श्री राम – मानस में मर्यादाओं के जीवंत रूप का नाम। जीवनशैली के आदर्शतम स्वरुप का प्रतीक। उच्चतम आस्थाओं के शिखर को छू लेती मानव जाति का श्रेष्ठतम बिंदु, जिसे वचन में बंधना अच्छा लगे, निभाना और भी प्रिय हो। प्रेम के वशिभूत हो शबरी के भी झूठे फल खाएं, अहिल्या सी शिला समान जड़ के हृदय में जीवंत आस्थाओं का समुद्र बहा दें,  भक्ति की नई रिचाओं को दिग्दर्शित करें, तो शत्रु के भी सम्मान का भान भी करें।

किसी व्यवस्था की श्रेष्ठतम अवस्था को प्राप्त करती स्थिति के संवाहक मेरे राम, जिनकी राज व्यवस्था प्रतिकात्मक रूप से मुहावरा हो जाए – रामराज्य, सुनकर ही मन में कलकल करती मंदाकिनी बह जाए।

राजा के लिए कुछ भी त्याज्य नहीं की अवधारणा के बीच, एकपत्निव्रत का निर्वाह करते मेरे राम, एक वचन के निर्वहन को खाक छान, जंगलों में वनवास काट दें।

पर्यावरण की महत्ता का अनुपालन देखिये, सीता के वियोग में पत्तियों और लताओं से भी सीता माँ का पता पूछते मेरे राम, संदेश देते हैं जनमानस को, कि जड़ नहीं चैतन्य हैं वनस्पति, पेड़, पौधे, मान कीजिये इनका भी।

बाली से बलशाली को त्याग, सुग्रीव से वंचित वनवासी की सहायता करते मेरे राम, वंचितों और पीड़ितों की सहायता को सदैव तत्पर, प्रण लेकर। सहायता करते हैं तो गिलहरी के परिश्रम को परख उसको फल भी देते हैं।

राम आदर्शतम मनोवृत्ति हैं, स्वीकार्यता की, प्रेम की, अपनत्व के एकाकी भाव की, परंपराओं के सतत निर्वाह की, त्याग और समर्पण की, संयम और संतुलन की। राम सा राजा और राम सा पुत्र- और कहाँ। राम सा साधक, राम सा साधन और राम सी साधना भी कहाँ? जो रोम रोम में रमे वो राम, जो मोह से मने, वो राम, राम मतलब रामत्व, जो बड़ा है खुद राम से, परिकल्पनाओं के सागर से विशाल हृदय, कमल से सुंदर राजीव नयन, रुप जिनसे रंग का दान मांगे, पौरुष के इकलौते वरदान – मेरे राम!!

आज प्रभु श्रीराम का माता जानकी के साथ विवाह हुआ था। विवाह पंचमी के रूप में उद्धृत इस तिथि का पौराणिक महत्व है। ‘सनातन विवाह’ से पुरातन और पावन व्यवस्था इस संपूर्ण सृष्टि में दूसरी कोई नहीं। इससे संबंध जोड़े जाते हैं, पीढ़ियों के लिए ही नहीं, युगों के लिए। आज भी मिथिला और अवध के निवासी आपस में खुद को एक दूसरे का संबंधी मानते हैं। हजारों वर्ष पूर्व हुआ वह विवाह कितना विराट, कितना महान और कितना अविरल होगा, जिसकी चर्चा आमजनमानस आज भी गाहेबगाहे कर ही लेता है। आज भारतवर्ष की आत्मा के प्राण सीता-राम के विवाह की वर्षगाँठ है।

इतिहास साक्षी है कि प्रभु श्रीराम ने जितना प्रेम माँ सीता से किया, युग युगांतर तक नहीं किया जा सका। कोई पुरुष अपनी पत्नी के वियोग में नहीं रोता, रोता भी हो तो लोकलाज के भय से अकेले में। आज के आधुनिक और नारीवाद के डिजिटल युग में भी कोई पुरुष किसी के सामने नहीं रोता क्यूंकि पुरुषत्व रूपी अहंकार रोक देता है, किंतु राम पेड़, पौधे, लता, पत्रादि को पकड़कर रोये। राम अपने समय के सर्वश्रेष्ठ योद्धा थे, उनके रुदन में सारी सृष्टि उनके साथ रो पड़ी होगी। ये राम का प्रेम और उस प्रेम का सामर्थ्य ही था जिससे आकृष्ट होकर वनक्षेत्र में भी, उनकी सहायक बनकर, वानरों और भालुओं की एक सेना आ खड़ी हुई। कितनी बड़भागी थीं माँ सीता जो उन्होंने राम का वरण किया।

आप सभी को विवाह पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ !!