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June 2021

स्वाधीनता आंदोलन के जनक चापेकर बंधु: वात्सल्यपूर्ण नमन

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समय था ईसवी 1897 और जगह थी पुणे। महामारी ने पुणे को अपने चंगुल में ले रखा था। प्रशासन से जनता को आशा थी सहयोग की, सहायता की, किन्तु प्रशासनिक अधिकारी जनता को पीड़ित और अपमानित ही करते रहे। उनके पूजास्थल में जूते पहन कर घुस जाना, प्रताड़ित करना उन्हें अच्छा लगता था। इन अधिकारियों में प्रमुख थे – जिलाधिकारी वाल्टर चार्ल्स रैंड तथा सहायक लेफ्टिनेंट एगर्टन आयर्स्ट।

हरिभाऊ चापेकर पुणे के सम्मानित सज्जन थे। उनके तीन पुत्र थे दामोदर हरि चापेकर, बालकृष्ण हरि चापेकर और वासुदेव हरि चापेकर। ये तीनों भाई तिलक को गुरु मानते थे और उसी प्रकार सम्मान देते थे। अत्याचार और अन्याय विषय के संदर्भ में लोकमान्य तिलक ने शिवाजी महाराज का उदाहरण देते हुए चापेकर बंधुओं से एक दिन प्रश्न किया कि शिवाजी महाराज ने अत्याचार का विरोध अपने समय में किया था लेकिन अंग्रेजों के अत्याचार के विरोध में तुम लोग क्या कर रहे हो? इस प्रश्न के बाद ही चापेकर बंधुओं ने विचार कर लिया कि पुणे की अस्मिता की रक्षा करने के लिए इन अंग्रेज अधिकारियों को दंडित करना होगा।

जिस घडी की प्रतीक्षा थी, वो अवसर लेकर आई। दिनांक 22 जून 1897 को पुणे के ‘गवर्नमेंट हाउस’ में महारानी विक्टोरिया के राज्यारोहण की हीरक जयंती मनाई जा रही थी। इसमें उक्त दोनों अंग्रेज अधिकारी भी आए हुए थे। दामोदर हरि चापेकर अपने भाई बालकृष्ण हरि चापेकर अपने एक मित्र महादेव रानाडे वहां पहुंच गए। अब प्रतीक्षा थी, सभास्थल से इन दोनों अधिकारियों के बाहर निकलने की। रात सवा 12 बजे के लगभग ये दोनों सभास्थल से बाहर निकले, और अपनी अपनी बग्गियों में सवार हो गए। अपनी योजनानुरूप, दामोदर हरि चापेकर अंग्रेज अधिकारी रैंड की बग्गी के पीछे चढ़ गए और समय व्यर्थ किये बिना उस अधिकारी को गोली मार दी। उधर बालकृष्ण हरि चापेकर ने आयर्स्ट पर गोली चला दी। गोली लगने से आयर्स्ट मौके पर ही मारा गया लेकिन रैंड अस्पताल में तीन दिन बाद मृत्यु को प्राप्त हुआ।

पुणे की उत्पीड़ित जनता के कष्टों का अंत करने वाले चापेकर बंधुओं की पुणे की जनता ने जय जयकार की। चापेकर बंधु फरार हो चुके थे। पुलिस की सामर्थ्य अनुसार खोजबीन के बाद भी उन्हें पकड़ा नहीं जा सका। अंततः इंटेलिजेंस सुपरिटेंडेंट ब्रुइन ने घोषणा की कि इन फरार लोगों को पकड़ने में मदद करने वाले को बीस हजार का ईनाम दिया जायेगा।

इस ईनाम के लोभ में दो भाइयों, जिन्हें गणेश शंकर द्रविड़ और रामचंद्र द्रविड़ कहा जाता था, ने चापेकर बंधुओं का सुराग अंग्रेज अधिकारी ब्रुइन को दे दिया। दामोदर हरि चापेकर पकड़ में आ गए, किन्तु बालकृष्ण हरि चापेकर का पता न लग सका। न्यायालय में मुकदमा चलाया गया, सजा सुनाई गई – फांसी। दामोदर हरि चापेकर ने सहर्ष सजा स्वीकार की। लोकमान्य तिलक उनसे मिलने आये और गीता की एक प्रति भेंट की। अप्रैल 1898 को वो हंसते हुए फांसी के फंदे पर चढ़ गए। फांसी चढ़ते हुए भी उनके हाथ में गीता की प्रति थी।

बालकृष्ण हरि चापेकर के कहीं भी पकड़ में न आने पर पुलिस उनके घरवालों को परेशान करने लगी। इन अत्याचारों के कारण बालकृष्ण जी स्वयं पुलिस थाने पहुंच गए। तीसरे भाई वासुदेव चापेकर ने अपने साथी महादेव गोविंद रानाडे को साथ लेकर द्रविड़ भाइयों को 8 फरवरी 1899 को द्रविड़ भाइयों को गोली मार दी। अंततः वासुदेव चापेकर को 8 मई और बालकृष्ण चापेकर को 12 मई 1899 को यरवडा कारागार में फांसी दे दी गई।

महान क्रांतिवीर महादेव गोविंद रानाडे को भी उसी यरवडा कारागार में 10 मई को फांसी पर लटका दिया गया जहां चापेकर बंधुओं का जीवन अंत हुआ था। इस महान क्रांतिपथ पर पथिक होने की प्रेरणा इन चारों युवकों को लोकमान्य तिलक द्वारा प्रवर्तित ‘शिवाजी महोत्सव’ तथा ‘गणपति महोत्सव’ से ही मिली थी। इन महोत्सवों का उद्देश्य ही था महाराष्ट्र के युवाओं को धर्म तथा राष्ट्र के लिए लड़ने हेतु प्रेरित करना। ये चारों युवक फांसी पर झूल तो गए लेकिन अंग्रेजी हुकूमत को ये संदेश दे गए कि भारत, भारतीयों का है। यहाँ शासन का अधिकार भारतीयों का ही है। यदि किसी प्रकार कोई विदेशी सत्ता भारत पर अधिकार कर अन्यायपूर्ण एवं अराजक शाशन करना चाहते हैं, तो उन्हें भारतीय युवाओं द्वारा प्रायोजित हिंसक विरोध का सामना करने हेतु भी तैयार रहना चाहिए।

अपने देश, समाज, परिवार एवं धर्म को अत्याचारों से बचाते चापेकर बंधु हों या महादेव गोविंद रानाडे, इस त्याग और समर्पण की दूसरी मिसाल मिलना मुश्किल है। इस अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना, गलत को प्रतिकार करना और खुद को मातृभूमि के लिए समर्पित करने के इस प्रण का ही नाम है क्रांति।

वात्सल्य परिवार की ओर से भावपूर्ण श्रद्धांजलि।

माँ गंगा की अवतरण कथा

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अयोध्या के महाराजा सगर की दो पत्नियां थीं जिनका नाम था केशिनी और सुमति। जब वर्षों तक महाराज सगर के कोई संतान नहीं हुई तो उन्होंने हिमालय में भृगु ऋषि की सेवा की। भृगु ऋषि ने उनकी सेवा से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान मांगने को कहा। सगर ने भृगु ऋषि से संतान प्राप्ति की इच्छा व्यक्त की। भृगु ऋषि ने आशीर्वाद देते हुए कहा कि तुम अनेकों पुत्रों के पिता बनोगे। तुम्हारी एक पत्नी से तुम्हें साठ हजार पुत्र होंगे और दूसरी पत्नी से तुम्हें एक पुत्र होगा और वही तुम्हारा वंश आगे बढ़ाएगा।

कुछ समय पश्चात रानी केशिनी ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम असमंजस रखा गया। सुमति के गर्भ से एक मांसपिंड उत्पन्न हुआ जो साठ हजार टुकड़ों में विभक्त हो गया। बाद में महीनों तक घी से भरे गर्म घड़ों में रखने पर इनसे साठ हजार बच्चों का जन्म हुआ। सगर के सभी पुत्र वीर एवं पराक्रमी हुए हुए किन्तु असमंजस निष्ठुर एवं दुष्ट था। राह चलते लोगों को प्रताड़ित करना उसे अच्छा लगता था। लोगों को सड़क से उठाकर सरयू में फेंक देता था।

महाराजा सगर ने भरसक प्रयास किए कि उनका पुत्र सद्मार्ग पर आगे बढे। धर्म और पुरुषार्थ के कर्मों में संलग्न रहे किन्तु कुछ भी परिवर्तन न होने पर उन्होंने असमंजस को राज्य से निष्कासित कर दिया। असमंजस के पुत्र का नाम था अंशुमान जो गुणों में अपने पिता से सर्वथा विपरीत था। वह धर्मोन्मुख, वेदों का ज्ञाता एवं दयालु था। अनेकों विद्याओं में निपुण अंशुमान कर्तव्यनिष्ठ था।

एक बार महाराजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ करने का प्रण किया। अनेकों महान ऋषिगण उपस्थित हुए किन्तु यज्ञ प्रारंभ होने से पूर्व ही इंद्र ने घोडा चुराकर महर्षि कपिल के तपोवन में छोड़ दिया। महाराजा सगर ने यज्ञ के घोड़े को ढूंढने में अपने सभी पुत्रों को लगा दिया, क्यूंकि उस घोड़े के बिना यज्ञ संभव नहीं था। अनेकों प्रयासों के बाद भी घोडा नहीं मिला तो महाराजा सगर ने अपने पुत्रों को फटकार लगाई क्यूंकि काफी समय व्यतीत हो चुका था।

पिता की फटकार से व्याकुल हुए पुत्रों ने सही गलत का भेद छोड़ पुनः अश्व की खोज प्रारंभ की। यहाँ वहां पृथ्वी की खुदाई करने लगे, लोगों पर अत्याचार बढ़ा दिए गए, पृथ्वी और वातावरण को नुकसान पहुंचाने लगे। पृथ्वी को कई जगह खोदने के बाद उन्हें वो अश्व महर्षि कपिल के आश्रम के पास दिखा। कपिल मुनि समीप ही तपस्या में लीन थे। घोड़े के मिलने से प्रसन्न उन राजकुमारों ने जब समीप में महर्षि को देखा तो उन्हें लगा कि ये घोडा महर्षि कपिल ने ही चुराया है, जिस कारण वो कपिल मुनि को मारने दौड़े। कपिल मुनि ने आंखें खोलकर उन्हें भस्म कर दिया।

जब बहुत समय बीतने पर भी सगर के पुत्र नहीं लौटे तो उन्होंने अपने पौत्र अंशुमान को उनकी खोज में भेजा। अंशुमान अपने चाचाओं को ढूंढ़ते हुए कपिल मुनि के आश्रम के समीप पहुंचे तो वहां उन्हें अपने चाचाओं की भस्म का ढेर देखा। अपने चाचाओं की अंतिम क्रिया के लिए जलश्रोत ढूंढ़ने लगे। गरुड़ देव ने उन्हें बताया कि किस प्रकार उनके चाचाओं को कपिल मुनि ने उनका अपमान करने पर भस्म कर दिया है। किसी भी सामान्य जल से तर्पण करने पर इन्हें मुक्ति नहीं मिलेगी। अंशुमान ने गरुड़ देव से इसका उपाय पूछा तो उन्होंने कहा कि स्वर्ग से हिमालय की प्रथम पुत्री गंगा के पृथ्वी पर अवतरण से ही सगर पुत्रों को मुक्ति मिलेगी।

अंशुमान यज्ञ के अश्व के साथ अयोध्या वापस आ गए और उन्होंने महाराजा सगर को सारी बात विस्तारपूर्वक बताई। सगर अपना राजपाठ अंशुमान को सौंपकर हिमालय पर तपस्या करने चले गए, जिससे कि पृथ्वी पर गंगा को लाकर अपने पुत्रों का तर्पण कर सकें। महाराजा सगर गंगा को पृथ्वी पर लाने में असफल रहे।अंशुमान भी अपना राज अपने पुत्र दिलीप को सौंपकर हिमालय तपस्या करने चले गए ताकि गंगा को पृथ्वी पर ला सकें। वर्षों तक तपस्या करने के बाद अंशुमान भी स्वर्ग सिधार गए परंतु गंगा को धरती पर न ला सके।

