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November 2021

सांस्कृतिक शिखर पर स्थित देवभूमि: उत्तराखंड

By ChikitsalayaNo Comments

भारत के 27वें राज्य के गठन के उपलक्ष्य में हर साल 9 नवंबर को उत्तराखंड स्थापना दिवस मनाया जाता है। इस साल यह 21वां उत्तराखंड स्थापना दिवस होगा। वर्ष 2000 में, उत्तराखंड की स्थापना उत्तर प्रदेश के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र के कई जिलों और हिमालय पर्वत श्रृंखला के एक हिस्से को मिलाकर की गई थी। इसे पहले उत्तरांचल के नाम से जाना जाता था, लेकिन 2007 में इसका नाम बदलकर उत्तराखंड कर दिया गया।

उत्तराखंड संस्कृत बोली से लिया गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ “उत्तरी शहर” है। राज्य संस्कृति, नस्ल और धर्म का एक सुंदर मिश्रण है, और यह भारत के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है। उत्तराखंड क्रांति दल द्वारा एक लंबी लड़ाई के बाद, जिसने पहाड़ी क्षेत्रों में लोगों के सामने आने वाले मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया और अलग राज्य की वकालत की, इसकी स्थापना उत्तर प्रदेश की तत्कालीन सरकार ने की थी।

उत्तराखंड का नाम बदलकर उत्तरांचल रखने और 9 नवंबर, 2000 को घोषित होने से पहले यह विवाद कई वर्षों तक चला।

उत्तराखंड का इतिहास:
उत्तराखंड राज्य में अतीत में प्रसिद्ध शासक शामिल हैं: कुषाण, कनिष्क, समुद्रगुप्त, कटुरिया, पलास, चंद्र और पवार। राज्य में संस्कृति, जातीयता और धर्म का एक समामेलन है जो एक प्राचीन संस्कृति से निकला है। इस प्रकार, उत्तराखंड का एक वृहद और व्यापक ऐतिहासिक महत्व है। पारिस्थितिकीय विषमताओं के कारण इस संपूर्ण क्षेत्र को एक नव राज्य के रूप में गठित करना आवश्यक था, जिसके लिए यहाँ के निवासियों ने बहुत संघर्ष भी किया।

वर्ष 2000 में, यह उत्तर प्रदेश से अलग हो गया और भारत का 27 वां राज्य बन गया जिसे उत्तरांचल के नाम से जाना जाता है। उत्तराखंड के पड़ोसी राज्य तिब्बत, नेपाल, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और उत्तर प्रदेश हैं।

उत्तराखंड की जलवायु:
मूल रूप से, उत्तराखंड की जलवायु तापमान में मौसमी बदलाव के साथ समशीतोष्ण है। यह जनवरी के महीने में सबसे ठंडा, जुलाई में सबसे गर्म और मई में सबसे गर्म होता है। इस जगह पर दक्षिण-पश्चिम मानसून द्वारा लाई गई 60 इंच तक वार्षिक वर्षा होती है, जो जुलाई से सितंबर तक होती है। उत्तराखंड में बारिश के मौसम में बाढ़ और भूस्खलन जैसी खतरनाक घटनाएं आम समस्याएं हैं। दिसंबर से मार्च के महीने तक उत्तरी भाग में हिमपात होता है। जलवायु के मोहक होने के कारण उत्तराखंड में पर्यटक बहुत आते हैं।

उत्तराखंड की जनसंख्या:
इसके दो भू-सांस्कृतिक क्षेत्र हैं, गढ़वाल और कुमाऊं। उत्तराखंड के एक बड़े हिस्से में बहु-जातीय आबादी है, जैसे राजपूत, गढ़वाली, गुज्जर और कुमाउनी। अधिकांश आबादी इंडो-आर्यन भाषाएं और अन्य भाषाएं बोलती है, जैसे घरवाली, कुमाउनी, पंजाबी, नेपाली जबकि आधिकारिक भाषा हिंदी है।

