कामधेनु गौ गृह का वात्सल्यमय महत्व

By July 17, 2021Uncategorized

सनातन धर्म और गौ को यदि एक-दूसरे का पूरक कहा जाए तो कुछ गलत नहीं होगा। गौ को पुरातन वैदिक संस्कृति के अनुसार माता रूप में पूजा जाता है। गौसेवा के लिए युगपुरुष भगवान श्रीकृष्ण भी गौपालक की लीला की थी। इससे गौसेवा का महत्व समझा जा सकता है।

वेदों से पुराणों तक, अनेकों महाग्रंथों में गौ का महत्व वर्णित है। संसार की संरक्षिका भी गौ को ही कहा गया है। गौ को हिंदुत्व दर्शन में माँ कहा गया है। माँ जो सहेजे, पोषण दे, पालन के साथ मातृत्व के भाव में अपना वात्सल्य लुटाये, वो गौमाता ही हो सकती है। शिशु के जन्मते ही, गौ दुग्ध से पोषित किया जाता है।

३३ कोटि, अर्थात प्रकार के देवताओं का वास गौमाता में कहा गया है। गौमाता को धन के रूप में माना जाता है। गौधन के संरक्षण, गौसेवा एवं गौपालन का चलन आज भी ग्रामीणांचल में प्रमुख रूप से है। प्रकृति और मानव के मध्य की एक प्रमुख कड़ी, गौमाता के अनेकों प्रसंग प्राचीन महाकाव्यों एवं ग्रंथों में मिलते हैं।

ज्योतिष विज्ञान के अनुसार, विवाह के लिए गोधूलि वेला सर्वोत्तम मानी जाती है। नवग्रहों की शांति में भी गौमाता की प्रमुख भूमिका होती है। आज भी भारतवर्ष के करोड़ों परिवारों में पहली रोटी गौमाता के लिए निकले जाने का विधान है। किसी शुभ कार्य के निष्कंटक संपूर्ण होने के लिए गौमाता को गुड़ खिलाने का प्रचलन है।

गौमाता का रूप कामधेनु है। कामधेनु जिसकी सेवा किसी भी वांछनीय फल की प्राप्ति में सहायक है। गौसेवा अनेकों कष्टों से मुक्ति दिलाती है। गौमाता वैज्ञानिक रूप से भी वातावरण की शांति एवं शुद्धि में सहायक है। वैसे भी गौमाता के रंभाने में जो स्वर निकलता है, उसमें ‘माँ’ की ध्वनि सुनाई देती है।

ऐसी ही अनेकों गौमाताओं की सेवा वात्सल्यग्राम के कामधेनु गौगृह में प्रतिदिन होती है। इन गौमाताओं की कुल संख्या लगभग २०० के आसपास है जिनसे वात्सल्यग्राम में पलते अनेकों बच्चों का पोषण होता है। इन गौमाताओं का आशीष ही इन बच्चों को प्रबुद्ध एवं विकसित करता है। वैसे भी कहा गया है कि गौमाता का दुग्ध बाल पोषण हेतु सर्वोत्तम है। इन गौमाताओं के प्रश्रयस्थल को कामधेनु गौ गृह कहा जाता है, जो वात्सल्यग्राम के मध्य में स्थित है।

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