दिलीप भी अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तपस्या करने हिमालय गए जहाँ अपना सम्पूर्ण जीवन लगा देने के बाद भी वो गंगा को पृथ्वी पर न ला सके।

दिलीप के पुत्र भगीरथ, दिलीप के बाद राजा बने। भगीरथ एक धर्मपरायण एवं कर्तव्यनिष्ठ राजा थे। वर्षों तक संतान न होने पर वो अपने राज्य की जिम्मेदारी अपने मंत्रियों को सौंप हिमालय तपस्या करने निकल गए। बिना कुछ खाये पिये उन्होंने कठोर तप किया जिस कारण प्रसन्न होकर ब्रह्मदेव ने उन्हें वर मांगने को कहा। भगीरथ ने ब्रह्मदेव से अपने मन का प्रयोजन कहा जिसमें अपने पूर्वजों के तर्पण हेतु पृथ्वी पर गंगावतरण एवं अपने लिए संतान की इच्छा जताई। ब्रह्मदेव ने तथास्तु के साथ गंगा के तीव्र वेग की समस्या बताते हुए समाधान में महादेव शिवशंकर नाम का उपाय सुझाया। भगीरथ ने महादेव की तपस्या कर उन्हें भी प्रसन्न कर लिया। महादेव ने गंगा जटाओं में धारण करने पर सहर्ष सहमति जता दी।

अंततः देवनदी गंगा ने धरती पर अवतरित होने का निर्णय लिया। महादेव ने गंगा को अपनी जटाओं में समा लिया और जब उन्हें अपनी जटाओं से छोड़ा तो धाराएं निकलीं। तीन धाराएं पूर्व की ओर एवं तीन धाराएं पश्चिम की ओर बहने लगीं तथा एक धारा भगीरथ के पीछे चलने लगी। महाराज भगीरथ अपने रथ पर आगे आगे तथा गंगा की धारा उनके पीछे पीछे। रास्ते में जो कुछ आता, वो नदी में मिल जाता।

गंगा नदी के रास्ते में महर्षि जह्नु का भी आश्रम था जो गंगा के तीव्र प्रवाह में बह गया। इस पर महर्षि जह्नु को अत्यंत क्रोध आया और उन्होंने अपने योगबल से गंगा का सारा पानी पी लिया। इसपर महाराज भगीरथ एवं अन्य देवताओं ने महर्षि जह्नु से प्रार्थना की, कि जनकल्याण हेतु गंगा को मुक्त करें। देवताओं के इस प्रकार विनती करने पर महर्षि जह्नु ने गंगा को अपने कानों के द्वार से मुक्त कर दिया। इस कारण गंगा नदी को जाह्नवी भी कहा जाता है।

उसके बाद महाराज भगीरथ का पीछा करते हुए गंगा समुद्र की ओर बढ़ चली और अंततः सगर के पुत्रों की भस्म को अपने जल में मिला कर उन्हें सभी पापों से मुक्त कर दिया।

पापनाशिनी माँ गंगा के इस अवतरण दिवस पर वात्सल्य परिवार की ओर से सभी महर्षियों के श्री चरणों में शत शत नमन।

समाज के शैक्षणिक सहयोग को समर्पित: कृष्ण ब्रह्मरतन विद्यामंदिर

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मानव के व्यक्तित्व का निर्माण करती, वैज्ञानिक मानसिकता, तार्किकता, भावभंगिमाओं के साथ कलाओं का विकास करती इस शिक्षा का दोहन एवं शोषण भी होता है। व्यक्तिगत (प्राइवेट) प्राथमिक विद्यालयों के डोनेशन से लेकर मासिक अध्ययन शुल्क तक, इस शिक्षा को आम गरीब जन से दूर कर देते हैं। इसके बाद जो माध्यम बचता है, वो है सरकारी विद्यालय, जिनमें कहीं कहीं अच्छी शिक्षा मिल जाती है, लेकिन अधिकतर विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं पाती, यह भी एक सर्वविदित तथ्य है।

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महरानी लक्ष्मीबाई के जीवट को वात्सल्यपूर्ण नमन

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1857 का स्वाधीनता संग्राम अपने आप में एक अनूठा प्रयास था। संचार के साधनों का अभाव, हथियार और कुशल लड़ाकों के अभाव के साथ ही साथ सक्षम नेतृत्व का सर्वथा अभाव के बाद भी स्वाधीनता संग्राम की इस ऐतिहासिक लड़ाई ने अंग्रेजों की चूलें हिला दी थीं।

इस संग्राम की एक बहुत बड़ी मार्गदर्शक और प्रणेता थीं महारानी लक्ष्मी बाई। महारानी लक्ष्मी बाई साक्षात शक्तिस्वरूपा थीं। एक अकेली महिला जिसने ओरछा और दतिया राज्य की सम्मिलित सेनाओं को हराया, ग्वालियर जैसे बड़े राज्य की सेनाओं को हरा वीरता और सक्षम नेतृत्व का परिचय दिया। कुशल युद्धनीति की माहिर रानी लक्ष्मीबाई शस्त्र प्रशिक्षण की महिलाओं के लिए वकालत करती थीं।

अपने सिर को उठाकर चलने का नाम हैं रानी लक्ष्मी बाई। आरामदायक गुलामी से कष्टप्रद संघर्ष को चुनने वाली मूर्तरूप हैं रानी लक्ष्मीबाई। महिलाओं के सशक्तिकरण की साक्षात रूप हैं रानी लक्ष्मीबाई। मानवता के महिलारूप का नाम हैं महारानी लक्ष्मीबाई।

आधुनिक भारत की पहली महिला सशक्तिकरण का पर्याय रही हैं महारानी लक्ष्मीबाई। अंग्रेजों ने महारानी लक्ष्मीबाई को ६० हजार की पेंशन के साथ अन्य सुविधाओं का प्रस्ताव दिया था, जिसके जवाब में महरानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों को इंकार भिजवा दिया।

आज ही के दिन १८५८ को महारानी लक्ष्मीबाई का देहांत हुआ। ये उनकी जिजीविषा की पराकाष्ठा ही है जिसमें उनकी मृत्यु युद्धक्षेत्र में हुई। वात्सल्य परिवार की ओर से महामानवी महारानी लक्ष्मीबाई को शत शत नमन।