उत्तराखंड के त्यौहार:
राज्य दशहरा, दिवाली, शिवरात्रि, होली आदि जैसे प्रसिद्ध हिंदू त्योहार मनाता है। बौद्ध, जैन और सिख संस्कृति जैसी अन्य परंपराओं के साथ, लोग क्रमशः बुद्ध पूर्णिमा, महावीर जयंती और गुरु नानक जयंती मनाते हैं। क्रिसमस भी पूरे राज्य में छोटे-छोटे त्योहारों के साथ मनाया जाता है। यहाँ अधिकांशतः उत्सव के रूप में त्यौहारों के रूप में पर्व मनाये जाते हैं।

उत्तराखंड के निवासियों को नवस्थापन की अशेष शुभकामनाएँ !!

गोवर्धन पूजा: प्रकृति पूजन का पर्व

By ChikitsalayaNo Comments

सनातन की धार्मिक मान्यताओं का आधार प्रकृति रही है। हमारी आस्थाओं का केंद्र प्रकृति रही है जिसका सबसे बड़ा उदाहरण है गोवर्धन पूजा और यम द्वितीया स्नान जिसे गोवर्धन पूजा के अगले दिन हर्षोल्लास से मनाया जाता है। गोवर्धन पूजा भगवान श्रीकृष्ण ने प्रारम्भ की थी। भाई दूज का पर्व उससे बहुत पहले से था, कृष्ण ने उस दिन गोवर्धन को भी पूजने की परम्परा शुरू की।

भाई कौन होता है? जो आपका पोषण करे, आपको साहस दे, और कठिन समय हो या विपत्ति, स्वयं छत बन कर आप की रक्षा करे! इसीलिये लड़कियां अपने छोटे भाई को भी भइया कहती हैं कहीं कहीं। गोवर्धन पशुओं के लिए चारा, फसलों के लिए जल, औषधि आदि प्रदान करते थे। क्रोधित इंद्र ने जब नन्द गांव को वर्षा से डूबो देने का प्रयास किया तब भी गोवर्धन ने रक्षा की! भावुक जनमानस ने उन्हें भइया कहा, स्त्रियों ने उनकी प्रशंसा में गीत रचा, तभी वे लोक के भइया हुए।

लोक के रङ्ग अद्भुत होते हैं। यहाँ गोबर से यमलोक बनता है, जिसमें यमराज, उनकी बहन यमुना और सांप, बिच्छू आदि विषैले जीवों की प्रतिमाएं बनती हैं। साक्षात यमलोक, फिर लड़कियां अधिकार पूर्वक उस यमलोक में घुस कर ओखल से कूट देती हैं यम को, शायद यह संदेश देती हों कि मेरे भाई की ओर देखा भी तो कूट देंगे!

कथा कुछ यूँ है कि आज के दिन यमराज अपनी बहन यमुना के यहाँ गए थे और उन्हें बचन दिया था कि इस दिन जो बहन अपने भाई के लिए प्रार्थना करेगी उसके भाई की अकाल मृत्यु नहीं होगी। इसीलिए आज यम यमुना की पूजा होती है और लड़कियां अपने भाई को तिलक लगा कर उसके दीर्घायु के लिए प्रार्थना करती हैं।

भाई दूज पर यम द्वितीया पर स्नान का भी विधान है। इस स्नान के माध्यम से यमराज के आशीष से लोग यम के पाश से मुक्त हो जाते हैं। अकाल मृत्यु से सुरक्षा का भाव मन में सुनिश्चित हो जाता है। इन्हीं अलौकिक पर्व उत्सवों का संगम है सनातन। ये पर्व देव-उत्थान के पर्व हैं। इन्हीं के साथ देव उठ जाते हैं। शादी विवाह की शहनाई बजने लगती है। घरों में खुशियाँ फैल जाती हैं।

सनातनी संस्कृति की जय हो, धर्म की विजय हो, अधर्म का नाश हो !!

