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मीरा माधव का द्वार: वात्सल्यग्राम का अलौकिक संसार

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विवाह – एक परिणय सूत्र में बंधे सिर्फ दो व्यक्तियों के एक साथ जीवनयापन करने की सामाजिक व्यवस्था का ही नाम नहीं है, ये नाम है दो कुलों के एक होने का। पाणिग्रहण संस्कार से पावन क्या है जिसमें एक युवती अपने पिता के घर से ब्याह कर अपने घर प्रस्थान कर जाती है, एक नए घर को अपनी उपस्थिति से सजाने, सँवारने, अपने संस्कारों की पावन महक बिखेरने। सनातन में इस संस्कार को बहुत प्रमुखता से निभाने की प्रथा है क्यूंकि विचारों के न मिलने पर भी यहाँ संबंध विच्छेद नहीं होते, शायद इसीलिए डिवॉर्स शब्द का हिंदी शब्दमाला में कोई शाब्दिक अर्थ नहीं मिलेगा आपको।

विवाह तय होने के बाद सबसे जरुरी होता है विवाह स्थल का चयन। विवाह स्थल की शुचिता, स्वछता, आसपास का माहौल भी ध्यान में रखा जाता है क्यूंकि एक पावन कार्य के शुभारंभ पर काफी कुछ टिका होता है।

मीरा भी माधव से विवाह करना चाहती थीं। बचपन में ही माधव को अपने पति के रूप में स्वीकार चुकी थीं। अपने सच्चरित्र एवं शुचितामय जीवन के तप के प्रभाव राणा के विष मीरा पर कोई प्रभाव न पड़ा था। धर्म के अन्यत्र उनका समाज में अप्रतिम योगदान है। उनके भजनों ने सनातन को जनमानस के अंतस में चिरायु रखा। आक्रांताओं के जबरन धर्मांतरण के बाद भी लोग सनातन यदि नहीं छोड़ना चाहते थे तो उसके मूल में भक्तिकाल के संतों का बहुत बड़ा योगदान है।

मीरा सशरीर माधव के विग्रह में जा मिली थीं। मीरा और माधव आज भी एक हैं। एक है उनका निलयम, जिसमें मीरा के भजन सुन माधव आनंदित होते हैं। निलयम एक तमिल शब्द है, जिसका अर्थ है घर। संस्कृत के बाद, विश्व की सबसे पुरानी और शाश्वत भाषा है तमिल। उस निलयम में मीरा हैं, जहाँ माधव सुनते हैं, मीरा गाती हैं। माधव रूठते हैं, तो मीरा मनाती हैं, माधव कहते जाते हैं तो मीरा सुनती जाती हैं। कदाचित माधव उनसे अपने प्रेम के देहहीन रूप की प्रासंगिकता को स्थापित करने के उद्देश्य के लिए किये प्रयत्नों की चर्चा करते हों, या मीरा उनके मोरपंख को माथे पर सजाने की कथा का वर्णन पूछती हों। मीरा और माधव यूँ ही पहरों बैठे उस भाव को जीते हों, जिसके लिए द्वारिकाधीश योगेश्वर कृष्ण को कान्हा और कन्हैया बनना पड़ता हो।

रुक्मणी और राधा के प्रेम के इतर, मीरा का माधव के लिए प्रेम अलग था। जहाँ रुक्मणी को परमयोद्धा, ब्रह्माण्डनायक योगिराज द्वारिकाधीश की प्राप्ति हुई, तो राधा को उनके नटखट धेनु चराते बांसुरीवादक कृष्ण की। ये ग्वाला कहीं भी माखन मिश्री के लिए मटक देता है तो वो ईश्वर सबको अपनी उँगलियों पर नचाता है। इन दोनों ही ठकुरानियों को पूरे कृष्ण नहीं मिले। रुक्मणी हमेशा उनके बालरूप के दर्शनों के लिए तरस गईं तो राधारानी ने उन्हें योद्धा और राजा के रूप में कभी न पाया। मीरा को ये दोनों रूप मिले, उन्हें सशरीर श्रीकृष्ण ने मोक्ष प्रदान किया।

परमधाम वृन्दावन के सेवाप्रकल्प वात्सल्यग्राम में मीरा माधव के इसी रूप की परिकल्पना की गई है। इस मंदिर में नाम से एक आध्यात्मिक रिसॉर्ट भी बनाया गया है जिसके केंद्र में है ये मीरा माधव का धाम। इस रिसॉर्ट का नाम है, मीरा माधव निलयम।