वैशिष्ट्यम:- एक कदम इंसानियत का

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नाम अंकित, उम्र पंद्रह साल, पता शेख सराय फेज वन न्यू डेल्ही सेवेंटीन। अंकित को डाउन’स सिंड्रोम है। अक्सर अपने घर आने वाले मेहमानों को देख कर परेशान हो जाता था। छुपकर किचन से झांकता जबकि साथ के रौशनी और विनय पढ़ या खेल रहे होते थे। बैंक में कार्यरत पिता और नार्थ कैम्पस में जॉब करती माँ उसका फ्यूचर सिक्यॉर करते करते झल्लाने लगे थे। अंकित को परेशान देख खुद परेशान रहने लगे थे। साउथ दिल्ली के डॉक्टर्स भी कुछ ख़ास कर नहीं पा रहे थे। ज़िन्दगी जैसे बैक गियर ले चुकी थी, आगे के बजाये पीछे चल रही हो, और अचानक एक चमत्कार हुआ। 

अंकित के पिता को वात्सल्यग्राम नामक जगह के बारे में बताया गया। जानकारी करने पर पता लगा कि वात्सल्यग्राम नामक उस जगह पर अंकित जैसे बच्चों की देखभाल के लिए एक वैशिष्ट्यम नाम का एक प्रोजेक्ट है जहाँ अंकित को रख कर देखा जा सकता है। 

आज 3 महीने हुए हैं यहाँ। अंकित अब मुस्कुराना सीख गया है। साथ के वैभव से उसकी अच्छी दोस्ती है। दोनों साथ खाते खेलते हैं और अब अंकित सही ही नहीं हो रहा बल्कि लिफाफे बनाना सीख गया है, जो यहाँ बच्चों को सिखाया जाता है। सॉफ्ट टॉयज बनाना और अर्टिफिशियल जूलरी बनाना भी सीखा है उसने। लेकिन ये हुआ कैसे?

वृन्दावन के वात्सल्यग्राम में वैशिष्ट्यम नाम का ये प्रकल्प चलाया जाता है जहाँ अंकित जैसे बच्चे रहते हैं।  यहाँ बच्चों का इलाज ही नहीं होता बल्कि उनके भविष्य के लिए एक उद्यमिता प्रकल्प भी चलाया जाता है जहाँ बच्चों को कुटीर उद्योगों की जानकारी देकर अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया जाता है। साथ ही में एक नन्ही दुनिया नाम का कृत्रिम प्रकल्प है जिसमें एक जंगल बनाया गया है जिसमे बच्चों की प्रकृति के साथ नजदीकी बढ़ाने की कोशिश की जाती है। इन बच्चों को यहाँ मुफ्त में रखा जाता है जिसमें उनकी सभी आवश्यकताओं को पूरा किया जाता है। भोजन, चिकित्सा, कंप्यूटर की दीक्षा, कुटीर उद्योगों की शिक्षा आदि सब कुछ इनके लिए यहाँ फ्री है जिसके लिए समाज के दानवीरों का सहयोग अभिवन्दनीय है। 

वैशिष्ट्यम: घर से दूर एक घर

इस लेख के माध्यम से लेखक का उद्देश्य किसी को मात्र दान के लिए प्रेरित करना नहीं है अपितु अंकित जैसे बच्चों की समुचित व्यवस्था, उपचार और सबसे जरुरी, सौम्य व्यवहार के लिए यहाँ लाने की जरुरत पर ध्यान आकृष्ट करना है। अंकित जैसे बच्चे जब अपने जैसे तमाम दूसरे बच्चों के साथ मिलकर कुछ सीखते हैं तो यकीं मानिये, साधारण बालक से ज्यादा बेहतर सीखते हैं, शायद इसीलिए विशिष्ट भी होते हैं, इन बच्चों को हमारी हमदर्दी नहीं सहयोग की जरुरत है। उन बच्चों की कोई बुनियादी जरुरत अधूरी न रहे, एक सभ्य समाज के नाते ये जिम्मेदारी हमारी है। आइये सहयोग का हाथ मिलाएं, फ़ोन उठाएं और वात्सल्यग्राम को नंबर मिलाएं। 

मीरा के माधव का द्वार – वृन्दावन में है ये अलौकिक संसार

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विवाह मनुष्य जाति के महत्वपूर्ण संस्कारों में से एक माना जाता है। भारतीय समाज में ये दो व्यक्तियों का ही नहीं अपितु दो परिवारों का बंधन माना जाता है जिसके अटूट होने का अर्थ है कि चाहे जितने भी मतभेद हों, विवाहित साथ में रहकर अपने विवाद सुलझा ही लेते हैं क्यूंकि हमारे समाज में संबंध विच्छेद जैसी कोई चीज नहीं। संबंधों को आत्मा के साथ बांध एक जिम्मेदारी होती है जिसमें एक दूसरे के साथ सबकुछ बांटा जाता है, भावनाओं के साथ।

विवाह करने से पहले विवाह स्थल की खोज बहुत जरुरी हो जाती है। गंतव्य स्थल तक सुगम पहुंच और उस स्थल का माहौल यदि शुद्ध और सात्विक हो तो वाह वाली फीलिंग बहुत आम हो जाती है। आज हम आपको एक ऐसे ही गंतव्य के बारे में बता रहे हैं जिसमें आपको मिलता है एक खास एहसास, मिटटी की सौंधी खुशबु और स्वादिष्ट व्यंजनों के साथ।

मीरा माधव निलयम – माधव का घर

मीरा माधव निलयम वृन्दावन की पावन रज में स्थित वात्सल्यग्राम में स्थित है। वृन्दावन के दर्शनीय स्थलों में से एक वात्सल्यग्राम में स्थिल इस विवाहस्थल में यूँ तो बहुत कुछ वांछनीय है लेकिन कुछ चीजें हैं जो इसे आम लोगों के लिए ख़ास बनती हैं। मथुरा-वृन्दावन मार्ग पर स्थित ये विवाहस्थल अपने सजावट, नैवैद्यम नामक रेस्टॉरेंट में मिलने वाले प्रसादम के लिए प्रसिद्द है लेकिन इसकी अनुपम छटा इसे अद्वितीय अप्रतिम और अलौकिक बना देती है।

यूँ तो आपने मीरा बाई के माधव के लिए दैविक प्रेम के बारे में जरूर पढ़ा सुना होगा लेकिन उनका माधव के साथ मंदिर बहुत जगह नहीं है, ये स्थल बनाया ही मीरा और माधव के नाम पर है जिसके साथ तमिल शब्द ‘निलयम’ जुड़ा है जिसका अर्थ है ‘घर’ अर्थात वह घर जहाँ मीरा और माधव रहते हैं, वियोग में नहीं किन्तु माधव के साथ उनके सामने मीरा भजन जाती हैं। सुनना हो तो एक बार यहाँ घूम कर जरूर आइये।

Meera aur Madhav

नैवैद्यम – सात्विक और स्वादिष्ट भोजन

यहाँ भोजन को प्रसादम कहा जाता है और यही कारण है कि नैवैद्यम में बनने वाले भोजन को पूर्णतः सात्विक और शुद्धता के उच्च मानकों पर ही बनाया जाता है। यहाँ मिलने वाले भोजन की एक और खास बात है कि ये प्याज और लहसुन मुक्त भोजन है क्यूंकि वृन्दावन और मथुरा में प्रवास करने वाले साधुजन प्याज/लहसुन का सेवन वर्जित मानते हैं, उसी ऋषि परंपरा को दृष्टिगोचर करते हुए यहाँ प्याज/लहसुन पूर्णतः वर्जित है।

किसी भी प्रकार के मादक पदार्थ का सेवन लोगों के यहाँ रहने के अधिकार को वंचित करता है और उन्हें बाहर भी निकाला जा सकता है।

केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र जी प्रधान

विवाह मंडप


विवाह में किसी भी प्रकार के व्यवधान से बचने के लिए एक विशेष मंडप की व्यवस्था मंदिर प्रांगण के समीप ही की गयी है जिससे विवाह जैसे पवित्र कार्य निर्विघ्न संपन्न हों और एक नवजीवन की शुरुआत पावन और पवित्र हो जाये।

हवादार और बड़े कमरे, वातानुकूलित स्वच्छ वातावरण

कमरे बड़े और हवादार हैं। कमरों में वातानुकूलित यंत्र की भी समुचित व्यवस्था है। स्वछता इस स्थल की प्राथमिकताओं में है और थका देने वाले उत्सव के बाद आरामदायक शांति और सुरक्षा इस स्थल की विशेषता है।

बैंक्वेट हॉल और बाहर खुला लॉन

आपकी आवश्यकताओं के अनुसार यहाँ बड़ा और विशाल बैंक्वेट हॉल है तो बाहर विशाल लॉन भी, जिसमे विवाह जैसे महापर्व की तैयारी कर विवाह को आनंदोत्सव में परिवर्तित कर दिया जाता है। बैंक्वेट हॉल में एक साथ 200 से अधिक लोगों के बैठने की व्यवस्था है। चौंसठ कमरे भी चार तलों पर उपयुक्त रूप से उपस्थित हैं।

सोचिये जिस जगह विवाह जैसे कार्यक्रम हो, वहां पहले से मीरा माधव का मंदिर हो, साथ में उसी स्थल पर माँ सर्वमंगला का मंदिर बन रहा हो जिसमें तीन गुणों, सत रज और तम की अवधारणा के साथ मंदिर निर्माण हो रहा हो, जहाँ प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिक प्रकाश से जीवन आनंद से परिपूर्ण हो रहा हो, उससे अच्छा विकल्प कहीं और कैसे हो सकता है?

अगर आप डेस्टिनेशन वेडिंग का विचार कर रहे हैं तो मीरा माधव निलयम से उपयुक्त विकल्प आपको नहीं मिलेगा, आइये और घूम कर देखिये। मीरा के माधव के धाम जैसी जगह है कहीं? कहीं नहीं।

भारतीय दर्शन और पर्यावरण के दर्शन कराता संविद गुरुकुलम

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भारतीय दर्शन, अध्यात्म एवं सामुदायिक परिवेश का केंद्रबिंदु पर्यावरण संरक्षण हैं। सुबह उठकर प्रातः स्मरण करने में हम माँ पृथ्वी से उसके ऊपर पैर रखने से पहले क्षमा मांगते हैं :-

समुद्रवसने देवि ! पर्वतस्तनमंड्ले ।

विष्णुपत्नि! नमस्तुभ्यं पाद्स्पर्श्म क्षमस्वे ॥

पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्धन, भारतीय जनमानस के अंतःकरण में प्रतिस्थापित है। भगवान राम ने भी त्रेता में ‘वृक्षों में जीवन’ की अवधारणा को प्रतिस्थापित करते हुए माँ सीता का पता वृक्षों, लता पत्रादि से पूछा था। इसका कारण उनके मानसिक विषाद नहीं, मानव जाति को पर्यावरणीय व्यवस्था को समझने, उसके अनुरूप कार्य करने की मनःस्थिति को बलिभूत करना था। 

योगराज श्रीकृष्ण ने भी परमधाम गमन से पूर्व, पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान किया था। हमारी संस्कृति और संकल्पनाओं के केंद्र में पवित्र पर्यावरण की परिकल्पना है। सृष्टि में पदार्थों में संतुलन बनाए रखने के लिए यजुर्वेद में एक श्लोक वॢणत है- 

ओम द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति: पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:। 

वनस्पतये: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति: सर्व शान्ति: शान्तिरेव शान्ति: सा मा शान्तिरेधि।। 

ओम शान्ति: शान्ति: शान्ति:।। 

पर्यावरण से संबंध, भारतीय दर्शन या उससे भी अधिक, जीवनशैली की आत्मा है। ठाकुर जी के भोग में तुलसी का होना नितांत आवश्यक है तो ग्रहों की शांति के लिए पीपल जैसे वृक्षों को पानी देना भी हमारे शास्त्रों की वाणी। भोलेनाथ के पूजन में बेलपत्र की महत्ता सभी को पता है। सत्यनारायण की पूजा में केले के पत्तों का उपयोग आम है। 