दीपावली : भारत की सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक

By ChikitsalayaNo Comments

मानव समाज के ज्ञात-अज्ञात इतिहास में अनेकों सभ्यताओं-संस्कृतियों का प्रादुर्भाव हुआ, कालांतर में वो काल के गाल में भी समा गईं लेकिन जो सभ्य एवं संभ्रांत समाज की उत्तम परिभाषा ‘रामराज्य’ को मिली, उसका दूसरा उदाहरण कहीं नहीं।

राम, भारत देश की आत्मा हैं। उनकी राजव्यवस्था में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप हैं, लेकिन लोग उनके दुष्प्रभाव से बचे रहते हैं। सभी मनुष्य एक-दूसरे से प्रेम करते हैं और मर्यादापूर्वक अपने जीवन का निर्वहन करते हैं। किसी को कोई पीड़ा नहीं होती, सभी के शरीर सुंदर , निरोगी और सुदृढ़ होते हैं। कोई दीन, हीन और दरिद्र नहीं होता। कोई बुद्धिहीन और शुभ लक्षणों से हीन भी नहीं होता।

सभी अहंकार जैसे दुर्गुण से हीन हैं, धर्मपरायण हैं और पुण्यात्मा हैं। सभी पुरुष और स्त्री चतुर और गुणवान हैं। सभी गुणों का आदर करने वाले और पंडित हैं, ज्ञानी हैं, कृतज्ञ हैं। सभी दूसरे के किये हुए का उपकार मानने वाले हैं, कपट और धूर्तता किसी में नहीं है।

ऐसी अद्भुत और अद्वितीय राजव्यवस्था हर समाज और राष्ट्र की अपेक्षा होती है। राम जैसा पुत्र, राम जैसा मित्र, राम जैसा भाई, राम जैसा पति, राम जैसा पिता, राम जैसा राजा यहाँ तक कि राम जैसा मर्यादित शत्रु भी यहाँ किसे अपेक्षित नहीं? ऐसे विलक्षण मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम जब अयोध्या की सीमा में पुष्पक विमान के माध्यम से प्रविष्ट होने वाले थे, उससे पूर्व ही महाराज भरत, तीनों राजमाता, शत्रुघ्न, गुरुजन, मंत्रीगण, उनके मित्रादि उनके स्वागत को आतुर खड़े थे। विमान उतरा, प्रभु श्रीराम अपनी भार्या जगतजननी माता सीता और अनुज सौमित्र लक्ष्मण के साथ उतरे तो उनकी ओर सभी प्रतीक्षारत जन भागे, लेकिन श्रीराम अपने नेत्रों में जल लेकर खड़े हुए भाई भरत को देखते रह गए।

श्रीराम, भाई भरत को इतनी तल्लीनता के साथ देख रहे थे कि उनकी ओर बढ़ते सभी लोग सकुचाए अपने स्थान पर ही खड़े रह गए। महाराज भरत अपने प्रभु को देख भावविह्वल हो गए। वैसे भी भरत जी प्रेम का प्रतिरूप ही तो कहे जाते हैं। जहाँ प्रेम हो वहीं निडरता भी होती है इसीलिए भैया भरत के साथ शत्रुघ्न जी सदैव उपस्थित रहते हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम भी जहाँ ज्ञान रूपी सागर हैं इसीलिए वैराग्य रूपी सौमित्र लक्ष्मण उनके साथ रहते हैं।

भगवान राम, सभी को छोड़कर भाई भरत की ओर आगे बढ़ते हैं तो भरत जी की तंद्रा टूटती है और वो भी गौधूलि में अपनी गौमाता की ओर दौड़ते बछड़े के समान अपने ईष्ट की ओर दौड़ लगा देते हैं। भगवान राम उन्हें अपनी ओर आता देख बाहें खोल देते हैं लेकिन भरत जी उनके चरणों में पड़ जाते हैं।