वृन्दावन के दर्शनीय स्थलों में से एक वात्सल्यग्राम में स्थिल इस विवाहस्थल में यूँ तो बहुत कुछ वांछनीय है लेकिन कुछ चीजें हैं जो इसे आम लोगों के लिए ख़ास बनती हैं। मथुरा-वृन्दावन मार्ग पर स्थित ये विवाहस्थल अपने सजावट, नैवैद्यम नामक रेस्टॉरेंट में मिलने वाले प्रसादम के लिए प्रसिद्द है लेकिन इसकी अनुपम छटा इसे अद्वितीय अप्रतिम और अलौकिक बना देती है।


यहाँ भोजन को प्रसादम कहा जाता है और यही कारण है कि नैवैद्यम में बनने वाले भोजन को पूर्णतः सात्विक और शुद्धता के उच्च मानकों पर ही बनाया जाता है। यहाँ मिलने वाले भोजन की एक और खास बात है कि ये प्याज और लहसुन मुक्त भोजन है क्यूंकि वृन्दावन और मथुरा में प्रवास करने वाले साधुजन प्याज/लहसुन का सेवन वर्जित मानते हैं, उसी ऋषि परंपरा को दृष्टिगोचर करते हुए यहाँ प्याज/लहसुन पूर्णतः वर्जित है। कमरे बड़े और हवादार हैं। कमरों में वातानुकूलित यंत्र की भी समुचित व्यवस्था है। स्वछता इस स्थल की प्राथमिकताओं में है और थका देने वाले उत्सव के बाद आरामदायक शांति और सुरक्षा इस स्थल की विशेषता है।

आपकी आवश्यकताओं के अनुसार यहाँ बड़ा और विशाल बैंक्वेट हॉल है तो बाहर विशाल लॉन भी, जिसमे विवाह जैसे महापर्व की तैयारी कर विवाह को आनंदोत्सव में परिवर्तित कर दिया जाता है। बैंक्वेट हॉल में एक साथ 200 से अधिक लोगों के बैठने की व्यवस्था है। चौंसठ कमरे भी चार तलों पर उपयुक्त रूप से उपस्थित हैं।

सोचिये जिस जगह विवाह जैसे कार्यक्रम हो, वहां पहले से मीरा माधव का मंदिर हो, साथ में उसी स्थल पर माँ सर्वमंगला का मंदिर बन रहा हो जिसमें तीन गुणों, सत रज और तम की अवधारणा के साथ मंदिर निर्माण हो रहा हो, जहाँ प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक प्रकाश से जीवन आनंद से परिपूर्ण हो रहा हो, उससे अच्छा विकल्प कहीं और कैसे हो सकता है?

अगर आप डेस्टिनेशन वेडिंग का विचार कर रहे हैं तो मीरा माधव निलयम से उपयुक्त विकल्प आपको नहीं मिलेगा, आइये और अपने सपनों को पर लगते देखिये मीरा माधव के इस परमधाम में।

संविद गुरुकुलम में मनाया गया गणेशोत्सव

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पर्व और उत्सव हमारे महान देश की अनूठी प्रस्थापना हैं। उत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठानों और रीति-रिवाजों के प्रदर्शन तक ही सीमित नहीं होते हैं। उत्सव लोगों को अपने रिश्तों को नए आयामों में जोड़ने, संवाद करने और समन्वय करने में मदद करते हैं, नीरस दिनचर्या को तोड़ते हैं, जीवन में प्रसन्नता भरते हैं और हमारे जीवन में जीवंत रंग और खुशियाँ लाते हैं।

इन सभी पर्व-उत्सवों में से, गणेश चतुर्थी सबसे मनाया जाने वाला महापर्व है। इस दिन भगवान गणेश का जन्मदिन होता है। इस त्योहार को विनायक चतुर्थी या गणेशोत्सव के नाम से भी जाना जाता है।

इस महापर्व के उपलक्ष्य में, समविद गुरुकुलम के विद्यार्थियों ने भी इस पर्व को बड़ी धूमधाम से मनाया। कार्यक्रम की शुरुआत स्कूल परिसर में गणेश प्रतिमा की स्थापना के साथ हुई। छात्रों और शिक्षकों द्वारा गणेश का स्वागत किया गया, उसके बाद आरती के साथ रंगारंग कार्यक्रमों के माध्यम से छात्रों ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।