महत्व परम्पराओं के साथ सामंजस्य बिठाना ही नहीं है, जनमानस के अंतस में पर्यावरणीय बोध को जगाना है, वृक्षारोपण के माध्यम से लोगों को संवेदनशील बनाना भी सनातन की एक भारतीय परंपरा है, अनेकों अवसरों एवं उपलक्ष्यों पर, किसी महात्मा के जन्मदिवस पर वृक्षारोपण, हम सबने अपने आसपास देखा है। 

सिद्धार्थ को गौतम, एक वट की छाँव ने बनाया। महावीर को ज्ञान प्राप्ति भी एक पेड़ के नीचे ही हुई। अनेकों मुनियों, ऋषियों ने तत्वज्ञान की प्राप्ति, पेड़ों के नीचे की। पेड़ों में जीवन, सनातन में शुरू से वर्णित है। कितनी गहनतम जानकारी और ज्ञान रहा होगा जब हमारे ऋषियों ने प्रत्येक वृक्ष का गहराई से विश्लेषण करके यह जाना की पीपल और वट वृक्ष सभी वृक्षों में कुछ खास और अलग है। इनके धरती पर होने से ही धरती के पर्यावरण की रक्षा होती है। यही सब जानकर ही उन्होंने उक्त वृक्षों के संवरक्षण और इससे मनुष्य के द्वारा लाभ प्राप्ति के हेतु कुछ विधान बनाए गए उन्ही में से दो है पूजा और परिक्रमा।

हिंदू धर्म में जब भी कोई मांगलिक कार्य होते हैं तो घर या पूजा स्थल के द्वार व दीवारों पर आम के पत्तों की लड़ लगाकर मांगलिक उत्सव के माहौल को धार्मिक और वातावरण को शुद्ध किया जाता है। अक्सर धार्मिक पांडाल और मंडपों में सजावट के लिए आम के पत्तों का इस्तेमाल किया जाता है।

इसी सांस्कृतिक विरासत की अनेकों रूपों में विश्लेषणात्मक व्याख्या कर उचितार्थ भाव अपने नौनिहालों में बहाते विद्यालय, संविद गुरुकुलम में भी आज माँ प्रकृति की विशेष पूजा, वृक्षारोपण के माध्यम से की गई। इस अवसर पर परमपूज्य दीदी माँ ऋतंभरा जी उपस्थित रहीं, जिनके द्वारा उपस्थित छात्राओं के कोमल मन में पर्यावरण के प्रति लगाव की लौ प्रज्वलित की गई।  

पर्यावरण क्षरण रोकने हेतु आवश्यक है कि हम अपने नौनिहालों  को,बच्चों को वृक्षारोपण  लिए प्रेरित करें, उनके जन्मदिवस पर एक पौधा रोपित कराएं। जैसे जैसे  पौधा बढ़ता जायेगा, बच्चे के अंदर मानवीय गुणों का प्रादुर्भाव होगा। अस्तु, कहीं दूर होने के अवसर पर बालमन में उद्विग्नता का भाव होगा, यही प्रेम का अंकुर उसके मन में असंख्य जीवों, पशुओं, मानवों के प्रति अन्याय से उसे असहज ही नहीं करेगा, अपितु, उसके द्वारा उन क्रियाओं का संपादन भी होगा, जिनसे इन जीवों, पशुओं, वनचरों, मानवों की उन्नति का मार्ग प्रशस्त होगा। मानव का प्रकृति के साथ तारतम्य बैठेगा। वैचारिक रूपेण समाज की अनेकों अवधारणाओं को पर्यावरणीय संरक्षा मिलेगी। 

सामाजिक विकास में वृक्षों का सम्मान बढ़ेगा, जिसके वो अधिकारी हैं, कटान से मृदा अपरदन जैसे अनेकों विषयों पर सामाजिक नैतिक बोध होगा, जिससे किसी महामारी के समय अथवा जैविक युद्ध के समय हम डट सकें, लड़ सकें और जीत सकें। प्राणवायु की कमी से प्राणों की क्षति न हो। आइये प्रण लें – वृक्षारोपण का, उसके नैतिक मूल्यों का बच्चों के मन में भाव भरें – संविद गुरुकुलम के साथ, जिसमें साथ हो दीदी माँ का आशीर्वाद।  

रुई से हल्की नौनिहालों की नन्ही दुनिया

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पक्षी जब जलस्त्रोत से जल ग्रहण करते हैं तो यूँ लगता है कि ऋण का नीर हो। अन्न के कुछ कण भी यूँ चुगते हैं जैसे धरती इनकी सौतेली माँ हो। चौके से कुछ खाते भी हैं तो चोरी के भाव में डरे रहते हैं। खटका होते ही भाग जाते हैं। 


इन पंछियों की नींद भी रुई सरीखी होती है, एकदम हल्की। लगता है जैसे इनकी नींद में भाप भरी हुई है, फुर्र से उड़ जाती है। संशय के कारण एक संकुचित सी नींद लेना चिंता से भर देता है। इन पक्षियों को एकटक निहारते रहने से जीवन में असीमित आमोद प्रमोद भरा जा सकता है। वेदों में इन्हे यूँ ही ईश स्वरुप नहीं कहा गया है। इनकी सुंदरता रहस्यमयी है। उनका जीवन और मरण एक उत्सव है। 


ये खगकुल बहुत समृद्ध संकुल है। लम्बी यात्रा करने वाले कई प्रवासी पंछी हवा को अपने पैरों से तौलते हुए सो भी लेते हैं। आँखों में रात काट देते हैं। अपने प्राणों पर संकट उन्हें चैन से सोने नहीं देता। वो कभी निश्चिंत नहीं रहते। कभी किसी पक्षी को आपने निश्चिंत, निर्भय, अचल, स्थिर देखा है?