अहा !! कैसा मनोरम दृश्य, कितने बड़भागी होते हैं वो जिनके लिए स्वयं प्रभु श्रीराम अपनी भुजाएं खोल स्वागत करते हैं और कितने सौभाग्यशाली वो लोग जिन्हें उनके चरणों में आश्रय मिलता है। कितने ही प्रयासों के बाद, प्रभु ने भरत जी को उठा अपने हृदय से लगा लिया। भरतजी की हिचकियाँ बंद ही नहीं हो रही थीं तो भरत जैसे प्रेमी भक्त को पाकर भगवान के आंसू भी नहीं रुक रहे थे। जब दोनों प्रकृतिस्थ हुए तो राम को अपनी भूल का आभास हुआ और वो दौड़ कर माताओं के चरणों में पड़े। अपने गुरुजनों के साथ मंत्रियों के चरणस्पर्श कर राम अपने बालसखा वशिष्ठपुत्र सुयज्ञ के चरणस्पर्श करने बढे लेकिन सुयज्ञ ने उन्हें इसका अवसर ही नहीं दिया और उनके ह्रदय से लग बिलख कर रोने लगे।

अनेकों वर्षों बाद, आज सभी के मुख पर हँसी थी और नेत्रों से जल बह रहा था। मंत्री सुमंत इतने में रथ ले आये थे। सूर्य के समान दैदीप्यमान रथ पर श्रीराम आरूढ़ हुए। सारथी का स्थान भरत जी ने लिया। शत्रुघ्न ने छत्र पकड़ लिया। चंवर डुलाने के लिए एक ओर सौमित्र लक्ष्मण खड़े हुए तो दूसरी ओर चंवर डुलाने के लिए राक्षसराज और वानरराज लपकते हुए आगे बढे किन्तु यहाँ भाग्य राक्षसराज का प्रबल रहा। अतः रथ के आगे दंड पकड़कर महाराज सुग्रीव चलने लगे। हनुमान जी ने सुझाव दिया कि आप अंगरक्षक के रूप में गजराज पर चढ़कर आगे आगे चलें। सुग्रीव गजराज पर चढ़कर आगे आगे चले और दंड वज्रांगी ने पकड़ लिया। माता सीता सुग्रीव की पत्नियों सहित दूसरे रथ पर चढ़ीं। उन रथों के पीछे सहस्त्रों गजों और अश्वों पर रीक्ष, वानर राक्षस चले। अपनी पलकों में अपने राम की छवि संजोने अयोध्या प्रतीक्षारत थी।

श्रीराम का रथ अयोध्या में प्रवेश करते ही जनता ने हर्ष उद्घोष किया। मंगलगान से वायुमंडल गुंजायमान हो उठा। मंदिरों और घरों से होती शंखध्वनि हो रही थी। कैलाशपति नृत्य करने लगे। देवताओं ने पुष्पवर्षा की।

श्रीराम ने अपने भाइयों सहित अनेक वर्षों तक राज्य किया। सभी राक्षस और वानर अपने राज्यों को लौट गए परन्तु हनुमान श्रीराम को छोड़ जा न सके। माता सीता भी उन्हें पुत्रवत मानती थी। अयोध्यावासियों के नेत्रों में वह दृश्य सदैव-सदैव के लिए चित्रित हो गया जहाँ महाबाहु श्रीराम जगतजननी सीता के साथ सिंहासन पर बैठे हैं, दाएँ-बाएँ दयालु भरत और सौमित्र लक्ष्मण चँवर डुलाते तथा पीछे छत्र पकड़े शत्रुदमन शत्रुघ्न खड़े हैं, और श्रीचरणों में प्रणाम की मुद्रा में हैं रुद्रावतार वज्रांगी।

दीपावली आई है। अयोध्याजी लाखों दीयों से जगमग हैं। धन्य हुई अयोध्याजी !!

छोटी दीवाली अर्थात उत्सव, हर्ष और उल्लास!!