गणेश को बुद्धि का देवता माना जाता है। वह हमें एकाग्र रहने और नियमित अध्ययन पर बेहतर ध्यान केंद्रित करने का आशीर्वाद देते हैं। सुख देने वाले और दुखों को हरने वाले देव हैं गणेश। अपने साथ रिद्धि और सिद्धि का आशीर्वाद देते हैं। प्रथम पूज्य गणेश जगतपालक हैं तो वही सम्पूर्ण जगत भी हैं। माता पिता के आशीष में, जगत में पूज्यनीय बना देने की क्षमता है। गणेशजी इस तथ्य को चरितार्थ करते हैं। सामाजिक दृष्टिकोण में माता पिता की अनिवार्यता के साथ, उनकी संतुष्टि की अनिवार्यता को बल देने वाले देव हैं गणेश। जिनकी उपस्थिति मात्र किसी भी कार्य के निर्विघ्न संपन्न होने की निश्चितता कर दे, वो देव हैं गणेश। संकट हरते, सुख करते, दर्शन मात्र से मनकामना की पूर्ति करते हैं गणेश।

सांस्कृतिक कार्यक्रम

सनातनी राष्ट्रवाद का परम एवं चरम बिंदु है गणेशोत्सव। भारतीय सनातनी समाज को विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा देने के विचार के साथ बालगंगाधर तिलक ने इसकी शुरुआत की थी, देखते ही देखते ये सम्पूर्ण महाराष्ट्र और भारत में मनाया जाने लगा।

पूजन

संविद गुरुकुलम के छात्र हमेशा ऐसे आयोजनों में बहुत रुचि लेते हैं। इस तरह के आयोजनों का मकसद अपनी महान संस्कृति से जुड़े रहना और इस दुनिया को रहने के लिए एक बेहतर जगह बनाना है। छात्रों में इस प्रकार के आयोजन उनकी संस्कृति से जुड़ाव के लिए बहुत आवश्यक हैं।

गीत गायन

कार्यक्रम में बच्चों ने गणेश वंदन के साथ उनके गीतों पर सांस्कृतिक प्रस्तुतिकरण के साथ अपने विचार भी व्यक्त किये। साथ में प्राचार्या श्रीमती आस्था जी ने भी अपने विचारों से छात्रों को अवगत कराया।

आप सभी को गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएं!!

संस्कारम – आज की अनिवार्यता, कल का आनंद

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एक देश के रूप में भारत एक विश्व शक्ति बन चुका है और आर्थिक पैमाने पर बढ़ता सकल घरेलु उत्पाद भी इस बात की ओर इंगित करता है कि आने वाली सदी, एक देश के रूप में, भारत की ही होगी। आर्थिक एवं व्यावसायिक स्तर पर देश की प्रगति, खुशहाल समाज की ओर हमारे कदमों को मजबूत करती है लेकिन एक समाज के रूप में भी, क्या हम उतने ही सुदृढ़ हो पा रहे हैं?

कोरोना काल में लोगों का अपने माँ बाप को अकेले छोड़ देना, हुतात्माओं को अंतिम संस्कार के लिए प्रियजनों का न होना, लगातार बढ़ते आपराधिक प्रसंग, सामाजिक असुरक्षा के शिकार बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे, हमारे संवेदनहीन समाज का कुरूप चेहरा दिखाते हैं। हमें ये बताते हैं कि आर्थिक सफलता, यशस्विता और प्रसिद्धि ही सब कुछ नहीं है। संस्कारों की पौध का अगली पीढ़ी में रोपण भी उतना ही अनिवार्य है जितना आर्थिक एवं व्यावसायिक उन्नत होना।

पिछले दिनों एक पुत्र ने अपनी माँ का अंतिम संस्कार ये कहकर नहीं क्या कि उसने(पुत्र ने) धर्म परिवर्तन कर लिया है और माँ को धर्मान्तरित व्यक्ति के धर्मानुरूप अंत्येष्टि क्रिया में सम्मिलित किया जाये। विवाद बढ़ने की स्थिति में महिला की पौत्री हजार किलोमीटर का सफर तय कर आई और अंत्येष्टि की गई। एक अन्य प्रसंग में एक महिला की कुछ महीने पुरानी लाश का संस्कार पड़ोसियों ने किया क्यूंकि पुत्र अमरीका में नौकरी करता था। महिला अकेले रहती थी।