प्रश्न ये है कि इनका संशय, इतना भय, इतना अविश्वास इनके कोमल मन में कैसे आया, किसने भरा? इस भय का कोई उपाय मानव ने कभी क्यों नहीं खोजा? क्या बाल्यकाल से हमें वो संस्कार, वो प्रेम, अपनत्व का भाव नहीं मिला, जिसके हम अभिलाषी हों?
इस अनुत्तरीय प्रश्न का उत्तर ढूंढ़ते हुए एहसास होता है कि करुणा और प्रेम का भाव यूँ अचानक प्रकट नहीं होता। मारकाट के माहौल में बड़ा होता बचपन कभी करुणा को अपने ह्रदय में स्थान नहीं देगा। प्रकृति की गोद से वंचित बालक जब बड़ा होगा तो विकास की आंधी में वो पेड़ पौधों को बाधा ही समझेगा और उस अंधे विकास के पथ पर अपने कंक्रीट के जंगल बिछा देगा जिसकी कीमत पर होगा अनगिनत पंछियों का भय, डर और पेड़ पौधे जो अब नहीं रहेंगे।

वृन्दावन के वात्सल्यग्राम में एक ऐसा ही प्रयास किया गया है जिसमें कोमल बाल मन में प्रकृति को माँ के रूप में दिखा पंछियों, पशुओं और पेड़ पौधों से प्रेम करना सिखाया जाता है। नन्ही दुनिया नामक इस प्रकल्प में छोटा सा किन्तु महत्वपूर्ण प्राकृतिक स्थल बनाया गया है जिसमें छोटी सी कुटिया है, नन्हे नौनिहालों के लिए कृत्रिम पशु पक्षी बनाये गए हैं, अध्यात्म की चिर ज्वलंत लौ है, जिससे बच्चों को प्राकृतिक सान्निध्य मिले, माँ प्रकृति के आशीष में वो रहना सीखें, उन पंछियों को अपने पास पाएं जिन्हे वो शायद वो किताबों और कहानियों में देखते हैं, लेकिन समझ नहीं पाते। 

आइये उन पंछियों के कोलाहल में छिपे संगीत से अपने बच्चों के जीवन में सुर लय और ताल की नदी बहाएं, उन्हें करुणा और दया का भाव दें, उनके कोमल मन मस्तिष्क में पंछियों की वो पवित्रता स्थापित करें जिसमें वो पावन जीवन समाया है। आइये नन्ही दुनिया घूम कर आएं।  

संस्कारों, तपस्या और परोपकार का आनंद – वैशिष्ट्यम

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बृज की पावन नगरी में एक सेवाकेंद्र है जिसे वात्सल्यग्राम के नाम से जाना जाता है। इस सेवाकेंद्र को परम पूज्य दीदी माँ ऋतम्भरा जी ने स्थापित ही नहीं किया अपितु पुष्पित पल्लवित और पोषित इस प्रकार किया कि इस केंद्र के अनेकों प्रकल्पों के दर्शन करने से मानवीयता और उसका महत्त्व समझ आ जाता है। प्राकृतिक छटा ऐसी कि सभी आह्लादित हो जाते हैं। इस आह्लाद का आनंद लेने देश के बड़े प्रतिष्ठित मंत्री श्री देवेंद्र जी प्रधान वैशिष्ट्यम नामक प्रकल्प में नव भवन निर्माण हेतु भूमिपूजन हेतु आमंत्रित थे और उनका विधिवत मंत्रोच्चार के साथ स्वागत किया गया। इस नवीन भवन के भूतल के निर्माण कार्य हेतु देश की प्रतिष्ठित महारत्न कंपनी ओएनजीसी सहयोग कर रही है, जिसके लिए निदेशक (मानव संसाधन) श्रीमती मित्तल का भी आगमन हुआ, जिससे अधिक बच्चे, जो विशिष्ट हैं, इस सेवा प्रकल्प के माध्यम से अपने कष्टमय जीवन में सुगमता और सरलता ला सकें। 

भूमिपूजन 

कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी कैंपेन के अंतर्गत देश की महारत्न कंपनी ऑइल एंड नेचुरल गैस कारपोरेशन की मानव संसाधन निदेशक श्रीमती अलका मित्तल भी कार्यक्रम में मौजूद रहीं जिसमें संविद गुरुकुलम विद्यालय के विद्यार्थियों ने लीलाधर भगवान श्री कृष्ण के भजनों पर मनमोहक नृत्य प्रस्तुत कर सम्पूर्ण सभा-भवन को भक्तिमय कर दिया। इस भक्तिमय माहौल को और आकर्षक बनाया वैशिष्ट्यम के विशिष्ट बच्चों ने जिन्होंने देशभक्ति गीत पर दर्शनीय प्रस्तुति देकर सबका मन मोह लिया। 

श्रीमती मित्तल निदेशकओएनजीसी लिमिटेड

इस गीत संगीत और रंगारंग कार्यक्रमों के बीच जो भाव दर्शनीय था, वो था, आगंतुक अतिथियों का इन विशिष्ट बच्चों के प्रति सम्मान एवं प्रेम का भाव, जो परिलक्षित होता है उस ट्वीट के माध्यम से जो मंत्री जी ने दीदी माँ और वात्सल्य परिवार के वैशिष्ट्यम के प्रति स्नेह के कारण किया। कार्यक्रम का सञ्चालन श्री उमाशंकर राही और साध्वी सत्यप्रिया दीदी ने किया।

अपने सम्बोधन में श्रीमती मित्तल ने उस प्रकरण की भी चर्चा की जिसमें उनका वात्सल्यग्राम से स्नेह और कौशल विकास में उनकी अग्रणी सोच प्रदर्शित होती है। उनका अपने प्रतिष्ठित प्रतिष्ठान ऑइल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन की कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी कैंपेन में वात्सल्यग्राम के वैशिष्ट्यम को शामिल करना उस मानवीय संवेदनाओं का फिर से जी उठना है जो आज के समय में कहीं खो सी गई हैं। वैशिष्ट्यम के बच्चों को सम्बोधित करते हुए उन्होने कहा कि उनकी कंपनी में वैशिष्ट्यम कके बच्चों का स्वागत है। 

आदरणीय प्रधान जी ने भी दीदी माँ का आभार व्यक्त करते हुए अपने उद्गार व्यक्त कर सभी को सम्बोधित किया। उनका उद्बोधन सरलता और सहजता का सम्मिश्रण था जिसमें काफी गंभीर बातों को सहज तरीके और सरल शब्दों के माध्यम से व्यक्त करना लोगों को प्रभावित कर गया। 