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दीपावली – पर्व है जीवन के मंगलगान का। दीप जला अंधेरों को दूर करने का ये महापर्व सनातन का शिखरबिन्दु है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के अयोध्या आगमन का ये महापर्व मन को अपार आनंद से प्रफुल्लित करने का पर्व है। अयोध्या में आज नौ लाख दीये राम की पैड़ी पर जलाये गए है और संपूर्ण अयोध्या में बारह लाख दीप प्रज्वलित किये गए हैं। आस्थाओं के चरम और परम बिंदु का पर्याय है दीपावली। सनातन का सबसे बड़ा त्यौहार है दीपावली जो पांच दिन हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। आज उस महापर्व का दूसरा दिन, छोटी दीपावली है जिसे नरक चतुर्दशी भी कहा जाता है।

आज के पर्व का नाम छोटी दीवाली
आज के पर्व को छोटी दीवाली भी कहा जाता है क्यूंकि आज दीप प्रज्वलित किया जाता है और दीपदान किया जाता है। घरों में देवी देवताओं की पूजा आराधना कर दीप जलाकर रौशनी की जाती है। आज के दिन मिष्ठान बनाये जाते हैं और उनका आनंद लिया जाता है। यही सनातन की सुंदरता है, स्वास्थ्य एवं समृद्धि की मनोकामना के साथ लोग एकजुट हो उल्लसित हो अपनी परम्पराओं को अनुशासन के साथ निभाते हैं।

छोटी दीवाली या नरक चतुर्दशी
दीपावली महापर्व के द्वितीय दिवस को छोटी दिवाली अथवा नरक चतुर्दशी भी कहा जाता है। इस दिन रुद्रावतार महावीर हनुमान जी की पूजा का विशेष महत्व है। आज के दिन पूर्वजों की शांति के लिए भी पूजन किया जाता है। मान्यता है की आज के दिन श्रद्धा और भक्तिपूर्वक ईशप्रार्थना करने वाले व्यक्ति को नरक से मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति होती है जिस कारण इसे नरक चतुर्दशी कहते हैं।

सनातनी सुंदरता का ये महापर्व अपने संपूर्ण यौवन के साथ आया है। लाखों दीयों जगमग के साथ रात से अँधेरे दूर हैं। चहुंओर प्रसन्नता है, उल्लास है, आनंद है। इसी मंतव्य से इस महापर्व को मनाइये, दीपावली पर्व है मुस्कुराने का, मुस्कुराइये !!

वात्सल्य परिवार की ओर से खुशियों के महापर्व, छोटी दीवाली की सभी धर्मावलम्बियों को अनंत शुभकामनाएँ उत्सव, हर्ष और उल्लास!!

धनतेरस: स्वस्थ समाज का चरम बिंदु

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सनातन उत्सव का धर्म है। उल्लास और हर्ष इस समाज के प्रतीक हैं। जितने तीज और त्यौहार सनातन धर्म में मनाये जाते हैं, उतने किसी भी अन्य पंथ, मत और संप्रदाय में नहीं। आज धनतेरस है। धन को अर्थ का एक प्रतिरूप माना जाता है जबकि सनातनी संस्कृति में अर्थ के अतिरिक्त आरोग्य और स्वास्थ्य को भी धन के रूप में महत्व दिया गया है। इसीलिए धनतेरस को भगवान नारायण के अवतार भगवान धन्वन्तरी की जयंती मनाई जाती है।

भारतीय संस्कृति में स्वास्थ्य एवं आरोग्य का महत्व, धन से अधिक रहा है। यह कहावत आज भी प्रचलित है कि ‘पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख घर में माया’ इसलिए दीपावली में सबसे पहले धनतेरस को महत्व दिया जाता है। यही सनातन संस्कृति है जिसका मत अनुशासित जीवन पद्धति है, जो आरोग्य महत्व निश्चित करती है।