ये एक नई समस्या है जो हमारे समाज के सम्मुख मुँह बाए कड़ी है। इन समस्याओं का यदि कोई शाश्वत समाधान है तो वो है बच्चों को संस्कारों के उचित मार्ग पर लाना, उन्हें संवेदनशील बनाना अपने रिश्तों के प्रति, अपने मित्रों के प्रति, अपनी जलवायु, प्रकृति, पशुपक्षियों के प्रति, उन्हें उन्नत किया जाये संस्कारों की निधि से, उनके हाथ चलें तो संवेदनाओं की महक उठे, उनका हर क्रियाकलाप ये देख कर हो कि उसका निकटवर्ती ही नहीं दूरगामी भी, परिणाम कहीं हमें या अन्य किसी को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित तो नहीं करेगा।

वृन्दावन नगर के वात्सल्यग्राम में परमपूज्या साध्वी दीदी माँ ऋतंभरा जी का प्रवास है जहाँ उनकी प्रज्ञा और मेधा का लाभ, संविद गुरुकुलम में अध्ययनरत बालक बालिकाओं को समय समय पर मिलता है। इन विशेष उद्देश्य से प्रायोजित कक्षाओं को संस्कारम के नाम से जाना जाता है और इन कक्षाओं का एकमात्र उद्देश्य इन भविष्य के उन्नत नागरिकों के मन में राष्ट्रप्रेम, अपनत्व, सहयोग एवं संवेदनशीलता का बीज रोपित करना है जिसके ब्रह्मांड बन जाने पर समस्त जगत उन शिक्षादीक्षाओं से गौरवान्वित हो सके।

संस्कारम की कक्षाओं में कोई कोर्स से संबंधित पाठ नहीं होता, वो तो बच्चे अपने विद्यालय में पढ़ ही लेते हैं लेकिन यहाँ उन्हें कहीं से भी प्राप्त न हो सकने वाला ज्ञान मिलता है जो उनके बालमन को अच्छी शिक्षाओं के माध्यम से प्रसन्न रहना सिखाता है, उन्हें बुजुर्गों के सम्मान और छोटों से प्रेम का जीवन में महत्व बताता है, उन्हें आने वाली चुनौतियों से अवगत कराता है, उनसे निपटने के उपाय बताता है। संस्कारम की कक्षाओं का महत्व, समाज की आधारभूत संरचना का संवर्धन करना है ताकि ये सभी बच्चे जब अपने अपने समाज में एक समझदार नागरिक बनकर रहें तो उन्हें सही और गलत की तार्किक समझ हो, वो एक नागरिक होने के अधिकारों से अधिक कर्तव्यों की चर्चा करें। एक सामाजिक इकाई के रूप में मुफ्त सुविधाओं का लाभ लेने की जगह लोगों को सहयोग करें।

संस्कारम एक प्रयोग है, जो अपने असर निश्चित रूप से आने वाले भविष्य में दिखाएगा किन्तु इसके प्रसार प्रचार के माध्यम से ऐसी अनेकों कक्षाओं की महती आवश्यकता हम सभी को है, ताकि एक सामाजिक सुरक्षा सभी को उपलब्ध हो, वृद्धाश्रमों में पलते बुजुर्गों की संख्या कम हो और सामाजिक स्तर पर हम विश्व की सबसे उन्नत श्रेणी में स्थान पा सकें।

असुविधाजनक सत्य के साहित्यकार दुष्यंत कुमार: वात्सल्यपूर्ण नमन

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हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गांव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

ये अश’आर हिंदी के सबसे बड़े गजल बुनकर, दुष्यंत कुमार के हैं। दुष्यंत कुमार होना एक परिकल्पना के यथार्थवादी अस्तित्व को पा लेना है। दुष्यंत कुमार की प्रासंगिकता अपने समय से अधिक आज है। उनकी गजलें, उनके गीत नौजवानों को प्रश्न पूछने और जागरूक बनने के हिमायती रहे। दुष्यंत का पहला कविता संग्रह जिस दौर में आया, उस दौर में शब्दों बाजीगरी के बड़े नाम मौजूद थे। हिंदी में अज्ञेय मुक्तिबोध की कविताओं के सूर्य थे तो धूमिल और बाबा नागार्जुन जैसे बड़े नाम समाज को जागरूक करते थे। भोपाली शायरों की गजलें अपने शिखर पर थीं।