शिलान्यास 

दीदी माँ जी के सम्बोधन में एक आकर्षण हमेशा रहता है जिससे श्रोता का ध्यान कभी भंग नहीं होता। वो बोलती हैं तो लगता है व्याकरण की साधक हैं, अपने शब्दों के  चयन से कैसे वो इतना सम्मोहित करती हैं। दीदी माँ जी के आज के सम्बोधन में वो सब कुछ था जिसकी उनके श्रोता उत्सुकता से प्रतीक्षा करते हैं। अथितियों का स्वागत सत्कार हो या बच्चों के प्रति उनका निश्छल निर्मल प्रेम, परोपकार की भावना हो या भगवन राम के प्रति उनका समर्पण, निश्चय ही वो इस धरा की तो नहीं लगतीं। 

 दीदी माँ जी का सम्बोधन राम के रामत्व पर था, राम मंदिर के भव्य निर्माण की प्रसन्नता उनके शब्दों के माध्यम से श्रोताओं के कान में शहद घोल देती है। संस्कृति और सभ्यता का अंतर व्यक्त करते हुए दीदी माँ ने कहा कि सभ्यता के नहीं हम संस्कृति के उपासक हैं, निश्चित रूप से ये सही भी है क्यूंकि मेसोपोटामिया से लेकर यूनान और मिस्र से लेकर रोम तक, हर सभ्यता नष्ट भ्रष्ट हो गयी लेकिन संस्कृति थे हम इसीलिए प्रासंगिक हैं। अंत में सभी को भूमिपूजन के साथ आगंतुक अतिथि गणों ने विदा ली और एक मोहक माहौल में ये परोपकार का पावन कार्य सम्पूर्ण हुआ।  

मीरा और माधव: प्रेम से आध्यात्म तक

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वो क्या है जो किसी भी समाज की सबसे अमूल्य निधि मानी जाती है? जिसके बिना यूनान, मिस्र, रोम जैसे साम्राज्य मिट गए लेकिन हजारों वर्षों के सतत आक्रमणों और गुलामी को झेलने के बाद भी भारतीय सभ्यता और संस्कृति अडिग और अमिट ही रही ? वो अमूल्य निधि है, अपनी वास्तविक पहचान। उस पहचान को बनाये रखने के लिए किये गए प्रयत्न, लड़े गए युद्ध और उससे भी बढ़कर, समाज के रूप में उन प्रयत्नों की कहानियों को आगे बढाकर अगली पीढ़ी तक पहुंचाना। 

विदेशी आक्रांताओं के अधार्मिक व्यवहार और अनुचित नीतियों ने अनेकों लोगों को धर्मान्तरण पर विवश किया। अत्यंत तीव्र और बहुतायत में किये जा रहे इन धर्मान्तरण के बाद भी भारत की बहुसंख्यक जनता कैसे सनातन को मानती रही, ये प्रश्न भी आपके मन में आता होगा। लाजिमी है, क्यूरिऑसिटी को जिंदा रखना ही तो जिंदगी है। इतिहास का गहन अध्ययन करने पर जो एक चीज समझ आती है वो है कि उस समय पर उत्पन्न हुए भक्ति आन्दोलनों ने सनातन धर्म की रक्षा की। धर्म की ध्वजा को पकडे रखा और भारतीय उपमहाद्वीप अपनी वास्तविक पहचान को सहेज सका। 

मीराबाई उन महान संतों में से एक हैं जिनकी भक्ति और भजनों ने भक्ति की लौ प्रज्वलित रखी और हमें सिखाया कि प्रेम का एक रुप आध्यात्म भी है। प्रेम का एक रुप प्रेम करते चले जाना है जिसमें वांछित लक्ष्य कुछ नहीं। वांछनीय कुछ भी नहीं। एक माधव एक मीरा। यही है प्रेम जिसमें मीरा माधव को ढूंढ़ते हुए रात के अंतिम पहर में भी संकीर्तन में पहुंच जाती थीं। 

यूँ आसान नहीं किसी के लिए मीरा हो जाना। माधव का नाम जपते जपते उन्होंने अपने चरित्र पर लांछन के छींटे भी झेले, मगर उफ़ न की। माधव के प्रेम को अंतिम संकल्प समझ जो किया वो वही था, जिसके लिए लोग उन्हें जानते हैं – प्रेम। 

एक रजवाड़े की बेटी, एक रजवाड़े की बहु, एक राजा की पत्नी, कैसे माँ के एक बार  माधव को दूल्हा बताने  समर्पण की अंतिम सीढ़ी पर पहुंच गईं। मीरा ने विष के प्याले को भी विश्वास के माध्यम से अमृत कर दिया। राणा के क्रोध का भय किसे जब लगन उस माधव में हो। 

मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई। 

जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई। 

ये भाव लिए वो जीवित रहीं और इसी भाव से वो परलोक सिधार गईं। पीछे छोड़ गईं एक सीख, जो सिखाती है हमें कि प्रेम का वास्तविक अर्थ क्या है। प्रेम में मीरा हो जाना असंभव है, कम-से-कम आज के परिदृश्य में तो है ही। उस परिदृश्य की चर्चा लेखक ने जानबूझ कर नहीं की है। 

मीरा माधव के इस ब्रह्माण्ड स्वरुप प्रेम को मूर्त रूप दिया गया है वृन्दावन नगर में स्थित एक रिसोर्ट में जो मीरा माधव के नाम पर बसाया गया है। इस रिसोर्ट का नाम ही है, मीरा माधव निलयम, निलयम एक तमिल शब्द है जिसका अर्थ है घर। मीरा माधव निलयम जहाँ मीरा और माधव को एक साथ स्थापित किया गया है, उनके मंदिर में। रिसोर्ट का मध्य बिंदु ही है ये मंदिर जहाँ भोजन बनता है तो नैवैद्यम नामक रसोई में, जिसे प्रसादम कहा जाता है। 

देखना हो तो वृन्दावन के वात्सल्यग्राम में आइये और कुम्भ मेले के दर्शन के साथ मीरा माधव के घर रहकर देखिये, परम आनंद की अनुभूति होगी।