समुद्र मंथन के दौरान कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन भगवान धन्वन्तरी अपने हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। मान्यता है कि भगवान धन्वंतरि विष्णु के अंशावतार हैं। संसार में चिकित्सा विज्ञान के विस्तार और प्रसार के लिए ही भगवान विष्णु ने धन्वन्तरी का अवतार लिया था। भगवान धन्वन्तरी के प्रकट होने के उपलक्ष्य में ही धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है।

सनातन धर्म में त्योहारों का वैज्ञानिक महत्व है। इनके मानने के कारण और आधार वैज्ञानिक हैं। धनतेरस के दिन झाड़ू लेकर आने का विधान होता है। झाड़ू प्रतीक है स्वच्छता की, स्वच्छता से उत्तम स्वास्थ्य निर्मित होता है क्यूंकि चहुंओर सफाई से बीमारी पैदा करने वाले कीट पतंगों के साथ डेंगू मलेरिया का भी भय व्याप्त होता है। सफाई होने से इन कीट पतंगों के साथ बीमारी पैदा करने वाले मच्छर भी नष्ट होते हैं जिस कारण स्वस्थ समाज निर्मित होता है।

बाजारों में खरीदारी अन्य दिनों से अधिक होती है जिससे आर्थिक दृष्टि से सरकारों की कर आधारित आय में भी बढ़ोत्तरी होती है जिससे गरीबों के निमित्त योजनाओं को अधिक सबलता के साथ क्रियान्वयित किया जाता है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि धनतेरस प्रतीक है सनातनी दिग्दृष्टि का, समाजोत्थान का, सबके विकास का और स्वास्थ्य को सबसे बड़ा सुख और धन मानने की विचारधारा का। धनतेरस आगमन है दीपावली का, जिससे सुख समृद्धि की प्रतीक माँ लक्ष्मी धरती पर आती हैं, सभी पर अपनी कृपा बरसाती हैं। धनतेरस अर्थात सुख, सौभाग्य और समृद्धि का संस्मरण। धनतेरस अर्थात आरोग्य आधारित समृद्ध समाज का निर्माण जिसमें ‘आरोग्यं धन सम्पदा’ का आह्वान किया जाता है।

धनतेरस की प्रामाणिक कथा:-
दानवों का राजा बलि बहुत पराक्रमी राजा था। कहते हैं कि राजा बलि के भय से देवता सदैव त्रस्त रहते थे। आज के दिन, बलि के भय से देवताओं को मुक्ति मिली थी और बलि ने जो धन-संपत्ति देवताओं से छीन ली थी उससे कई गुना धन-संपत्ति देवताओं को मिल गई। इस उपलक्ष्य में भी धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है।

धनतेरस और स्वर्ण

धनतेरस के दिन सनातन समाज में स्वर्ण क्रय केंद्रों में अधिकाधिक मात्रा में क्रय होता है। कहा जाता है कि इस दिन स्वर्ण आभूषणों का आगमन घर में सौभाग्य और समृद्धि लेकर आता है। जीवन में माँ लक्ष्मी की उपस्थिति सहज सुलभ हो जाती है। इस दिन लिए गए आभूषण पहन महिलाएँ स्वयं माँ लक्ष्मी का रूप पाती हैं, उनके होने से ही घर मंदिर सा पुण्यतीर्थ हो जाता है। ये है सनातन की सुंदरता, जहाँ महिलाओं का सम्मान ही पुरुष के पौरुष का चरम बिंदु है, जिसमें कठिन परिश्रम से अर्जित किये गए धन से जो आभूषण क्रय किये गए हैं, वो निमित्त हैं ‘नारी तू नारायणी’ जैसी विचारधारा के।
ये है धनतेरस का सामाजिक महत्व, जिसमें महिलाओं का सम्मान ही धर्म को धारण करने का एक साधन है। यही है धनतेरस जिसमें महिलाओं के सम्मान से ही सुख समृद्धि अर्जित की जाती है, का भाव हर क्षण सभी को सदैव धारण किये रहता है।