दुष्यंत ने उस समय में अपनी एक नई साहित्यिक विधा उत्पन्न की, जिसने गजल कहने के अंदाज़ बदलकर रख दिए। दुष्यंत कुमार त्यागी अब सीधी, स्पष्ट और दो टूक कविताओं के लिए जाने लगे थे। अज्ञेय जैसे विद्वान को समझना मुश्किल था, कविताओं और गजलों को समझ आने लायक बनाने का शौर्य दुष्यंत कुमार के नाम पर है।

निदा फाज़ली (Nida Fazli), दुष्यंत कुमार के बारे में लिखते हैं, “दुष्यंत की नज़र उनके युग की नई पीढ़ी के ग़ुस्से और नाराज़गी से सजी बनी है. यह ग़ुस्सा और नाराज़गी उस अन्याय और राजनीति के कुकर्मो के ख़िलाफ नए तेवरों की आवाज़ थी, जो समाज में मध्यवर्गीय झूठेपन की जगह पिछड़े वर्ग की मेहनत और दया की नुमानंदगी करती है।”

दुष्यंत कुमार को उनकी ऊंचाई के स्तर से देखें तो वो गजल या कविता मात्र कहने वाले शायर या कवी नहीं हैं, वो आम आदमी के गुस्से का इजहार हैं, संवेदनहीन सत्ताओं से टकराने का हौसला हैं, जुनून का इंसानी रूप हैं, वो दुष्यंत कुमार हैं। इसकी बानगी यहाँ देखिये –

“मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग चुप कैसे रहूं,हर ग़ज़ल अब सल्तनत के नाम एक बयान है”

दुष्यंत कुमार समाज के प्रतिनिधि के तौर पर एक आम आदमी को देखते हैं। वस्तुतः कोई राजनेता या अधिकारी इस लायक कभी हुआ ही न हो –

“वो आदमी नहीं है मुकम्मल बयान है माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है”

सरकारी नौकरी करते हुए सरकारी तंत्र की आलोचना, वो भी इतनी कठोर? सरकारें ये कहाँ बर्दाश्त कर पाती हैं? उनके ऊपर होनी थी सो कार्यवाही हुई, लेकिन उनकी कलम की स्याही न सूखी। शासन की ढुलमुल रवैये पर उन्होंने लिखा था –

“कहां तो तय था चिराग हरेक घर के लिए,

कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।

यहां दरख्तों के साये में धूप लगती है,

चलो यहां से और उम्र भर के लिए।

वे मुतमइन है कि पत्थर पिघल नहीं सकता,

मैं बेकरार हूं आवाज के असर के लिए।”

सत्य कहने की असुविधा से उत्पन्न होने वाले खतरे सभी को झूट बोलने को प्रेरित करते हैं। अनेकों संकटों से भी विचलित न होने वाले इस महाकवि ने कुछ यूँ खुद को बयां किया – “इस शहर में वो कोई बारात हो या वारदात अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियाँ”ओजस्विता और जनमानस के कवि दुष्यंत कुमार जी की आज पुण्यतिथि है, आपको वात्सल्यपूर्ण नमन।

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की वात्सल्यमय शुभकामनाएं

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भारतीय जीवन दर्शन का परम एवं चरम सुख है, कृष्णमय होने का प्रयास करना। भारतीय आध्यात्म में जहाँ राम मर्यादाओं की अनगिनत डोर थाम बंध जाने का पर्याय हैं, कृष्ण बंधन तोड़ने की अप्रतिम शांति हैं। कृष्ण आये ही थे सबके बंधन तोड़ने। बंधन छद्म स्वार्थ का, संसार के मोह का, सुखों की अतृप्त तृष्णा का। कृष्ण जहाँ गए, बंधन तोड़ जीने की ध्यातव्य शिक्षा देते रहे। अपने विचारों, क्रियाओं और मानकों के उच्चस्थ प्रतिमानों को उन्होंने उन्मुक्त होकर गढ़ा।

