाज के रुप में उन्नति के लिए अनुशासित एक माँ ही कर सकती हैं और दीदी माँ से बेहतर और कोई कैसे हो सकता है? जिनमें भारतीयता वसुधैव कुटुंबकम के रूप में बसती है, जो धर्म ध्वजा को बीते कई वर्षों से थामे हैं और सतत मुस्कुराहट के साथ असंख्य चेहरों को मुस्कुराहट दे रही हैं। 

हमारे समाज की एक बहुत बड़ी समस्या अपनी पहचान का संकट सदा सर्वदा रही है। हमारे समाज के रोल मॉडल्स हमेशा क्रिकेट के खिलाडी या अभिनेता/अभिनेत्रियां रहे हैं। कोई बड़ा लेखक हो या समाज सुधारक, हमारे युवाओं का इनसे कोई परिचय नहीं रहा। इसलिए जरुरी है कि हम अपने नौनिहालों को और युवाओं को इस समाज के सच्चे सुधारकों से परिचित कराएं।

हज़ारों लोगों का निशुल्क तीनों समय का भोजन, निर्धन परिवार के बच्चों को मुफ्त आवास, स्वास्थ्य और उच्च श्रेणी की शिक्षा का जिम्मा, हर तीसरे महीने बृृजमंडल के हज़ारों लोगों का मुफ्त नेत्र शल्य चिकित्सा दीदी माँ के उस तप का ही परिश्रम है जिसमें समाज का एक बड़ा वर्ग उन्हें माँ और दीदी के उच्च आसान पर विराजता है, उनके श्री चरणों में अपना शीश नवा उन्हें साधुवाद करता है। ऐसी महान भारत भू की एक महान तेजस्विनी जिनके आभामंडल पर सदा सर्वदा तेज रहता है, आइये इस भारतीय समाज में अपनी जिम्मेदारी निभाएं, अपने बच्चों को ऐसे उच्च आदर्शों पर चलना सिखाएं, उन्हें बताएं कि महिला सशक्तिकरण का वास्तविक अर्थ सिर्फ अपने जीवन को बेहतर बनाना ही नहीं होता, इसका भारतीय मूल्यों में अर्थ होता है, तमाम निराश्रित अधरों पर मुस्कुराहटें बिखेर देना जिनका कोई नहीं सिर्फ परमात्मा होता है क्यूंकि आदरणीय दीदी माँ के शब्दों में –

“विश्वनाथ की धरती में कोई अनाथ कैसे हो सकता है?”