अवतरित होते ही माँ देवकी और पिता वासुदेव जी के बंधन काट दिए। प्रेम के मानकों को देहविहीन बनाने हेतु मोरपंख को अपने शिरोधार्य किये। प्रेम अपनी श्रेष्ठतम अवस्था में मोर-मोरनी को प्राप्त करता है। लोक किंवदंतियों के अनुसार, बारिश में मोर के मुंह से गिरा हुआ पदार्थ खाकर मोरनी गर्भ धारण कर लेती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण चाहे कुछ भी रहे, लोक कथा के अनुसार, यही सत्य है, और भाव के आँगन में विज्ञान कहाँ ठहरता है? आध्यात्म अपने आप में सम्पूर्ण विज्ञान है और प्रेम की इसी परंपरा को आदर्श बनाने हेतु कृष्ण मोरपंख धारण किये हुए हैं।

कृष्ण का अवतार कारावास में इसी ध्येय से हुआ होगा। संसार को दासता के बंधनों से मुक्त करने को मामा कंस को गोलोकधाम पहुंचा दिया। उस प्रयास में कितने ही योद्धाओं को उस बांसुरी वाले ग्वाले ने धूल में मिला धूल कर दिया, वो भी अकेले। न कोई सेना, न कोई राजसी सहायता। ये कृष्ण होने की सामर्थ्य का संदेश था। कल का नटखट कान्हा, आज महावीर कंसजीत हो चुका था।

राधा को अपने गोकुलवासी साधारण कान्हा के साथ से आनंदित किया तो रुक्मणी को अपने महाराज द्वारिकाधीश रूप से। रुक्मणी को ग्वाला कान्हा की हंसी ठिठोली और माखन को मचलते रूप के दर्शन सदा दुर्लभ ही रहे तो राधा को ब्रह्माण्डनायक, महाराज द्वारिकाधीश से दूर रखा।

दैत्य नरकासुर की कैद से सोलह हजार बलत्कृत एवं परित्यक्त महिलाओं को सम्मान सहित अपनी रानी बनने का गौरव मेरे कान्हा के सिवा और कौन दे सकता था? उस नारकीय जीवन से इस सम्मान से सुसज्जित होने की अनंत आनंदकारी यात्रा का नाम ही है कृष्ण। ऐसा महानारिवादी विश्व में कोई और कहाँ हो सका? आत्मग्लानि के बंधन काटता है वो है कृष्ण।

जनमानस को प्रकृति से प्रेम करना भी तो कान्हा ने ही सिखाया। इंद्रदेव को रुष्ट कर, गोवर्धन पर्वत को जो पूजित करा दे वो कृष्ण, जिसने पर्यावरण सुरक्षा की महत्ता को भी दृष्टिगोचर किया होगा।

दुर्योधन की मेवाओं के अनुपम स्वाद को छोड़ विदुरानी के हाथ केले के छिलके खाने वाला कान्हा अपने संबंधियों के विरुद्ध धर्मयुद्ध को अपने मित्र अर्जुन को शिक्षोपदेश गीता जैसा महाकाव्य रच देता है। साधारण वार्तालाप का ऐसा काव्यात्मक वर्णन कि आने वाले हजारों वर्षों तक गीता मानव को मार्गदर्शित करती रहे। विदुराणी को कान्हा के आने का संदेह था लेकिन मन के कोने में एक आस भी थी कि कान्हा हस्तिनापुर आया है तो किंचित मिलने ही आ जाये। कान्हा अब राजनयिक के रूप में हैं, उनसे मिलने अनगिनत लोगों की भीड़ आई होगी, वो मुझसे मिलने क्यूँ आएगा।

इन्हीं वैचारिक उधेडबुनों में विदुराणी को मौसी की आवाज लगाता कान्हा पुकारता है। अपने श्रवण पर संदेह कर जाती हैं विदुराणी। भला जिसके दर्शनों को सारा हस्तिनापुर आ गया हो, वो मेरे लिए समय कहाँ निकाल सकेगा? अरे !! विदुराणी आश्चर्य एवं प्रसन्नता का कोई ओर छोर न था, मौसी कुछ खिला दे, सुबह से भूख लग रही है।

ये है मेरा कान्हा! इतना प्रेम, इतना विश्वास, इतनी श्रद्धा कि सम्पूर्ण संसार के छप्पन भोग को त्याग वो साधारण सा साग विदुर जी के घर खाता है।

कान्हा के लिए कौरवों से राजपाट ले पांडवों को सौंप देना कौन सा बड़ा कार्य था? वो चाहते तो क्षणभर में उस कुल का नाश कर देते जिसमें उनकी सखी, भक्त द्रौपदी का अपमान हुआ? लेकिन कान्हा को जनमानस को संदेश देना था। संदेश नारी के सम्मान की महत्ता का, संदेश नारी को भोग्य पदार्थ समझ लेने की धृष्टता का। पांडवों को द्रौपदी को दांव पर लगाने का दंड मिलना ही था, इसीलिए अर्जुन से धर्मराज तक को उस कसौटी पर कसा गया। धर्मयुद्ध करना पड़ा, अपनों के विरुद्ध, उस कुकृत्य के प्रायश्चित का ये कैसा उपाय था कान्हा? पूछा होगा अर्जुन ने भी। कान्हा ने हंस कर कहा,

“नारी के अपमान का हश्र यही होता है पार्थ! संपूर्ण कुल का विनाश ! यही सनातन की विशिष्टता है, नारी हमारे जीवन के केंद्र में है, सम्मान की सर्वोच्च उपमा, नारी होना है। वो मातृशक्ति है, प्रकृति है, जगतकल्याण की भावना वही है। नारी, इसीलिए जहाँ उसका सम्मान होगा, वहां देवताओं के निवास का विधान है पार्थ!”

कान्हा – विश्व का सर्वश्रेष्ठ नीतिनिर्धारक, मित्र, सारथी, महामानव, जो मित्रता करे तो ऊंच नीच के भाव त्याग दे। बड़े-छोटे के बंधन वो सुदामा से मित्रता कर तोड़ता है तो उसके उच्चतम आदर्श की प्रतिष्ठापना उन्हें अपने राजमहल में सम्मान देकर, उनके पैरों को अपने आंसुओं से धोकर करते हैं। उनके तीन मुट्ठी चावल के बदले उन्हें अनुपम प्रासाद, मणि माणिक्य, स्वर्णादि मुद्रा भंडार की भेंट देता है। सृजन और विनाश को अपने दोनों भुजाओं में लेकर चलने वाला कान्हा जब सृजित करे तो द्वारिका सी महानगरी स्थापित करे, विनाश पर आये तो अपने ही कुल का संहार कर दे।

कान्हा जी के जन्माष्टमी महापर्व की अशेष शुभ मङ्गलकामनाएं !!

वन्दे कृष्णं जगद्गुरुम!!

राजनीति के बाबूजी: आदरणीय श्री कल्याण सिंह जी को श्रद्धांजलि

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भारत की राजनीति का केंद्रबिंदु, पिछले तीन दशक से अयोध्या रही है। कभी इक्ष्वाकु वंश की राजधानी कालांतर में इतनी महत्वपूर्ण होगी, सतयुगीय भगवान श्रीराम चंद्रजी जी ने भी सोचा होगा? अयोध्या को उसका वास्तविक स्वरुप मिलने को है, राममंदिर अपनी दिव्य भव्यता के लिए अगले कुछ वर्षों में पहचाना जाएगा। विश्व पर्यटन के मानचित्र पर अयोध्या एक नवांकुर है जो पुष्पित, पल्लवित होकर राजकोष को राजस्व की सुगंध से महका देगा, जिसके कारण विकासकार्य निर्बाध रूप से आगे बढ़ेंगे। अयोध्या का अर्थ विकास और प्रगति होगा।

लेकिन अयोध्या के इस स्वप्नरूप के मूर्तरूप में परिवर्तित होने का सबसे बड़ा श्रेय जिन आदरणीय कल्याण सिंह जी को जाता है, उनका कल यानी 22 अगस्त को निधन हो गया। भारतीय राजनीति के बाबूजी चले गए। वे 89 वर्ष के थे। लखनऊ के संजय गाँधी पीजीआई में भर्ती थे। उन्हें संक्रमण एवं सांस लेने में तकलीफ की शिकायत थी।

श्री कल्याण सिंह जी

विभिन्न राजनितिक हस्तियों, जिनमें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री आदि ने शोकसंवेदनाएँ प्रकट कर उनके जाने को दुखद बताया। उत्तर प्रदेश में तीन दिवसीय राजकीय शोक की घोषणा की गई है।

बेहद सुलझे हुए एवं शिक्षा में शुचिता के विचारक श्री कल्याण सिंह जी ने नकलविहीन परीक्षा की संकल्पना की और परीक्षाओं में नक़ल रोकने को सारा प्रशासनिक अमला लगा दिया। ये सम्मान था, मेहनत का, शिक्षा को विद्या समझने का, ईमानदारी और स्वाभिमान के भावों को इससे बेहतर कोई कैसे सम्मानित कर सकता था।

आदरणीय कल्याण सिंह जी की एक और पहचान थी, जिसके लिए वो सदैव गौरवान्वित रहते थे। राम कारज हेतु उन्होंने अपनी सरकार का त्यागपत्र तक सौंप दिया लेकिन रामभक्तों पर गोलीबारी नहीं होने दी। इस आदेश के कारण उन्होंने ढांचा गिरने की जिम्मेदारी भी खुद ओढ़ ली। अपनी जिम्मेदारी मानते हुए, जेल भी गए लेकिन राममंदिर निर्माण का ध्येय जीवनभर ह्रदय में धारण किये रहे। कल्याण सिंह का जन्म 5 जनवरी 1932 को उत्तरप्रदेश के अतरौली में हुआ था. उनके पिता का नाम तेजपाल सिंह लोधी और मां का नाम सीता देवी था।

वृन्दावन के वात्सल्यग्राम की स्थापना में श्री कल्याण सिंह जी का अहम योगदान रहा। समाज की सेवा के इस अग्रणी प्रकल्प के संकल्पों को देखते हुए आदरणीय श्री कल्याण सिंह जी ने कानूनी जटिलताओं के समाधान में अग्रणी भूमिला निभाई।

श्री कल्याण सिंह जी

एक अग्रणी जननायक, नक़ल जैसी छोटी किन्तु चिंचित करती सामाजिक बुराइयों को दूर करते जननायक, अतुलित रामभक्त, पूर्व मुख्यमंत्री श्री कल्याण सिंह जी को वात्सल्य परिवार की ओर से अश्रुपूरित श्रद्धांजलि।

विश्व संस्कृत दिवस की शुभकामनाएं

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संस्कृत भारतीय संस्कृति की परिचायक भाषा है। संस्कृत एक परिष्कृत, वैज्ञानिक एवं संस्कारित भाषा है। आदिसंस्कृति की परिचायक संस्कृत विश्व की प्राचीनतम भाषाओँ में से एक है। इसका अपना स्वविकसित शब्दकोष है जिसमें १०० अरब से अधिक शब्द हैं। भारत की प्राचीनतम भाषा संस्कृत में भारत का सर्वस्व संन्निहित है। देश के गौरवमय अतीत को हम संस्कृत के द्वारा ही जान सकते हैं। संस्कृत भाषा का शब्द भण्डार विपुल है। यह भारत ही नहीं अपितु विश्व की समृद्ध एवं सम्पन्न भाषा है। भारत का समूचा इतिहास संस्कृत वाड्मय से भरा पड़ा है। आज प्रत्येक भारतवासी के लिए विशेषकर भावी पीढ़ी के लिए संस्कृत का ज्ञान बहुत ही आवश्यक है।

संस्कृत भाषा का अपना एक वैज्ञानिक महत्व है। नासा के वैज्ञानिकों के अनुसार संस्कृत एक सम्पूर्ण वैज्ञानिक भाषा है। प्राचीन भारत में बोल-चाल की भाषा में संस्कृत का ही उपयोग किया जाता था। इससे नागरिक अधिक और मानसिक रूप से अधिक संतुलित रहा करते थे। संस्कृत के मंत्रों का उच्चारण करते समय मानव स्वास्थ्य पर विशेष प्रभाव पड़ता है। मंत्रोच्चार के समय वाइब्रेशन से शरीर के चक्र जागृत होते हैं और मानव का स्वास्थ्य बेहतर रहता है। बहुत सी विदेशी भाषाएं भी संस्कृत से जन्मी हैं। फ्रेंच, अंग्रेजी के मूल में संस्कृत निहित है। संस्कृत में सबसे महत्वपूर्ण शब्द ‘ऊँ’ अस्तित्व की आवाज और आंतरिक चेतना एवं ब्रम्हाण्ड का स्वर है। प्राचीन धरोहर की खोज करने का मुख्य मापदण्ड संस्कृत है। संस्कृत की महत्ता को देखते हुए जर्मनी में 14 से अधिक विश्व विद्यालयों में संस्कृत का अध्ययन कराया जाता है।

संस्कृत विश्व की सबसे वैज्ञानिक भाषा है।नासा के वैज्ञानिकों के अनुसार संस्कृत आर्टिफिशयल इंटेलीजेस को नया आयाम देगी। विश्व संस्कृत दिवस पर आत्मीय बधाई।